नई दिल्ली: मिडिल ईस्ट में जारी भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर दुनिया की प्रमुख रेटिंग एजेंसी मूडीज रेटिंग्स (Moody’s Ratings) ने बड़ा भरोसा जताया है। एजेंसी का मानना है कि भारत अपनी इन्वेस्टमेंट-ग्रेड सॉवरेन रेटिंग को जोखिम में डाले बिना जरूरत पड़ने पर अनुमान से अधिक राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) भी संभाल सकता है। हालांकि, एजेंसी ने यह भी कहा कि भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अब भी कर्ज पर ब्याज भुगतान का बढ़ता बोझ है।
मिडिल ईस्ट संकट से क्यों बढ़ी थी चिंता?
इस साल पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई थी। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
महंगे कच्चे तेल से कई समस्याएं पैदा हो सकती हैं—
- आयात बिल बढ़ जाता है।
- महंगाई पर दबाव बढ़ता है।
- सरकार की सब्सिडी लागत बढ़ सकती है।
- राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा रहता है।
- आर्थिक विकास की रफ्तार प्रभावित हो सकती है।
इन्हीं आशंकाओं के बीच मूडीज ने भारत की आर्थिक स्थिति का आकलन किया है।
मूडीज ने भारत पर क्यों जताया भरोसा?
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मूडीज रेटिंग्स के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट क्रिश्चियन डी गुजमैन का कहना है कि यह झटका केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि अधिकांश देशों पर इसका असर पड़ रहा है। इसलिए भारत की मौजूदा सॉवरेन रेटिंग पर तत्काल कोई खतरा नहीं दिखता।
फिलहाल मूडीज ने भारत को ‘Baa3’ रेटिंग दी हुई है, जो इन्वेस्टमेंट-ग्रेड की सबसे निचली श्रेणी है। इसके साथ एजेंसी का आउटलुक ‘Stable’ यानी स्थिर बना हुआ है।
उनके अनुसार, कोरोना महामारी के बाद केंद्र सरकार ने लगातार राजकोषीय अनुशासन बनाए रखा है और घाटा कम करने की दिशा में अच्छी प्रगति की है। यही वजह है कि भारत की साख मजबूत बनी हुई है।
कितना बढ़ सकता है राजकोषीय घाटा?
रिपोर्ट के अनुसार, इस वित्त वर्ष में सरकार जरूरत पड़ने पर राजकोषीय घाटे को GDP के 4.8% तक जाने दे सकती है। हालांकि सरकार का आधिकारिक लक्ष्य मार्च 2027 तक इसे घटाकर 4.3% पर लाना है।
यह ध्यान देने वाली बात है कि कोरोना महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में भारत का राजकोषीय घाटा रिकॉर्ड 9.2% तक पहुंच गया था। इसके बाद सरकार लगातार इसे कम करने में सफल रही है।
तेल की कीमतें घटने से बढ़ी राहत
हाल के सप्ताहों में अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत आगे बढ़ने से कच्चे तेल की कीमतों में नरमी देखने को मिली है। इससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
अगर पश्चिम एशिया में तनाव स्थायी रूप से कम होता है तो इससे भारत की आर्थिक वृद्धि, महंगाई और सरकारी वित्त तीनों को फायदा मिल सकता है।
70 डॉलर प्रति बैरल तेल रहा तो तेज रह सकती है ग्रोथ
भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के बाहरी सदस्य नागेश कुमार ने हाल ही में कहा कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें करीब 70 डॉलर प्रति बैरल बनी रहती हैं तो भारत की अर्थव्यवस्था चालू वित्त वर्ष में 7% से अधिक की दर से वृद्धि कर सकती है।
सस्ते तेल का फायदा उद्योग, परिवहन, उपभोक्ताओं और सरकार सभी को मिलता है।
फिर भी एक बड़ी चिंता बाकी
मूडीज ने साफ कहा है कि भारत की सबसे बड़ी कमजोरी अभी भी कर्ज पर ब्याज भुगतान है।
एजेंसी के मुताबिक इस साल केंद्र और राज्यों की कुल आय का लगभग 23% हिस्सा केवल ब्याज भुगतान में खर्च होगा।
तुलना करें तो समान सॉवरेन रेटिंग वाले देशों—
- इटली
- ओमान
- मैक्सिको
- ग्रीस
में यह औसत 10% से भी कम है।
यानी भारत की आय का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज की लागत चुकाने में चला जाता है, जिससे सरकार के पास विकास परियोजनाओं पर खर्च करने की वित्तीय क्षमता कुछ सीमित हो जाती है।
विकास दर का अनुमान बरकरार
मूडीज ने मार्च 2027 में समाप्त होने वाले वित्त वर्ष के लिए भारत की आर्थिक विकास दर का 6% अनुमान बरकरार रखा है।
एजेंसी का यह अनुमान इस आधार पर है कि 2026 के दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की औसत कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रह सकती है।
होर्मुज स्ट्रेट पर अभी भी नजर
हालांकि पश्चिम एशिया में हालात पहले से बेहतर हुए हैं, लेकिन मूडीज का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही में कुछ व्यवधान पतझड़ (Autumn) तक बने रह सकते हैं।
यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में शामिल है। यदि यहां दोबारा तनाव बढ़ता है तो वैश्विक तेल बाजार पर इसका असर पड़ सकता है।
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
मूडीज की ताजा टिप्पणी भारत के लिए सकारात्मक संकेत मानी जा रही है। इससे यह संदेश जाता है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की आर्थिक बुनियाद मजबूत बनी हुई है। हालांकि सरकार के सामने कर्ज का बोझ कम करना और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना आने वाले वर्षों की सबसे बड़ी प्राथमिकता रहेगा। अगर तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और सुधारों की रफ्तार जारी रहती है तो भारत की क्रेडिट प्रोफाइल आगे और मजबूत हो सकती है।


