नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका ने लगातार दूसरे दिन ईरान से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया है, जबकि ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। इस घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में कारोबार के दौरान करीब 2 फीसदी तक उछाल देखने को मिला। हालांकि भारत के लिए राहत की बात यह है कि देश ने समय रहते कच्चे तेल और एलपीजी (LPG) का पर्याप्त भंडार जुटा लिया है, जिससे आने वाले कई हफ्तों तक सप्लाई को लेकर किसी बड़ी परेशानी की आशंका नहीं है।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों ने कम से कम अगस्त तक की जरूरत को ध्यान में रखते हुए कच्चे तेल का पर्याप्त स्टॉक तैयार कर लिया है। वहीं एलपीजी की उपलब्धता भी जुलाई के मध्य तक सामान्य रहने की उम्मीद जताई जा रही है। ऐसे समय में जब दुनिया के कई देशों को ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान का डर सता रहा है, भारत की यह तैयारी काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
अगस्त तक कच्चे तेल और जुलाई मध्य तक LPG की चिंता नहीं
ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार भारतीय रिफाइनरियों ने पिछले कुछ सप्ताह में तेजी से खरीदारी की है। इसका मकसद संभावित सप्लाई संकट से पहले पर्याप्त भंडार तैयार करना था। इसी रणनीति के तहत कच्चे तेल के साथ-साथ एलपीजी के कार्गो भी बड़ी मात्रा में खरीदे गए हैं।
ऊर्जा उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि फिलहाल देश में कच्चे तेल की उपलब्धता को लेकर कोई चिंता नहीं है। रिफाइनरियों के पास पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और अगस्त तक की मांग को पूरा करने की तैयारी की जा चुकी है। एलपीजी के मामले में भी स्थिति फिलहाल संतोषजनक बताई जा रही है और जुलाई के मध्य तक किसी प्रकार की कमी की संभावना नहीं दिख रही है।
यह तैयारी ऐसे समय में की गई है जब पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदल रहे हैं। यदि क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ता है तो समुद्री व्यापार मार्गों पर असर पड़ सकता है। इसी आशंका को देखते हुए भारतीय कंपनियों ने पहले से ही अतिरिक्त खरीदारी कर ली है।
यूएई की ADNOC बनी भारत की बड़ी मददगार
भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में यूएई की सरकारी तेल कंपनी ADNOC की अहम भूमिका सामने आई है। भारतीय रिफाइनरियां ADNOC से शिप-टू-शिप ट्रांसफर के माध्यम से कच्चा तेल और एलपीजी कार्गो खरीद रही हैं।
ADNOC फुजैरा, जिरकू और दास आइलैंड जैसी रणनीतिक स्टोरेज सुविधाओं का उपयोग कर रही है। इसके अलावा फुजैरा-सोहार क्षेत्र और मलेशिया के माध्यम से भी कच्चे तेल की आपूर्ति की जा रही है। एलपीजी के अधिकांश कार्गो ओमान के सोहार बंदरगाह से भेजे गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई ने पिछले कुछ वर्षों में भारत के लिए एक भरोसेमंद ऊर्जा साझेदार के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है। मौजूदा संकट के दौरान भी यूएई से लगातार सप्लाई मिलना भारत के लिए राहत की बात है।
HPCL ने खरीदे लाखों बैरल कच्चे तेल के कार्गो
सरकारी तेल कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने अगस्त डिलीवरी के लिए यूएई से 40 लाख बैरल कच्चे तेल की खरीद की है। इसके अलावा कंपनी ने हाल ही में ब्राजील और पश्चिम अफ्रीका से भी 20 लाख बैरल कच्चे तेल की खरीदारी की है।
इस अतिरिक्त खरीद का एक हिस्सा राजस्थान स्थित रिफाइनरी में प्रोसेस किया जाएगा। इससे न केवल घरेलू मांग पूरी करने में मदद मिलेगी बल्कि संभावित वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों का असर भी कम होगा।
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि भारतीय कंपनियां अब केवल पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। इसी वजह से वे ब्राजील, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल खरीद बढ़ा रही हैं।
IOC और MRPL ने भी बढ़ाई खरीदारी
देश की सबसे बड़ी तेल विपणन कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (MRPL) ने भी हाल के दिनों में स्पॉट टेंडर जारी कर अतिरिक्त कच्चे तेल की खरीद की है।
स्पॉट टेंडर का इस्तेमाल आमतौर पर तब किया जाता है जब कंपनियों को तत्काल डिलीवरी की जरूरत होती है या बाजार में भविष्य के जोखिमों को देखते हुए अतिरिक्त स्टॉक बनाना होता है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय कंपनियां मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर सतर्क हैं और किसी भी संभावित संकट से पहले तैयारी कर रही हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह तैयारी?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है। देश अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। एलपीजी के मामले में भी आयात की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष भारत के लिए चिंता का विषय बन जाता है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव बढ़ने पर वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल इसी मार्ग से गुजरता है।
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में काम किया है। रूस, अमेरिका, ब्राजील, यूएई और पश्चिम अफ्रीका जैसे स्रोतों से खरीद बढ़ाने का उद्देश्य भी यही है कि किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर देश की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित न हों।
क्या पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतों पर पड़ेगा असर?
हालांकि फिलहाल सप्लाई की स्थिति मजबूत है, लेकिन यदि अमेरिका-ईरान तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में तेल विपणन कंपनियों की लागत बढ़ेगी।
भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें सीधे तौर पर वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों से प्रभावित होती हैं। यदि ब्रेंट क्रूड लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो भविष्य में ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
एलपीजी के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर पड़ता है। हालांकि फिलहाल पर्याप्त स्टॉक होने के कारण निकट भविष्य में सप्लाई या उपलब्धता को लेकर किसी बड़ी समस्या की संभावना नहीं दिखाई दे रही है।
आगे क्या रहेगा सबसे बड़ा जोखिम?
ऊर्जा बाजार की नजर अब पश्चिम एशिया की स्थिति पर टिकी हुई है। यदि संघर्ष सीमित दायरे में रहता है तो भारत के लिए तत्काल कोई खतरा नहीं है। लेकिन यदि स्थिति और गंभीर होती है या समुद्री व्यापार मार्ग प्रभावित होते हैं तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
फिलहाल भारतीय रिफाइनरियों द्वारा की गई अग्रिम खरीदारी और यूएई समेत अन्य देशों से बढ़ी आपूर्ति ने देश को राहत दी है। यही वजह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कई सप्ताह तक भारत में कच्चे तेल और एलपीजी की उपलब्धता सामान्य बनी रह सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी देश ने अपनी जरूरतों के अनुरूप पर्याप्त भंडार सुनिश्चित कर लिया है।


