Low Salary Hike: लंबे समय तक कड़ी मेहनत, ओवरटाइम और कंपनी के प्रति वफादारी के बावजूद जब उम्मीद के मुताबिक पहचान और वेतन वृद्धि नहीं मिलती, तो कर्मचारी का मनोबल टूटने लगता है। हैदराबाद के एक टेक प्रोफेशनल की कहानी इसी हकीकत को बयां करती है, जिसने एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में करीब 10 साल बिताने के बाद सिर्फ 5% सैलरी इंक्रीमेंट मिलने पर इस्तीफा दे दिया। उनका कहना है कि उन्होंने कई बार सप्ताह में 74 घंटे तक काम किया, लेकिन मेहनत के मुकाबले मिला इनाम बेहद कम था।
10 साल तक कंपनी के साथ रहे, लेकिन आखिरकार छोड़नी पड़ी नौकरी
हैदराबाद के रहने वाले इस टेक प्रोफेशनल (पहचान छिपाने के लिए नाम बदला गया है) ने कॉलेज से निकलने के बाद सीधे एक प्रतिष्ठित कंसल्टिंग कंपनी में करियर की शुरुआत की थी। शुरुआत में उन्हें लगा था कि यही कंपनी उनके पूरे करियर का आधार बनेगी।
कंपनी का पार्टनरशिप मॉडल, बड़े क्लाइंट्स के साथ काम करने का मौका, अनुभवी लीडर्स की मेंटरशिप और लगातार सीखने का माहौल उन्हें लंबे समय तक वहीं बने रहने के लिए प्रेरित करता रहा। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां बदलती गईं।
करीब एक दशक बाद उन्हें महसूस हुआ कि लगातार बढ़ते वर्कलोड, सीमित वेतन वृद्धि और प्रमोशन में देरी ने उनकी पेशेवर संतुष्टि को खत्म कर दिया है। आखिरकार उन्होंने नई कंपनी जॉइन करने का फैसला किया।
“नारायण मूर्ति के सुझाव से भी ज्यादा घंटे काम किया”
इस कर्मचारी का कहना है कि उन्होंने कई बार सप्ताह में 74 घंटे तक काम किया, जो इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति द्वारा सुझाए गए 70 घंटे के वर्कवीक से भी अधिक था।
उनके अनुसार, लगातार देर रात तक काम करना, सप्ताहांत पर भी उपलब्ध रहना और हर समय ऑफिस से जुड़े रहना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। इसके बावजूद उन्हें उम्मीद के मुताबिक प्रमोशन या वेतन वृद्धि नहीं मिली।
उन्होंने कहा कि कई बार बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों और सामान्य प्रदर्शन करने वालों के बीच सैलरी इंक्रीमेंट का अंतर बेहद मामूली होता था। यही बात उन्हें सबसे ज्यादा निराश करती थी।
शुरुआत में सुनहरा दिखता था करियर
करियर की शुरुआत में उन्हें लगा था कि यदि वे लगातार मेहनत करेंगे तो भविष्य में नेतृत्व की भूमिका तक पहुंच सकते हैं। हर साल कंपनी में बने रहने का फैसला उन्हें सही लगता रहा क्योंकि सीखने और आगे बढ़ने के कई अवसर मिल रहे थे।
लेकिन धीरे-धीरे संगठन में बदलाव, प्रमोशन के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा और करियर ग्रोथ की धीमी रफ्तार ने उनकी सोच बदल दी।
उनका कहना है कि कोई भी व्यक्ति पहले दिन यह तय नहीं करता कि वह 10 साल तक किसी कंपनी में रहेगा। यह फैसला हर साल अनुभवों के आधार पर बनता है।
बर्नआउट की सबसे बड़ी वजह क्या रही?
कर्मचारी के मुताबिक सबसे बड़ी समस्या सिर्फ लंबे घंटे काम करना नहीं था, बल्कि काम से कभी पूरी तरह अलग न हो पाना था।
उन्होंने बताया कि:
- सामाजिक कार्यक्रमों के दौरान भी ऑफिस कॉल आते थे।
- हमेशा लैपटॉप और ऑफिस फोन साथ रखना पड़ता था।
- ऑफिस टाइम खत्म होने के बाद भी लगातार उपलब्ध रहने की अपेक्षा रहती थी।
- छुट्टियों में भी क्लाइंट और टीम की जिम्मेदारियां खत्म नहीं होती थीं।
धीरे-धीरे काम ने निजी जिंदगी पर इतना असर डाला कि वर्क-लाइफ बैलेंस लगभग खत्म हो गया।
सिर्फ क्लाइंट प्रोजेक्ट ही नहीं, अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं
कंसल्टिंग इंडस्ट्री में कर्मचारियों को सिर्फ क्लाइंट का काम ही नहीं करना पड़ता। इस प्रोफेशनल के अनुसार उन्हें कई अन्य जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती थीं, जैसे—
- नए प्रोजेक्ट्स के लिए प्रपोजल तैयार करना
- हायरिंग गतिविधियों में भाग लेना
- इंटरनल प्रोजेक्ट्स संभालना
- बिजनेस डेवलपमेंट में योगदान देना
- प्रैक्टिस डेवलपमेंट से जुड़े कार्य
उनका कहना है कि जैसे-जैसे कर्मचारी वरिष्ठ पदों पर पहुंचता है, इन अतिरिक्त जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ता जाता है, जबकि इसके लिए अलग से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता।
छोटी टीम, कम समय और बढ़ता दबाव
उन्होंने बताया कि पहले जिन प्रोजेक्ट्स के लिए छह लोगों की टीम और छह महीने का समय मिलता था, अब वही काम चार लोगों से पांच महीने में पूरा करने की उम्मीद की जाती है।
ऐसी स्थिति में कर्मचारियों पर काम का दबाव कई गुना बढ़ जाता है और लगातार ओवरटाइम करना मजबूरी बन जाता है।
5% सैलरी हाइक ने तोड़ा मनोबल
इस कर्मचारी का कहना है कि इस बार उन्हें केवल 5% वेतन वृद्धि मिली। उनका मानना है कि इतनी मेहनत और अतिरिक्त जिम्मेदारियों के बाद यह बढ़ोतरी निराशाजनक थी।
उन्होंने यह भी कहा कि कई कर्मचारियों को इससे भी कम इंक्रीमेंट मिला, जबकि उनके प्रदर्शन में बड़ा अंतर था।
उनके मुताबिक असली समस्या सिर्फ वेतन नहीं थी, बल्कि मेहनत की उचित पहचान न मिलना थी। जब कर्मचारी को लगता है कि उसकी अतिरिक्त मेहनत और सामान्य प्रदर्शन के बीच कोई खास अंतर नहीं किया जा रहा, तो धीरे-धीरे उसका उत्साह खत्म होने लगता है।
आखिर क्यों लिया नौकरी बदलने का फैसला?
उन्होंने स्पष्ट किया कि नौकरी छोड़ने का फैसला केवल पैसे के कारण नहीं था।
उनके अनुसार इसके पीछे कई वजहें थीं—
- करियर ग्रोथ की धीमी रफ्तार
- प्रमोशन प्रक्रिया में बढ़ती प्रतिस्पर्धा
- लगातार बर्नआउट
- निजी जीवन के लिए समय की कमी
- बदलती प्राथमिकताएं
- बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस की तलाश
नई कंपनी में उन्हें बेहतर वेतन तो मिला ही, साथ ही अपने समय पर ज्यादा नियंत्रण और संतुलित जीवन भी मिला।
बदल गई सफलता की परिभाषा
पीछे मुड़कर देखने पर उन्हें अपने पुराने अनुभवों का कोई पछतावा नहीं है। उनका मानना है कि उसी कंपनी ने उन्हें तकनीकी कौशल, आत्मविश्वास और नेतृत्व का अनुभव दिया।
हालांकि अब उनकी सफलता की परिभाषा बदल चुकी है। 22 साल की उम्र में सफलता का मतलब केवल तेज करियर ग्रोथ और बड़ी कंपनी था, लेकिन 35 साल की उम्र में उनके लिए बेहतर मानसिक स्वास्थ्य, परिवार के लिए समय और संतुलित जीवन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया।
क्या सीख मिलती है?
यह कहानी बताती है कि आज के कॉर्पोरेट माहौल में केवल लंबे घंटे काम करना सफलता की गारंटी नहीं है। कर्मचारी अब सिर्फ वेतन वृद्धि नहीं, बल्कि मान्यता, करियर ग्रोथ, मानसिक स्वास्थ्य और वर्क-लाइफ बैलेंस को भी उतनी ही अहमियत दे रहे हैं। यदि मेहनत के अनुपात में पहचान और अवसर नहीं मिलते, तो अनुभवी कर्मचारी भी बेहतर विकल्प की तलाश में नौकरी बदलने का फैसला लेने से पीछे नहीं हटते।


