नई दिल्ली: बैंकों का पैसा लेकर कर्ज नहीं चुकाने वाले डिफॉल्टरों के लिए आने वाले समय में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। केंद्र सरकार बैंकों के साथ मिलकर एक ऐसा आधुनिक और केंद्रीकृत सिस्टम तैयार कर रही है, जिसकी मदद से डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों (Movable Assets) का पता लगाना पहले की तुलना में काफी आसान हो जाएगा। इसका मकसद बैंकों की रिकवरी प्रक्रिया को तेज करना और वर्षों से लंबित पड़े मामलों को जल्दी निपटाना है।
यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है जब देशभर में हजारों करोड़ रुपये के कर्ज वसूली के मामले कर्ज वसूली ट्रिब्यूनल (DRT) और कर्ज वसूली अपीलीय ट्रिब्यूनल (DRAT) में लंबित हैं। सरकार चाहती है कि बैंक डिफॉल्टरों की संपत्तियों की पहचान तेजी से कर सकें ताकि वसूली की कार्रवाई प्रभावी ढंग से पूरी हो सके।
अभी डिफॉल्टरों की संपत्ति खोजने में क्या दिक्कत है?
वर्तमान व्यवस्था में जब कोई व्यक्ति या कंपनी बैंक का कर्ज नहीं चुकाती है, तो बैंक को उसकी चल संपत्तियों जैसे वाहन, मशीनरी, उपकरण या अन्य मूल्यवान परिसंपत्तियों का पता लगाने के लिए DRT के रिकवरी अधिकारियों की मदद लेनी पड़ती है।
रिकवरी अधिकारी संबंधित विभागों और एजेंसियों से जानकारी जुटाकर संपत्ति कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है क्योंकि देश में ऐसी कोई एकीकृत व्यवस्था नहीं है जहां डिफॉल्टर की सभी चल संपत्तियों का रिकॉर्ड एक ही जगह उपलब्ध हो।
बैंकिंग क्षेत्र के अधिकारियों का मानना है कि इसी वजह से कई मामलों में वसूली वर्षों तक अटकी रहती है और बैंकों का पैसा फंस जाता है।
सरकार का नया प्लान क्या है?
सरकार अब एक ऐसा Centralised Asset Tracking Framework तैयार करने पर काम कर रही है, जिसमें डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों का रिकॉर्ड एकीकृत रूप से उपलब्ध कराया जा सकेगा।
इस नए सिस्टम के तहत:
- डिफॉल्टरों की चल संपत्तियों का डेटा एक केंद्रीकृत प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध होगा।
- बैंक आपस में महत्वपूर्ण जानकारी साझा कर सकेंगे।
- संपत्तियों की पहचान और कुर्की की प्रक्रिया तेज होगी।
- वसूली मामलों में पारदर्शिता बढ़ेगी।
- लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बैंकों की रिकवरी क्षमता मजबूत होगी और जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वाले बड़े डिफॉल्टरों पर दबाव बढ़ेगा।
DRT मामलों की निगरानी पर जोर
सरकार ने बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे DRT में लंबित मामलों की बेहतर निगरानी करें। इसके अलावा बड़े कर्ज वाले मामलों को प्राथमिकता देने के लिए भी कहा गया है ताकि अधिक से अधिक राशि की वसूली की जा सके।
वित्त मंत्रालय का मानना है कि यदि बड़े मामलों का तेजी से निपटारा होता है तो बैंकिंग सिस्टम में फंसी बड़ी रकम वापस आ सकती है और वित्तीय संस्थानों की स्थिति मजबूत होगी।
लोक अदालतों के जरिए भी होगी तेजी
सरकार विवादों के समाधान के लिए लोक अदालतों के उपयोग को भी बढ़ावा दे रही है। बैंकों को सलाह दी गई है कि वे छोटे और मध्यम स्तर के मामलों को लोक अदालतों के माध्यम से निपटाने का प्रयास करें ताकि अदालतों और ट्रिब्यूनलों पर बोझ कम हो सके।
पिछले महीने सरकार ने DRT और DRAT के अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक भी की थी। इस बैठक में लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे, बेहतर प्रशिक्षण और इन्फ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने पर विशेष चर्चा हुई।
2026 में लगेंगी विशेष लोक अदालतें
वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman ने इस वर्ष की शुरुआत में बताया था कि DRT और DRAT में फंसे मामलों के समाधान के लिए वर्ष 2026 के दौरान चार विशेष लोक अदालतें आयोजित करने की योजना बनाई गई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, लंबित मामलों में लगभग 71 प्रतिशत मामले ऐसे हैं जिनमें बकाया राशि 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक है। यही वजह है कि सरकार का मुख्य फोकस बड़े कर्जदारों और बड़े डिफॉल्ट मामलों पर है।
बैंकिंग सेक्टर को क्या होगा फायदा?
नया सिस्टम लागू होने के बाद बैंकों को कई महत्वपूर्ण लाभ मिल सकते हैं:
- डिफॉल्टरों की संपत्तियों का पता लगाने में कम समय लगेगा।
- रिकवरी प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनेगी।
- फंसे हुए कर्ज (NPA) की वसूली बढ़ सकती है।
- न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव कम होगा।
- बैंकिंग सिस्टम में तरलता और वित्तीय अनुशासन मजबूत होगा।
डिफॉल्टरों के लिए बढ़ेगी मुश्किल
सरकार की इस पहल का सबसे बड़ा असर उन लोगों और कंपनियों पर पड़ेगा जो जानबूझकर कर्ज चुकाने से बचते रहे हैं। केंद्रीयकृत रिकॉर्ड और बैंकों के बीच डेटा साझा करने की व्यवस्था लागू होने के बाद संपत्तियों को छिपाना पहले जितना आसान नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम बैंकिंग क्षेत्र में जवाबदेही बढ़ाने के साथ-साथ वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। आने वाले समय में यह व्यवस्था भारत की कर्ज वसूली प्रणाली को अधिक तेज, पारदर्शी और प्रभावी बना सकती है।

