नई दिल्ली: दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक होर्मुज स्ट्रेट (Hormuz Strait) एक बार फिर खुलने की ओर बढ़ रहा है। करीब 100 दिनों से अधिक समय तक बाधित रहने के बाद अब इस रास्ते से फंसा हुआ कच्चा तेल वैश्विक बाजार में पहुंच सकेगा। रिपोर्ट्स के अनुसार फारस की खाड़ी में लगभग 31 सुपरटैंकरों में भरे करीब 6.2 करोड़ बैरल कच्चे तेल की खेप आगे बढ़ने के लिए तैयार है।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम समझौते के बाद हालात सामान्य होने लगे हैं। इससे न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलेगी, बल्कि भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए भी यह सकारात्मक खबर मानी जा रही है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 80-85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई बढ़ने और कीमतों में नरमी आने का सीधा फायदा भारतीय अर्थव्यवस्था को मिल सकता है।
सबसे बड़ा लाभ देश के आयात बिल में कमी के रूप में देखने को मिल सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें घटती हैं तो पेट्रोलियम उत्पादों की लागत कम होगी, जिससे महंगाई पर दबाव घटेगा। साथ ही भारत के करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) को नियंत्रित रखने में भी मदद मिलेगी।
रूस पर संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच भारत के लिए पश्चिम एशिया से तेल की नियमित और सुरक्षित सप्लाई का रास्ता खुलना भी रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और सप्लाई संबंधी जोखिम कम होंगे।
बाजार में बढ़ सकती है जरूरत से ज्यादा सप्लाई
हालांकि होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से एक नई चुनौती भी सामने आ सकती है। पिछले कुछ महीनों के दौरान एशियाई रिफाइनरियों ने संभावित सप्लाई संकट को देखते हुए वैकल्पिक स्रोतों से बड़ी मात्रा में तेल खरीद लिया था।
अब जब फंसी हुई 6.2 करोड़ बैरल तेल की खेप बाजार में पहुंचेगी, तो कुछ क्षेत्रों में जरूरत से ज्यादा सप्लाई की स्थिति बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत तक यह तेल लगभग एक सप्ताह में और पूर्वी एशिया तक करीब तीन सप्ताह में पहुंच सकता है।
व्यापारियों के अनुसार कई रिफाइनरियों के पास पहले से पर्याप्त स्टॉक मौजूद है। इसके अलावा ऊंची तेल कीमतों के दौरान मांग कमजोर पड़ने से कुछ रिफाइनरियों ने प्रोसेसिंग दरें भी घटा दी थीं। ऐसे में अतिरिक्त सप्लाई कीमतों पर दबाव बढ़ा सकती है।
संघर्ष के शुरुआती दौर से बिल्कुल अलग तस्वीर
संघर्ष की शुरुआत में बाजार को तेल की भारी कमी का डर था। उस समय कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था और कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ा दी थी।
अमेरिका से तेल खरीद बढ़ी, जापान ने अपने रणनीतिक भंडार का उपयोग किया और कई एशियाई देशों ने अतिरिक्त स्टॉक जमा कर लिया। अब वही बाजार अचानक अतिरिक्त सप्लाई की संभावना का सामना कर रहा है।
इस बीच अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) और कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन जैसे उत्पादकों ने भी होर्मुज मार्ग से कुछ सप्लाई जारी रखी थी। इससे कुल उपलब्ध तेल की मात्रा और बढ़ गई है।
कीमतों पर दिखने लगा असर
बाजार में बढ़ती सप्लाई की उम्मीद का असर तेल की कीमतों के संकेतकों में दिखाई देने लगा है। मिडिल ईस्ट के प्रमुख ग्रेड जैसे दुबई और मुरबान क्रूड के फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स में कमजोरी के संकेत मिल रहे हैं।
ओमान क्रूड भी अपने बेंचमार्क दुबई क्रूड की तुलना में डिस्काउंट पर कारोबार करता देखा गया, जबकि आमतौर पर यह प्रीमियम पर बिकता है। डीजल और जेट फ्यूल के कुछ कार्गो भी हाल के दिनों में डिस्काउंट पर बिके हैं, जो बाजार में बढ़ती उपलब्धता का संकेत है।
गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों का अनुमान है कि जुलाई के अंत तक पर्शियन गल्फ से तेल निर्यात युद्ध-पूर्व स्तरों तक वापस पहुंच सकता है।
अमेरिका-ईरान समझौते की मुख्य बातें
होर्मुज स्ट्रेट के फिर से खुलने के पीछे अमेरिका और ईरान के बीच हुआ 14 बिंदुओं वाला मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) प्रमुख कारण माना जा रहा है।
इस समझौते में होर्मुज स्ट्रेट से व्यावसायिक आवाजाही बहाल करने, ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों को जारी करने, पुनर्निर्माण के लिए 300 अरब डॉलर तक की सहायता, प्रतिबंधों में आंशिक ढील और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर 60 दिन की वार्ता प्रक्रिया शुरू करने जैसे कदम शामिल हैं।
हालांकि यह अभी अंतिम समझौता नहीं है। दोनों देशों को अगले 60 दिनों में व्यापक और स्थायी समझौते पर सहमति बनानी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौट सकती है।
निष्कर्ष
होर्मुज स्ट्रेट का दोबारा खुलना वैश्विक तेल बाजार के लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है। जहां एक ओर इससे सप्लाई संबंधी चिंताएं कम होंगी, वहीं दूसरी ओर जरूरत से ज्यादा तेल उपलब्ध होने का जोखिम भी पैदा हो सकता है। भारत के लिए यह राहत भरी खबर है क्योंकि इससे आयात बिल, महंगाई और ऊर्जा सुरक्षा तीनों मोर्चों पर फायदा मिलने की संभावना है।


