Judge Ravi Kumar Diwakar: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की फास्ट-ट्रैक अदालत के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर इन दिनों अपने लगातार दिए जा रहे मृत्युदंड के फैसलों को लेकर चर्चा में हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी अदालत ने पिछले करीब पांच महीनों में 11 अलग-अलग मामलों में कुल 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई है। ताजा मामला दहेज हत्या से जुड़ा है, जिसमें अदालत ने नदीम नाम के दोषी को फांसी की सजा सुनाई।
इन फैसलों के बीच जज दिवाकर की अदालत में लंबित हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े बड़ी संख्या में मामलों को प्रशासनिक आदेश के तहत दूसरे कोर्ट में ट्रांसफर किए जाने की खबर भी सामने आई है। हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि सेशन कोर्ट से मिली मौत की सजा का मतलब तत्काल फांसी होना नहीं है। मृत्युदंड को लागू करने के लिए हाई कोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है।
दहेज हत्या के मामले में नदीम को मौत की सजा
मुजफ्फरनगर की अदालत ने सोमवार, 7 सितंबर को 2018 के एक दहेज हत्या मामले में नदीम को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। सरकारी वकील कुलदीप कुमार के मुताबिक, अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने नदीम को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 और 504 के तहत दोषी माना। अदालत ने उस पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, नदीम पर आरोप था कि उसने 23 जुलाई 2018 को मुजफ्फरनगर के शाहपुर कस्बे में दहेज की मांग को लेकर अपनी पत्नी शहजादी को आग लगा दी थी। घटना के समय शहजादी की उम्र करीब 23 वर्ष बताई गई थी।
गंभीर रूप से झुलसी शहजादी को इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। अभियोजन के अनुसार, मौत से पहले शहजादी का बयान दर्ज किया गया था, जिसमें उसने अपने पति पर आग लगाने का आरोप लगाया था।
पुलिस ने नवंबर 2018 में नदीम, उसकी मां शमशिदा और बहन सोनी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के अभाव में सोनी को बरी कर दिया गया, जबकि शमशिदा की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई।
23 मौत की सजाओं के बाद करीब 100 मामले दूसरे कोर्ट में भेजे गए
जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा लगातार मृत्युदंड सुनाए जाने के बीच उनके कोर्ट में लंबित गंभीर आपराधिक मामलों को लेकर भी प्रशासनिक बदलाव हुआ।
सरकारी वकील के अनुसार, हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े करीब 100 मामलों को जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में भेज दिया गया। बाद की रिपोर्टों में प्रशासनिक आदेश के तहत 97 मामलों को रिकॉल किए जाने की बात सामने आई।
इन मामलों में ऐसे अपराध शामिल हैं, जिनमें कानून के तहत मौत की सजा या उम्रकैद का प्रावधान हो सकता है।
मुजफ्फरनगर जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी के अनुसार, कुछ वकीलों और वादकारियों के बीच यह आशंका थी कि जज दिवाकर के सामने लंबित गंभीर मामलों में भी मृत्युदंड दिया जा सकता है। इसके बाद जिला जज ने प्रशासनिक अधिकारों के तहत मामलों को अपने कोर्ट में वापस बुला लिया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मामलों का ट्रांसफर न्यायिक फैसले के बजाय प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत किया गया था।
जज रवि कुमार दिवाकर के चर्चित मृत्युदंड के फैसले
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने 11 मामलों में 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाई। इनमें हत्या, अपहरण, लूट के दौरान हत्या और अन्य गंभीर अपराधों के मामले शामिल हैं।
इन चर्चित मामलों की तारीखवार सूची इस प्रकार है:
- 6 अप्रैल: वकील मोहम्मद समीर की 2019 में हुई हत्या के मामले में तीन दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई। मामला कथित तौर पर करीब 45 लाख रुपये के आर्थिक विवाद से जुड़ा था।
- 28 अप्रैल: 2019 के एक हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों समेत चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया।
- 30 मई: वर्ष 2011 में एक महिला और उसके छह वर्षीय बेटे की हत्या के मामले में रहिस को मौत की सजा सुनाई गई।
- 20 जून: राजेंद्र सैनी हत्याकांड में गजेंद्र और रामकिरण को फांसी की सजा सुनाई गई।
- 2 जुलाई: ड्यूटी पर तैनात होमगार्ड रतिराम की हत्या के मामले में दीपक को मौत की सजा सुनाई गई।
- 6 जुलाई: वर्ष 2010 में राजबीर सिंह की हत्या के मामले में पूर्व ग्राम प्रधान प्रमोद और उसके सहयोगी सहदेव को मृत्युदंड दिया गया।
- 17 जुलाई: 2011 में लूट की कोशिश के दौरान किसान राज सिंह की हत्या के मामले में चार दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई।
- 12 अगस्त: वर्ष 1999 में पांच लाख रुपये की फिरौती के लिए लकड़ी व्यापारी सलीम के अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को मौत की सजा दी गई।
- 13 अगस्त: शामली में पुरानी रंजिश से जुड़े 2014 के हत्या मामले में रामवीर, राजीव, राहुल और हरेंद्र कुमार को मृत्युदंड सुनाया गया।
- 7 सितंबर: 2018 के दहेज हत्या मामले में नदीम को मौत की सजा सुनाई गई।
इन फैसलों को मिलाकर जज दिवाकर की अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की संख्या 23 बताई जा रही है।
क्या 23 दोषियों को अब फांसी दे दी जाएगी?
नहीं। यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।
सेशन कोर्ट द्वारा किसी दोषी को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद उसे तुरंत फांसी नहीं दी जाती। भारतीय कानून के तहत मृत्युदंड के मामले में हाई कोर्ट की पुष्टि आवश्यक होती है। यानी ट्रायल कोर्ट का फैसला अंतिम चरण नहीं है।
दोषी को हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती देने का अधिकार भी होता है। इसके बाद मामला आगे सुप्रीम कोर्ट तक जा सकता है। इसलिए जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा 23 दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि इन सभी दोषियों को अब तत्काल फांसी दी जाएगी।
पूरे उत्तर प्रदेश के आंकड़ों से क्यों हो रही तुलना?
जज दिवाकर की अदालत से कुछ ही महीनों में 23 मृत्युदंड के फैसले सामने आने के कारण इसकी तुलना पूरे उत्तर प्रदेश के वार्षिक आंकड़ों से भी की जा रही है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश की ट्रायल अदालतों ने 20 मामलों में कुल 28 मौत की सजाएं सुनाई थीं। ऐसे में मुजफ्फरनगर की एक अदालत द्वारा कुछ महीनों में 23 मृत्युदंड के फैसले सुनाया जाना असामान्य रूप से बड़ा आंकड़ा माना जा रहा है।
हालांकि, अलग-अलग वर्षों, अदालतों और मामलों के आंकड़ों की तुलना करते समय संबंधित आधिकारिक न्यायिक रिकॉर्ड को देखना जरूरी है।
कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?
रवि कुमार दिवाकर का जन्म जुलाई 1980 में हुआ था। वह मूल रूप से लखनऊ, उत्तर प्रदेश के रहने वाले बताए जाते हैं। उन्होंने बीकॉम और एलएलएम की पढ़ाई की है।
वर्ष 2009 में उन्होंने अतिरिक्त सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा में प्रवेश किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में न्यायिक पदों पर सेवाएं दीं। उनकी पोस्टिंग सुल्तानपुर, बदायूं, वाराणसी और बरेली सहित कई स्थानों पर रही है।
नवंबर 2025 से वह मुजफ्फरनगर में अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के तौर पर तैनात हैं।
2022 में ज्ञानवापी मामले से मिली राष्ट्रीय पहचान
जज रवि कुमार दिवाकर को देशभर में पहचान वर्ष 2022 में मिली थी। उस समय वह वाराणसी में सिविल जज के पद पर कार्यरत थे।
उन्होंने ज्ञानवापी परिसर से जुड़े मामले में वीडियोग्राफिक सर्वे कराने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया था और जज दिवाकर भी सुर्खियों में आए थे।
फैसलों में जज दिवाकर की टिप्पणियां भी चर्चा में
लगातार मृत्युदंड के फैसलों के कारण जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत की टिप्पणियां भी चर्चा में रही हैं। एक फैसले में उनके नाम से यह टिप्पणी रिपोर्ट की गई कि वह डरपोक जज कहलाने के बजाय अपने सिद्धांतों पर कायम रहना पसंद करेंगे।
रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने अपने फैसले में न्यायिक पद और फैसले लेने के अधिकार से जुड़े अपने विचार भी व्यक्त किए। कुछ रिपोर्टों में उनके द्वारा बाहरी दबाव और संभावित तबादले से जुड़े संदेश का उल्लेख किए जाने की बात भी सामने आई है।
हालांकि, ऐसी टिप्पणियों और दावों का आकलन करते समय संबंधित अदालती आदेश के मूल रिकॉर्ड को प्राथमिक स्रोत माना जाना चाहिए।
जज दिवाकर के फैसलों पर क्यों हो रही इतनी चर्चा?
जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से कुछ ही महीनों में 23 मृत्युदंड के फैसले सामने आना इस मामले को असाधारण बनाता है। खासतौर पर ऐसे समय में जब मौत की सजा भारतीय न्याय व्यवस्था में सबसे कठोर दंड है और इसे लागू करने से पहले कई न्यायिक स्तरों पर समीक्षा होती है।
इस पूरे मामले में दो बातें अलग-अलग समझना जरूरी है—पहली, ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी को मौत की सजा सुनाना, और दूसरी, उस सजा का अंतिम रूप से लागू होना। 23 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बावजूद इनमें से प्रत्येक मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
इसलिए फिलहाल इसे जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत द्वारा सुनाई गई 23 मृत्युदंड की सजाओं के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि 23 दोषियों को फांसी दिए जाने के रूप में।


