नई दिल्ली। भारत में अरहर दाल की कीमतों में दिवाली से पहले नरमी देखने को मिली है। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच देश में तुअर यानी अरहर दाल का आयात 44 फीसदी बढ़कर 6.25 लाख टन पहुंच गया। पिछले साल इसी अवधि में भारत ने 4.34 लाख टन अरहर का आयात किया था। विदेशों से बढ़ी सप्लाई और कमजोर घरेलू मांग के कारण प्रमुख मंडियों में अरहर की कीमतों पर दबाव बना हुआ है। हालांकि, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक राज्यों में सूखे की स्थिति ने आने वाले महीनों में फसल और आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
इंडिया पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के बाजार अपडेट के मुताबिक, 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह के दौरान घरेलू और आयातित अरहर की कीमतों में लगातार दूसरे सप्ताह गिरावट दर्ज की गई। कुछ प्रमुख बाजारों में कीमतें 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक नीचे आ गईं। ऐसे में उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना के बीच किसानों और कारोबारियों की नजर अब खरीफ फसल की पैदावार और आगामी सीजन की सप्लाई पर है।
अरहर दाल का आयात 44 फीसदी बढ़ा
भारत में दालों की घरेलू मांग को पूरा करने के लिए आयात महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साल 2026 के शुरुआती आठ महीनों में तुअर के आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। जनवरी से अगस्त के दौरान आयात बढ़कर 6.25 लाख टन हो गया, जबकि पिछले साल समान अवधि में यह 4.34 लाख टन था।
आंकड़ों के मुताबिक, इस अवधि में भारत ने म्यांमार, मोजाम्बिक, तंजानिया और सूडान सहित कई देशों से अरहर खरीदी। विदेशी सप्लाई में बढ़ोतरी से घरेलू बाजार में उपलब्धता को सहारा मिला है। इसका असर मंडियों में कीमतों पर भी देखने को मिला।
अरहर की कीमतों में गिरावट की एक प्रमुख वजह म्यांमार से अपेक्षाकृत कम कीमत पर आयात की पेशकश रही। इसके अलावा रुपये में मजबूती, कमजोर मांग और बाजार में नकदी की सीमित उपलब्धता ने भी खरीदारी की रफ्तार को प्रभावित किया।
म्यांमार और अफ्रीकी देशों से कितनी आई अरहर?
IPGA के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जनवरी-अगस्त 2026 के दौरान भारत ने अलग-अलग देशों से बड़ी मात्रा में तुअर का आयात किया।
- मोजाम्बिक: 2.29 लाख टन से अधिक
- म्यांमार: 1.53 लाख टन से अधिक
- तंजानिया: 1.10 लाख टन
- सूडान: 71,808 टन
- अन्य देश: कुल 61,138 टन
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत की अरहर आपूर्ति में अफ्रीकी देशों और म्यांमार की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्धता, निर्यातक देशों की फसल और आयात की कीमतों में बदलाव का सीधा असर भारतीय मंडियों पर पड़ सकता है।
यदि विदेशी बाजारों से प्रतिस्पर्धी कीमतों पर पर्याप्त अरहर उपलब्ध रहती है, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। दूसरी ओर, आयात में कमी या अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने पर घरेलू बाजार में फिर से मजबूती देखने को मिल सकती है।
दो सप्ताह से गिर रही हैं अरहर की कीमतें
IPGA के साप्ताहिक बाजार अपडेट के मुताबिक, 24 अक्टूबर को समाप्त सप्ताह में देसी और आयातित अरहर दोनों की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। बाजार में मांग कमजोर रहने और कम कीमत पर आयात की उपलब्धता ने कारोबारियों की खरीदारी को सीमित रखा।
गुलबर्गा और अकोला जैसे प्रमुख बाजारों में अरहर की कीमतें साप्ताहिक आधार पर करीब 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक घट गईं। वहीं, मुंबई में अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर की कीमतों में मूल देश के आधार पर 50 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आई।
कीमतों में इस नरमी के पीछे कई वजहें हैं। सबसे पहले, त्योहारी सीजन की अधिकांश मांग पूरी हो चुकी है। दूसरा, आयातित अरहर अपेक्षाकृत सस्ती उपलब्ध होने से खरीदारों के पास विकल्प बढ़े हैं। तीसरा, बाजार में नकदी की कमी और मिलों की सीमित खरीदारी ने कीमतों को सहारा मिलने से रोका है।
दाल मिलें फिलहाल कच्ची अरहर खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकाने से बच रही हैं। वे जरूरत के मुताबिक खरीदारी कर रही हैं। इससे मंडियों में मांग कमजोर बनी हुई है और कीमतों में तेजी आने की रफ्तार सीमित हो गई है।
दिवाली के बाद भी सस्ती रहेगी अरहर?
दिवाली से पहले अरहर की कीमतों में आई गिरावट से बाजार में नरमी का संकेत जरूर मिला है, लेकिन आने वाले दिनों में कीमतें किस दिशा में जाएंगी, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा।
अगर आयातित अरहर की आवक बनी रहती है और घरेलू मांग कमजोर रहती है, तो कीमतों पर दबाव जारी रह सकता है। लेकिन यदि खरीफ फसल का उत्पादन अनुमान से कम रहता है, तो आगे चलकर बाजार में उपलब्धता घट सकती है। ऐसी स्थिति में मौजूदा गिरावट के बाद कीमतों में दोबारा मजबूती आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
यहां यह समझना जरूरी है कि मंडी में अरहर की कीमतों में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि खुदरा बाजार में अरहर दाल भी उतनी ही सस्ती हो जाएगी। उपभोक्ताओं को मिलने वाली कीमत पर मिलिंग लागत, परिवहन, थोक और खुदरा कारोबारियों का मार्जिन तथा स्थानीय मांग का भी असर पड़ता है।
इसलिए ग्राहकों को राहत कितनी मिलेगी, यह खुदरा बाजार में कीमतों के वास्तविक बदलाव पर निर्भर करेगा।
महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे से फसल पर खतरा
अरहर की मौजूदा कीमतों में नरमी के बावजूद कृषि क्षेत्र के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में सूखे की स्थिति से खरीफ 2026 की फसल प्रभावित होने की आशंका है।
कर्नाटक के कालबुर्गी क्षेत्र में किसान खड़ी तुअर की फसल को बचाने के लिए बारिश का इंतजार कर रहे हैं। किसानों के मुताबिक, फसल को दोबारा संभलने के लिए कम से कम एक-दो बार बारिश की जरूरत है। यदि पर्याप्त नमी नहीं मिलती है, तो पौधों के विकास और अंतिम पैदावार पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
महाराष्ट्र में भी प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों की मौसम संबंधी स्थिति पर बाजार की नजर बनी हुई है। अरहर की फसल के लिए पर्याप्त नमी महत्वपूर्ण होती है। लंबे समय तक बारिश नहीं होने पर फूल आने, फलियां बनने और दाने के विकास की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
यदि सूखे का असर व्यापक रहता है, तो बुवाई का रकबा बढ़ने के बावजूद वास्तविक उत्पादन में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाएगी। इसका असर आगामी महीनों में घरेलू बाजार की आपूर्ति पर पड़ सकता है।
अरहर की बुवाई का रकबा 47.25 लाख हेक्टेयर पहुंचा
कृषि आंकड़ों के मुताबिक, खरीफ 2026 के दौरान अरहर की बुवाई का रकबा 1.3 फीसदी बढ़कर 47.25 लाख हेक्टेयर हो गया। पिछले साल समान अवधि में यह आंकड़ा 45.95 लाख हेक्टेयर था।
बुवाई के रकबे में बढ़ोतरी सामान्य तौर पर उत्पादन की संभावनाओं के लिए सकारात्मक संकेत मानी जाती है। हालांकि, कृषि उत्पादन केवल बुवाई के क्षेत्र पर निर्भर नहीं करता। मौसम, मिट्टी में नमी, कीटों का प्रकोप और फसल की देखभाल जैसे कारक भी अंतिम पैदावार को प्रभावित करते हैं।
इसलिए अरहर की बुवाई का क्षेत्र बढ़ने के बावजूद सूखे से प्रभावित इलाकों में उत्पादन घटने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बाजार को वास्तविक स्थिति का बेहतर अनुमान फसल की बढ़वार, बारिश और कटाई के करीब मिलने वाले उत्पादन संकेतों से ही मिलेगा।
कम आयात और कमजोर फसल से बढ़ सकती हैं कीमतें
अरहर बाजार के लिए आने वाले सप्ताह महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। एक तरफ विदेशी बाजारों से आयात बढ़ने के कारण फिलहाल घरेलू कीमतों पर दबाव है। दूसरी तरफ, प्रमुख उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी से फसल की पैदावार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
इसके अलावा, अफ्रीकी देशों से आयात उम्मीद से कम रहने की स्थिति में भी आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। अगले सीजन में कीमतें बढ़ने की संभावना को देखते हुए कुछ स्टॉकिस्ट और व्यापारी अपनी उपज बेचने में जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं। इससे बाजार में उपलब्ध माल और कीमतों के बीच संतुलन प्रभावित हो सकता है।
यदि घरेलू फसल अच्छी रहती है और आयात भी पर्याप्त मात्रा में जारी रहता है, तो बाजार में उपलब्धता बेहतर बनी रह सकती है। लेकिन उत्पादन में गिरावट और आयात में कमी एक साथ देखने को मिलती है, तो कीमतों में तेजी आने का जोखिम बढ़ जाएगा।
अरहर खरीदने वालों और किसानों के लिए क्या है संकेत?
उपभोक्ताओं के लिए मौजूदा कीमतों में गिरावट राहत का संकेत है, लेकिन खुदरा कीमतों में कमी की निगरानी करना जरूरी होगा। मंडियों में कीमतें घटने के बाद खुदरा बाजार में उसका असर आने में समय लग सकता है।
दूसरी ओर, किसानों के लिए फसल की वास्तविक स्थिति और मंडी में आवक महत्वपूर्ण रहेगी। जिन क्षेत्रों में पर्याप्त नमी उपलब्ध है, वहां उत्पादन की संभावनाएं बेहतर रह सकती हैं। सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में पैदावार को लेकर जोखिम बना हुआ है।
व्यापारियों और दाल मिलों के लिए आयात की कीमतें, घरेलू फसल के संकेत और मांग की स्थिति प्रमुख कारक रहेंगे। फिलहाल बाजार में नरमी के बावजूद भविष्य में कीमतों की दिशा को लेकर निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
निष्कर्ष: भारत में जनवरी-अगस्त 2026 के दौरान अरहर का आयात 44 फीसदी बढ़कर 6.25 लाख टन होने से घरेलू बाजार में उपलब्धता को समर्थन मिला है। इसी वजह से प्रमुख मंडियों में कीमतों में 200 से 300 रुपये प्रति क्विंटल तक गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे का खतरा तथा आगामी खरीफ फसल की पैदावार को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। आने वाले समय में अरहर की कीमतें आयात की रफ्तार, घरेलू उत्पादन, बारिश और मांग के संतुलन से तय होंगी।
Source: इंडिया पल्सेज एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के बाजार अपडेट और उपलब्ध कृषि आंकड़ों पर आधारित।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य सूचना के उद्देश्य से है। मंडी भाव और खुदरा कीमतें स्थान, गुणवत्ता और समय के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।


