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    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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India Export: वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत के निर्यात में 13.84% की बढ़ोतरी, पहली छमाही में आंकड़ा 476 अरब डॉलर के पार

Namam Sharma
Last updated: 2026/10/15 at 7:54 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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भारत के निर्यात मोर्चे पर वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान वस्तुओं और सेवाओं का कुल निर्यात बढ़कर 476.20 अरब डॉलर पहुंचने का अनुमान है। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा 418.31 अरब डॉलर था। इस तरह सालाना आधार पर कुल निर्यात में 13.84 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इलेक्ट्रॉनिक सामान, इंजीनियरिंग उत्पादों और पेट्रोलियम उत्पादों जैसे क्षेत्रों के बेहतर प्रदर्शन ने इस बढ़ोतरी में अहम भूमिका निभाई है।

Contents
पहली छमाही में वस्तुओं के निर्यात में 18.51% की वृद्धिसेवाओं के निर्यात से भी मिली मजबूतीसेवाओं के व्यापार अधिशेष में भी बढ़ोतरीसितंबर में आयात भी बढ़ा, व्यापार संतुलन पर रहेगी नजरअमेरिका, सिंगापुर और मलेशिया में बढ़ी भारतीय उत्पादों की मांगइलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम उत्पादों का शानदार प्रदर्शनआगे निर्यात की रफ्तार बनाए रखना क्यों होगा जरूरी?

एजेंसी, नई दिल्ली। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर 2026 में भारत का कुल निर्यात 80.75 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। सितंबर 2025 के 72.75 अरब डॉलर के मुकाबले यह लगभग 10.99 प्रतिशत अधिक है। निर्यात में यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज की गई है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा, मांग में उतार-चढ़ाव और वैश्विक व्यापार की अनिश्चितताएं निर्यातकों के सामने चुनौतियां पेश कर रही हैं।

पहली छमाही में वस्तुओं के निर्यात में 18.51% की वृद्धि

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में भारत के वस्तुओं के निर्यात में उल्लेखनीय तेजी दर्ज की गई। अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान वस्तुओं का निर्यात बढ़कर 259.89 अरब डॉलर हो गया, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 219.30 अरब डॉलर था। इस तरह वस्तुओं के निर्यात में सालाना आधार पर 18.51 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

वस्तुओं के निर्यात में यह बढ़ोतरी भारतीय विनिर्माण क्षेत्र और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों की विदेशी बाजारों में मांग के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग सामान, रसायन और पेट्रोलियम उत्पाद जैसे क्षेत्र भारत के निर्यात कारोबार में अहम योगदान देते हैं। इन क्षेत्रों में दर्ज हुई सकारात्मक वृद्धि से कुल निर्यात के आंकड़ों को मजबूती मिली है।

हालांकि, निर्यात में लगातार वृद्धि बनाए रखने के लिए भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धी कीमतों, उत्पादों की गुणवत्ता और समय पर आपूर्ति जैसे पहलुओं पर भी ध्यान देना होगा।

सेवाओं के निर्यात से भी मिली मजबूती

भारत के कुल निर्यात में वस्तुओं के साथ सेवाओं का योगदान भी महत्वपूर्ण बना हुआ है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-सितंबर 2026-27 के दौरान सेवाओं का अनुमानित निर्यात 216.31 अरब डॉलर रहा। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 199.02 अरब डॉलर था। इस प्रकार सेवाओं के निर्यात में लगभग 8.69 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

भारत सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर सेवाओं, कारोबारी सेवाओं और अन्य पेशेवर सेवाओं के क्षेत्र में वैश्विक बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सेवाओं के निर्यात में बढ़ोतरी से देश को विदेशी मुद्रा अर्जित करने में मदद मिलती है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारत की स्थिति मजबूत होती है।

सितंबर 2026 में सेवाओं का अनुमानित निर्यात 36.35 अरब डॉलर रहा, जबकि सितंबर 2025 में यह 36.67 अरब डॉलर था। इसका मतलब है कि महीने के आधार पर सेवाओं के निर्यात में मामूली गिरावट दर्ज की गई। इसलिए पहली छमाही में सेवाओं के बेहतर प्रदर्शन के बावजूद मासिक आंकड़ों पर भी नजर रखना जरूरी है।

सेवाओं के व्यापार अधिशेष में भी बढ़ोतरी

अप्रैल-सितंबर 2026-27 के दौरान भारत का सेवाओं के व्यापार में अधिशेष 102.71 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह 98.77 अरब डॉलर था। इस तरह सेवाओं के व्यापार अधिशेष में लगभग 3.99 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

व्यापार अधिशेष का अर्थ है कि सेवाओं के निर्यात से प्राप्त होने वाली राशि, सेवाओं के आयात पर होने वाले खर्च से अधिक है। भारत के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेवाओं के क्षेत्र में मजबूत निर्यात प्रदर्शन वस्तुओं के व्यापार में होने वाले घाटे के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद कर सकता है।

सितंबर में आयात भी बढ़ा, व्यापार संतुलन पर रहेगी नजर

निर्यात के साथ-साथ आयात में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। सितंबर 2026 में वस्तुओं और सेवाओं का कुल आयात 94.05 अरब डॉलर रहने का अनुमान है, जो सितंबर 2025 की तुलना में 8.19 प्रतिशत अधिक है।

सितंबर में कुल निर्यात 80.75 अरब डॉलर और कुल आयात 94.05 अरब डॉलर रहने के अनुमान के आधार पर वस्तुओं एवं सेवाओं के संयुक्त व्यापार में लगभग 13.30 अरब डॉलर का अंतर दिखाई देता है। हालांकि, ये आंकड़े अनुमानित हैं और अंतिम आंकड़ों में बदलाव संभव है।

आयात में बढ़ोतरी के पीछे कच्चे माल, ऊर्जा, औद्योगिक उपकरणों और घरेलू उद्योगों की जरूरतों जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए केवल आयात में वृद्धि को नकारात्मक संकेत मानना उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति समझने के लिए निर्यात, आयात और व्यापार संतुलन को एक साथ देखना जरूरी है।

अमेरिका, सिंगापुर और मलेशिया में बढ़ी भारतीय उत्पादों की मांग

भारत के निर्यात में कुछ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय बाजारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मंत्रालय के अनुसार, सितंबर 2026 में अमेरिका को होने वाले निर्यात के मूल्य में पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में 47.99 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं, सिंगापुर में 169.16 प्रतिशत और मलेशिया में 119.69 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

इसके अलावा, मिस्र में निर्यात मूल्य 90.09 प्रतिशत और चीन में 24.05 प्रतिशत बढ़ा। इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय उत्पादों के लिए अलग-अलग क्षेत्रीय बाजारों में मांग के अवसर मौजूद हैं।

अप्रैल-सितंबर 2026-27 के दौरान भी कई निर्यात बाजारों में मजबूत वृद्धि दर्ज की गई। सिंगापुर में निर्यात मूल्य में 103.05 प्रतिशत, अमेरिका में 11.11 प्रतिशत, चीन में 36.07 प्रतिशत, तंजानिया में 122.51 प्रतिशत और मलेशिया में 82.85 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

हालांकि, इन बाजारों में निर्यात वृद्धि की दर अलग-अलग रहने के पीछे उत्पादों की मांग, व्यापार समझौतों, आपूर्ति व्यवस्था और पिछले वर्ष के आधार स्तर जैसे कारक हो सकते हैं। किसी एक महीने की वृद्धि को लंबे समय की प्रवृत्ति मानने के बजाय लगातार कई महीनों के आंकड़ों का विश्लेषण करना अधिक उपयोगी होगा।

इलेक्ट्रॉनिक्स और पेट्रोलियम उत्पादों का शानदार प्रदर्शन

सितंबर 2026 में कई प्रमुख उत्पाद श्रेणियों के निर्यात में सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई। इलेक्ट्रॉनिक सामान सबसे आगे रहे, जिनके निर्यात मूल्य में पिछले वर्ष के समान महीने की तुलना में 70.44 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

इसके अलावा, अन्य अनाज के निर्यात में 49.88 प्रतिशत, हस्तशिल्प में 43.19 प्रतिशत और मांस, डेयरी एवं पोल्ट्री उत्पादों में 35.18 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात में 31.90 प्रतिशत की वृद्धि हुई। वहीं, प्लास्टिक और लिनोलियम उत्पादों में 24.81 प्रतिशत, कार्बनिक एवं अकार्बनिक रसायनों में 24.21 प्रतिशत और इंजीनियरिंग सामान में 20.91 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। रत्न एवं आभूषणों के निर्यात में भी 18.95 प्रतिशत की सकारात्मक वृद्धि दर्ज की गई।

इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में तेज वृद्धि भारत की विनिर्माण क्षमता और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में बढ़ती भागीदारी के लिहाज से महत्वपूर्ण है। इंजीनियरिंग सामान और रसायनों में वृद्धि औद्योगिक निर्यात की मजबूती को दर्शाती है। वहीं, कृषि आधारित उत्पादों, खाद्य उत्पादों और हस्तशिल्प में बढ़ोतरी से विभिन्न क्षेत्रों के निर्यातकों को लाभ मिलने की संभावना है।

आगे निर्यात की रफ्तार बनाए रखना क्यों होगा जरूरी?

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के आंकड़े भारत के निर्यात कारोबार के लिए सकारात्मक संकेत देते हैं। कुल निर्यात में 13.84 प्रतिशत और वस्तुओं के निर्यात में 18.51 प्रतिशत की वृद्धि यह दिखाती है कि भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग के अवसर बने हुए हैं।

इसके बावजूद आने वाले महीनों में निर्यात की गति कई कारकों पर निर्भर करेगी। वैश्विक आर्थिक विकास, प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों की मांग, कच्चे तेल की कीमतें, माल ढुलाई की लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों में बदलाव का असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है।

सरकार और उद्योग के सामने अब चुनौती इस वृद्धि को लंबे समय तक बनाए रखने की है। इसके लिए नए निर्यात बाजारों तक पहुंच, उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार, विनिर्माण लागत को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना और छोटे एवं मध्यम निर्यातकों को बेहतर सुविधाएं देना महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर, पहली छमाही में 476.20 अरब डॉलर का अनुमानित निर्यात भारत के विदेशी व्यापार के लिए उत्साहजनक संकेत है। हालांकि, पूरे वित्त वर्ष का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले महीनों में वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात किस गति से बढ़ता है और वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय कंपनियां अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को कितना मजबूत बनाए रखती हैं।

Source: वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के जारी आंकड़ों पर आधारित।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दिए गए निर्यात और आयात संबंधी आंकड़े उपलब्ध सरकारी जानकारी पर आधारित अनुमान हैं। अंतिम आंकड़ों में संशोधन संभव है।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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