Highlights
- हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में भारत 80वें स्थान पर।
- भारतीय पासपोर्ट धारकों को 56 देशों में आसान यात्रा सुविधा।
- पासपोर्ट की ताकत का सीधा संबंध GDP से नहीं होता।
- प्रति व्यक्ति आय, माइग्रेशन रिस्क और कूटनीति निभाते हैं बड़ी भूमिका।
नई दिल्ली। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। पिछले एक दशक में देश की अर्थव्यवस्था लगभग दोगुनी हो चुकी है और भारत वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन जब बात पासपोर्ट की ताकत की आती है तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 के अनुसार भारतीय पासपोर्ट दुनिया में 80वें स्थान पर है। हालांकि पिछले वर्ष की तुलना में इसमें सुधार हुआ है। 2025 में भारत 85वें स्थान पर था, लेकिन इसके बावजूद भारतीय पासपोर्ट अभी भी दुनिया के टॉप-50 सबसे शक्तिशाली पासपोर्टों की सूची से काफी दूर है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब भारत की अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है तो फिर भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग अपेक्षाकृत कमजोर क्यों बनी हुई है?

क्या इकोनॉमी का आकार तय करता है पासपोर्ट की ताकत?
सामान्य धारणा यह है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होगी, उसका पासपोर्ट उतना ही शक्तिशाली होगा। लेकिन वैश्विक आंकड़े इस धारणा को पूरी तरह सही साबित नहीं करते।
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका का पासपोर्ट भी अब शीर्ष स्थानों पर नहीं है। हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 में अमेरिका 10वें स्थान पर है और उससे ऊपर 35 से अधिक देशों के पासपोर्ट मौजूद हैं।
इसी तरह चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन उसकी पासपोर्ट रैंकिंग 59वें स्थान पर है। दूसरी ओर जर्मनी, फ्रांस, इटली और जापान जैसे देश लगातार शीर्ष स्थानों पर बने हुए हैं।
सबसे दिलचस्प उदाहरण संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का है। कुछ वर्षों पहले तक UAE की रैंकिंग 38वें स्थान के आसपास थी, लेकिन मजबूत कूटनीति और वीजा समझौतों की बदौलत वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली पासपोर्टों में शामिल हो गया और दूसरे स्थान तक पहुंच गया।
इससे साफ है कि केवल GDP का आकार पासपोर्ट की मजबूती तय नहीं करता।
पड़ोसी देशों की तुलना में भारत की स्थिति
| देश | पासपोर्ट रैंक | वीजा फ्री/आसान एक्सेस |
|---|---|---|
| भारत | 80 | 56 |
| चीन | 59 | 83 |
| भूटान | 87 | 48 |
| श्रीलंका | 93 | 40 |
| बांग्लादेश | 96 | 36 |
| नेपाल | 97 | 35 |
| पाकिस्तान | 100 | 30 |
आंकड़ों से स्पष्ट है कि भारत दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों से बेहतर स्थिति में है, लेकिन चीन जैसे देशों से अभी काफी पीछे है।
भारतीय पासपोर्ट धारकों को कितनी यात्रा स्वतंत्रता?
हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 के अनुसार भारतीय पासपोर्ट रखने वाले नागरिकों को 56 देशों और क्षेत्रों में बिना पूर्व वीजा, वीजा-ऑन-अराइवल या इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल ऑथराइजेशन (ETA) की सुविधा मिलती है।
इसके विपरीत दुनिया के लगभग 170 देशों में भारतीय नागरिकों को यात्रा से पहले वीजा प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है। भारत को वीजा में छूट देने वाले अधिकांश देश अफ्रीका, कैरेबियन और दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में स्थित हैं।
यही कारण है कि भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग अभी भी सीमित दायरे में बनी हुई है।
आखिर कैसे तय होती है पासपोर्ट की रैंकिंग?
हेनले पासपोर्ट इंडेक्स इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) के डेटा के आधार पर तैयार किया जाता है। इसमें मुख्य रूप से यह देखा जाता है कि किसी देश के नागरिक बिना पूर्व वीजा के कितने देशों की यात्रा कर सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार पासपोर्ट की ताकत तय करने में निम्नलिखित कारक अहम भूमिका निभाते हैं।
1. प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income)
किसी देश के नागरिकों की औसत आय जितनी अधिक होती है, उन्हें आर्थिक रूप से अधिक सक्षम माना जाता है। ऐसे देशों के नागरिकों को दूसरे देशों में बसने का जोखिम कम माना जाता है, जिससे वीजा नियम आसान हो सकते हैं।
2. माइग्रेशन रिस्क
कई विकसित देश यह आकलन करते हैं कि किसी देश के नागरिक पर्यटन या शिक्षा के नाम पर जाकर अवैध रूप से बस तो नहीं जाएंगे। भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देशों के लिए यह एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है।
3. दस्तावेज सुरक्षा
पासपोर्ट की तकनीकी सुरक्षा, बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली और दस्तावेज सत्यापन की विश्वसनीयता भी वीजा छूट समझौतों को प्रभावित करती है।
4. कूटनीतिक संबंध
दुनिया के विभिन्न देशों के साथ मजबूत कूटनीतिक रिश्ते और द्विपक्षीय समझौते पासपोर्ट की ताकत बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। UAE की सफलता इसका सबसे बड़ा उदाहरण मानी जाती है।
पिछले 20 वर्षों में भारतीय पासपोर्ट का प्रदर्शन
यदि पिछले दो दशकों के आंकड़ों को देखा जाए तो भारतीय पासपोर्ट की रैंकिंग लगातार 70 से 90 के बीच ही बनी रही है।
- 2006 में भारत 71वें स्थान पर था।
- 2012 में रैंकिंग गिरकर 82वें स्थान पर पहुंच गई।
- 2015 में भारत 88वें स्थान तक फिसल गया।
- 2018 में सुधार हुआ और रैंक 81 रही।
- 2024 में भारत ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और 62 गंतव्यों तक आसान पहुंच हासिल की।
- 2026 में भारत 80वें स्थान पर पहुंच गया है।
हालांकि सुधार जरूर हुआ है, लेकिन इसकी रफ्तार अभी भी सीमित है।
भारत को आगे क्या करना होगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय पासपोर्ट की ताकत बढ़ाने के लिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अधिक देशों के साथ वीजा-मुक्त यात्रा समझौते करने होंगे। साथ ही प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, वैश्विक स्तर पर मजबूत कूटनीतिक संबंध और माइग्रेशन संबंधी चिंताओं को कम करना भी जरूरी होगा।
भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, G20 जैसी अंतरराष्ट्रीय पहलों में नेतृत्व और दुनिया के विभिन्न देशों के साथ बढ़ते रणनीतिक संबंध भविष्य में भारतीय पासपोर्ट की स्थिति को मजबूत कर सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत की अर्थव्यवस्था पिछले 10 वर्षों में दोगुनी हो चुकी है, लेकिन पासपोर्ट की ताकत केवल GDP के आकार से तय नहीं होती। यात्रा स्वतंत्रता, प्रति व्यक्ति आय, माइग्रेशन रिस्क, दस्तावेज सुरक्षा और कूटनीतिक संबंध जैसे कई कारक मिलकर किसी देश के पासपोर्ट की वास्तविक ताकत निर्धारित करते हैं। यही वजह है कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के बावजूद भारतीय पासपोर्ट अभी 80वें स्थान पर है। हालांकि आने वाले वर्षों में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका इसकी रैंकिंग को और बेहतर बना सकती है।


