नई दिल्ली: वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चुनौतीपूर्ण रह सकती है। वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उतार-चढ़ाव का असर देश की आर्थिक गतिविधियों पर देखने को मिल सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यह दबाव केवल अस्थायी होगा और भारत की लंबी अवधि की विकास कहानी अब भी मजबूत बनी हुई है।
प्राइस वॉटरहाउस (PwC) LLP के पार्टनर अभिषेक रारा का कहना है कि मौजूदा चुनौतियों के बावजूद भारत आने वाले वर्षों में 6.5% से 7% या उससे अधिक की आर्थिक वृद्धि हासिल करने की क्षमता रखता है।
पहली तिमाही में रह सकता है दबाव
ANI से बातचीत में अभिषेक रारा ने कहा कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में कुछ वैश्विक कारणों से आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। हालांकि, इसे लंबे समय की कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में जारी अनिश्चितताओं का असर भारत पर भी पड़ सकता है, लेकिन देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत है और दीर्घकालिक विकास की दिशा सकारात्मक बनी हुई है।
6.5% से 7% की ग्रोथ बरकरार रहने की उम्मीद
रारा के अनुसार, विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और आर्थिक अनुमानों को देखें तो भारत की अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में लगातार मजबूत गति से आगे बढ़ने की क्षमता रखती है। उनका मानना है कि अस्थायी झटकों के बावजूद देश की ग्रोथ 6.5% से 7% या उससे अधिक के स्तर पर बनी रह सकती है।
लॉन्ग टर्म ग्रोथ में उतार-चढ़ाव सामान्य
उन्होंने कहा कि किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था में समय-समय पर बाहरी कारणों से रुकावटें आती हैं। कुछ तिमाहियों में वृद्धि दर अपेक्षा से कम रह सकती है, लेकिन यह लंबी अवधि की विकास यात्रा का सामान्य हिस्सा है।
रारा ने कहा कि निवेशकों और उद्योग जगत को इन अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को लेकर अधिक चिंतित होने की जरूरत नहीं है।
निवेशकों के लिए क्यों अहम है ‘Credible Growth’?
‘Credible Growth: Capital, Entrepreneurship and Financial Reporting‘ विषय पर आयोजित एक इंडस्ट्री चर्चा में रारा ने कहा कि निवेशक केवल अच्छी कमाई ही नहीं, बल्कि मजबूत कॉर्पोरेट गवर्नेंस और पारदर्शी वित्तीय रिपोर्टिंग भी चाहते हैं।
उनके मुताबिक, जिन कंपनियों की गवर्नेंस व्यवस्था मजबूत होती है, उनमें निवेशकों का भरोसा भी अधिक होता है और ऐसे व्यवसाय लंबी अवधि में बेहतर प्रदर्शन करते हैं।
डिजिटल KYC से बढ़ रहा फाइनेंशियल इन्क्लूजन
रारा ने सरकार की डिजिटल पहलों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि eKYC (Electronic Know Your Customer) जैसी सुविधाओं ने लोगों के लिए बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच आसान बना दी है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल यह व्यवस्था भारत में रहने वाले लोगों के लिए सुचारु रूप से काम कर रही है और सरकार अब एनआरआई (NRI) तथा विदेशी नागरिकों के लिए भी डिजिटल KYC प्रक्रिया को सरल बनाने पर काम कर रही है।
उद्योग जगत क्या चाहता है?
रारा के अनुसार, उद्योग जगत सरकार से ऐसे नियामकीय माहौल की उम्मीद करता है जिसमें निवेश करना आसान हो और कंपनियों पर अनुपालन (Compliance) का बोझ कम किया जाए।
उन्होंने कहा कि छोटे और बड़े दोनों प्रकार के कारोबार चाहते हैं कि नियमों का पालन करने की प्रक्रिया सरल बने, ताकि वे निवेश बढ़ा सकें और कारोबार के विस्तार पर अधिक ध्यान दे सकें।
भारत की अर्थव्यवस्था पर भरोसा कायम
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक चुनौतियां कुछ समय के लिए भारत की विकास दर पर असर डाल सकती हैं, लेकिन देश की मजबूत घरेलू मांग, डिजिटल अर्थव्यवस्था, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और सुधारों के चलते लंबी अवधि में आर्थिक विकास की रफ्तार बनी रहने की पूरी संभावना है।


