नई दिल्ली: भारत के परिधान (Apparel) निर्यात उद्योग के लिए अमेरिकी बाजार से राहत और चुनौती दोनों तरह की खबरें सामने आई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा शांति समझौते के बाद अमेरिकी खरीदारों ने भारतीय कपड़ा निर्यातकों से दोबारा संपर्क करना शुरू कर दिया है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने कीमतों में 5% से 10% तक की कटौती की मांग रख दी है, जिससे भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ गई है।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अमेरिकी खरीदारों की यह मांग ऐसे समय में आई है जब भारतीय निर्यातकों का मार्जिन पहले से ही दबाव में है। इसके बावजूद उन्हें ऑर्डर बनाए रखने के लिए कीमतों में छूट देने पर विचार करना पड़ रहा है।
अमेरिकी खरीदार मांग रहे 10% तक की छूट
तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (TEA) के अध्यक्ष के.एम. सुब्रमण्यम के अनुसार, अमेरिकी बाजार से पूछताछ फिर शुरू हुई है, लेकिन खरीदार पहले की तुलना में कम कीमतों पर सौदे करना चाहते हैं। उनका कहना है कि निर्यातकों को ऑर्डर तो मिल रहे हैं, लेकिन कीमतों पर दबाव काफी ज्यादा है।
ओरिएंट क्राफ्ट के मालिक सुधीर ढींगरा ने बताया कि स्प्रिंग 2027 सीजन के ऑर्डर के लिए अमेरिकी कंपनियां 10% तक डिस्काउंट मांग रही हैं। भारतीय निर्यातकों के पास इन शर्तों को स्वीकार करने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं क्योंकि प्रतिस्पर्धी देशों ने वैश्विक बाजार में अपनी स्थिति मजबूत कर ली है।
वियतनाम और इंडोनेशिया क्यों निकल गए आगे?
विशेषज्ञों का मानना है कि वियतनाम, इंडोनेशिया और कंबोडिया जैसे देशों ने ‘चाइना+1’ रणनीति का फायदा भारत की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से उठाया है।
इन देशों को बढ़त मिलने के प्रमुख कारण हैं:
- कम उत्पादन लागत
- तेज और कुशल सप्लाई चेन
- कम लीड टाइम
- उत्पादों की व्यापक रेंज
- अंतरराष्ट्रीय खरीदारों का अधिक भरोसा
- बेहतर लॉजिस्टिक्स और बंदरगाह सुविधाएं
इन कारणों से वैश्विक ब्रांड और अमेरिकी रिटेलर बड़ी मात्रा में ऑर्डर इन देशों को दे रहे हैं, जबकि भारत को कीमतों में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ रही है।
लगातार छठे महीने गिरा रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट
भारत के रेडीमेड गारमेंट (RMG) निर्यात में मई 2026 के दौरान लगातार छठे महीने गिरावट दर्ज की गई। सालाना आधार पर निर्यात में 14.1% की कमी आई है।
इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका में कमजोर मांग मानी जा रही है। अमेरिका भारत के कपड़ा निर्यात का सबसे बड़ा बाजार है और कुल परिधान निर्यात में उसकी हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई है। ऐसे में अमेरिकी बाजार में मांग और कीमतों का दबाव सीधे भारतीय उद्योग को प्रभावित करता है।
गिरावट के पीछे ये भी हैं बड़े कारण
उद्योग संगठनों के मुताबिक केवल कमजोर मांग ही समस्या नहीं है। कई अन्य कारण भी निर्यात को प्रभावित कर रहे हैं।
इनमें शामिल हैं:
- अमेरिकी उपभोक्ताओं की सतर्क खरीदारी
- खुदरा बिक्री में सुस्ती
- वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
- प्रतिस्पर्धी देशों की बढ़ती हिस्सेदारी
- अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स की लागत घटाने की रणनीति
सुब्रमण्यम के अनुसार, डॉलर के आधार पर निर्यात में 14.2% की गिरावट दर्ज हुई, जबकि भारतीय रुपये में यह गिरावट लगभग 3.6% रही। इसका कारण रुपये का कमजोर होना है, जिससे निर्यातकों को कुछ हद तक राहत मिली।
रुपये की कमजोरी ने दिया थोड़ा सहारा
पिछले एक साल में भारतीय रुपये की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 9.8% कमजोर हुई है। डॉलर जहां पहले लगभग 80 रुपये के आसपास था, वहीं अब यह 90 रुपये के करीब पहुंच गया है।
रुपये में आई इस गिरावट से निर्यातकों को डॉलर में प्राप्त होने वाली आय का मूल्य बढ़ा है, जिससे कुछ हद तक नुकसान की भरपाई हो सकी है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल मुद्रा विनिमय दर के सहारे लंबे समय तक प्रतिस्पर्धा बनाए रखना संभव नहीं है।
ब्रिटेन और यूरोप से मिली राहत
अमेरिका में कमजोर मांग के बीच भारतीय निर्यातकों के लिए एक सकारात्मक खबर यह है कि कई अन्य बाजारों में मांग बढ़ रही है। ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), जर्मनी, स्पेन और इटली जैसे देशों में भारतीय कपड़ों का निर्यात बढ़ा है।
उद्योग का मानना है कि भारत द्वारा नए बाजारों की तलाश और निर्यात गंतव्यों में विविधता लाने की रणनीति का असर दिखने लगा है।
सुधीर ढींगरा के अनुसार, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से आने वाले वर्षों में भारतीय परिधान उद्योग को बड़ा फायदा मिल सकता है। इससे टैरिफ बाधाएं कम होंगी और भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी।
आगे क्या है चुनौती?
भारतीय परिधान उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती लागत प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और सप्लाई चेन को मजबूत बनाने की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत को वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से मुकाबला करना है तो उसे उत्पादन क्षमता, लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी समय में बड़े सुधार करने होंगे।
अमेरिकी बाजार अभी भी भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बना हुआ है। ऐसे में वहां की मांग में सुधार और बेहतर व्यापारिक समझौते भारतीय निर्यात उद्योग के लिए आने वाले महीनों में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
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