अमेरिका और ईरान के बीच समझौता (U.S.-Iran Deal) होने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में राहत के संकेत दिखाई देने लगे हैं। कच्चे तेल की कीमतों में भी नरमी आने लगी है। ऐसे में आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब हवाई यात्रा सस्ती हो जाएगी? लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल ऐसा होने की उम्मीद नहीं है।
नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहे तनाव और संघर्ष पर विराम लगने के बाद तेल बाजार में स्थिरता लौटने लगी है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जहाजों की आवाजाही सामान्य होने की दिशा में बढ़ रही है और कच्चे तेल की सप्लाई पर मंडरा रहा बड़ा खतरा भी कम हुआ है। इसके बावजूद अगले तीन से चार महीनों तक फ्लाइट टिकटों के सस्ते होने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है।
इस तिमाही में किराया घटने की उम्मीद कम
एविएशन इंडस्ट्री के जानकारों के मुताबिक एयरलाइंस कंपनियां अपने परिचालन खर्च और टिकट मूल्य निर्धारण की योजना कई महीने पहले तय कर लेती हैं। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल आई गिरावट का असर फ्लाइट टिकटों पर तुरंत दिखाई नहीं देता।
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश एयरलाइंस ने आने वाले तीन-चार महीनों के लिए ईंधन लागत और संचालन बजट तय कर रखा है। ऐसे में अचानक किराए घटाने की संभावना बहुत कम है।
ATF अभी भी पहले से काफी महंगा
इजरायल-ईरान संघर्ष शुरू होने से पहले एयर टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं। लेकिन युद्ध के दौरान तेल आपूर्ति बाधित होने और जोखिम बढ़ने से ATF की लागत में तेज उछाल आया।
हालांकि अब हालात सुधर रहे हैं, लेकिन ATF की कीमतें अभी भी संघर्ष से पहले के स्तर पर नहीं पहुंची हैं। यही वजह है कि एयरलाइंस पर लागत का दबाव बना हुआ है।
एयरलाइंस का सबसे बड़ा खर्च है ईंधन
एयरलाइन कंपनियों के कुल परिचालन खर्च में जेट ईंधन का हिस्सा सबसे अधिक होता है।
- नए विमानों वाली एयरलाइंस में कुल लागत का 25% से 35% हिस्सा ATF पर खर्च होता है।
- पुराने विमानों का संचालन करने वाली कंपनियों में यह हिस्सा 40% से 50% तक पहुंच जाता है।
- ईंधन लागत में मामूली बदलाव भी एयरलाइंस की कमाई और टिकट कीमतों पर बड़ा असर डालता है।
युद्ध के दौरान एयरलाइंस ने खुद भी उठाया बोझ
जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा था और ईंधन महंगा हुआ था, तब कई एयरलाइंस ने पूरी लागत यात्रियों पर नहीं डाली। उन्होंने बढ़े हुए खर्च का एक हिस्सा खुद वहन किया और बाकी टिकट कीमतों में बढ़ोतरी करके वसूला।
अब जबकि यात्री ऊंचे किराए पर भी यात्रा कर रहे हैं, एयरलाइंस के पास तत्काल टिकट सस्ता करने की ज्यादा व्यावसायिक मजबूरी नहीं है।
तेल सप्लाई चेन को सामान्य होने में लगेगा समय
विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध के दौरान कई तेल कुओं, रिफाइनरियों और भंडारण सुविधाओं का संचालन प्रभावित हुआ था। कुछ स्थानों पर उत्पादन रोकना पड़ा और कई तेल टैंकरों ने सुरक्षा कारणों से अपने रूट बदल दिए।
अब समझौते के बाद भी पूरी सप्लाई चेन को सामान्य होने में समय लगेगा।
- बंद तेल कुओं को दोबारा शुरू करना आसान नहीं होता।
- रिफाइनरियों और भंडारण सुविधाओं की जांच व मरम्मत करनी पड़ती है।
- समुद्री टैंकरों को पुराने रूट पर लौटने में समय लगेगा।
- वैश्विक तेल आपूर्ति को स्थिर स्तर पर आने में कई सप्ताह लग सकते हैं।
कब मिल सकती है राहत?
विशेषज्ञों के अनुसार यदि पश्चिम एशिया में शांति बनी रहती है और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट जारी रहती है तो वर्ष की अगली तिमाही में एयरलाइंस के ईंधन खर्च में कमी आ सकती है। इसके बाद प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर कंपनियां किराए में कुछ राहत दे सकती हैं।
हालांकि फिलहाल यात्रियों को अगले कुछ महीनों तक महंगे फ्लाइट टिकटों के लिए तैयार रहना होगा। होर्मुज खुलने और तेल कीमतों में नरमी के बावजूद एविएशन सेक्टर में राहत का असर जमीन पर दिखने में समय लगेगा।
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