भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में देश की जीडीपी में लगातार विस्तार देखने को मिला है और भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। इसके बावजूद प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत अभी विकसित देशों से काफी पीछे है। ऐसे में अगला बड़ा लक्ष्य सिर्फ अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि विकास की रफ्तार को लंबे समय तक बनाए रखना और रोजगार, आय तथा उत्पादकता में सुधार करना भी है।
इनवेस्टमेंट बैंक Equirus की हालिया रिपोर्ट ने भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक बड़ा अनुमान पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर देश अलग-अलग क्षेत्रों में जरूरी सुधारों को तेजी से लागू करता है तो भारत वर्ष 2036 तक करीब 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। हालांकि, इसके लिए कई क्षेत्रों में एक साथ बड़े नीतिगत बदलाव करने की जरूरत होगी।
Equirus के एमडी और चेयरमैन अजय गर्ग के मुताबिक, भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए करीब 20 बड़े रिफॉर्म्स की जरूरत है। उनका कहना है कि यदि अर्थव्यवस्था में पिछले 10 वर्षों जैसी ही सेक्टर-वाइज ग्रोथ जारी रहती है और बड़े सुधार नहीं किए जाते, तो 20 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनने में लगभग 21 साल लग सकते हैं।
अभी भारत की इकोनॉमी करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की
भारत की अर्थव्यवस्था का आकार करीब 4 ट्रिलियन डॉलर के आसपास पहुंच चुका है। इस लिहाज से भारत कई यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाओं से बड़ा है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू प्रति व्यक्ति आय है। भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी लगभग 3,000 डॉलर के आसपास बताई गई है।
यही वजह है कि भारत के लिए केवल कुल जीडीपी का आंकड़ा बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। आर्थिक विकास का फायदा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए उत्पादकता, रोजगार, निवेश और प्रति व्यक्ति आय में भी तेज वृद्धि जरूरी होगी।
अजय गर्ग का मानना है कि भारत को एक साथ कई मोर्चों पर सुधार करने होंगे। अगर इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है तो अगले एक दशक में अर्थव्यवस्था का आकार मौजूदा स्तर से कई गुना बढ़ सकता है।
बिना बड़े रिफॉर्म्स के 20 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने में लग सकते हैं 21 साल
Equirus ने अपनी रिपोर्ट में भारत के लिए जरूरी सुधारों का रोडमैप पेश किया है। रिपोर्ट का तर्क है कि अगर देश के अलग-अलग सेक्टर उसी गति से बढ़ते हैं जिस गति से उन्होंने पिछले एक दशक में प्रदर्शन किया है, तो 20 ट्रिलियन डॉलर के लक्ष्य तक पहुंचने में करीब 21 साल लग सकते हैं।
इसका मतलब है कि मौजूदा ग्रोथ रेट अपने आप में भारत को 2036 तक 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। ग्रोथ को और तेज करने के लिए सरकार और नीति निर्माताओं को ऐसे सुधार करने होंगे, जिनसे निवेश बढ़े, कारोबार करना आसान हो और भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत हो।
हालांकि, इस अनुमान में डॉलर के मुकाबले रुपये में संभावित मजबूती को शामिल नहीं किया गया है। अगर भविष्य में रुपये की विनिमय दर में अनुकूल बदलाव होता है तो डॉलर में मापी जाने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार अलग तरीके से प्रभावित हो सकता है।
कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट को मजबूत करना जरूरी
Equirus की रिपोर्ट में जिन अहम क्षेत्रों पर जोर दिया गया है, उनमें कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट प्रमुख है। भारत में इक्विटी मार्केट की तुलना में कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट अभी भी अपेक्षाकृत कम विकसित माना जाता है।
कंपनियों के लिए बैंक लोन और शेयर बाजार के अलावा बॉन्ड मार्केट भी पूंजी जुटाने का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। अगर कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट का विस्तार होता है तो बड़ी कंपनियों के साथ-साथ इंफ्रास्ट्रक्चर और लंबी अवधि वाली परियोजनाओं के लिए भी पूंजी उपलब्धता बढ़ सकती है।
अजय गर्ग के मुताबिक, बॉन्ड मार्केट के विकास में टैक्स से जुड़े नियम भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। कुछ वर्ष पहले डेट म्यूचुअल फंड्स से जुड़े टैक्स नियमों में बदलाव हुआ था, जिसके बाद इस तरह के निवेश उत्पादों का आकर्षण प्रभावित हुआ।
बॉन्ड पर टैक्स नियमों में बदलाव की जरूरत
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि बॉन्ड से जुड़े टैक्स नियमों को इक्विटी के समान अधिक अनुकूल बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। इसका उद्देश्य घरेलू निवेशकों के लिए डेट इंस्ट्रूमेंट्स को अधिक आकर्षक बनाना और बॉन्ड मार्केट में निवेश का आधार बढ़ाना है।
एक मजबूत बॉन्ड मार्केट से सरकार और निजी कंपनियों दोनों को लंबी अवधि की पूंजी जुटाने में मदद मिल सकती है। खासकर इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में बड़े निवेश के लिए लंबी अवधि के फाइनेंसिंग विकल्प बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
मैन्युफैक्चरिंग के साथ सर्विस सेक्टर पर भी फोकस
भारत की आर्थिक रणनीति में मैन्युफैक्चरिंग को लंबे समय से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। लेकिन Equirus की रिपोर्ट के मुताबिक, आने वाले वर्षों में सर्विस सेक्टर को भी ज्यादा प्राथमिकता देने की जरूरत है।
भारत पहले से ही आईटी और बिजनेस सर्विसेज के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में फाइनेंशियल मार्केट्स, ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स यानी GCC, टूरिज्म और एजुकेशन जैसे क्षेत्रों में सुधार और निवेश से देश की आर्थिक क्षमता को और बढ़ाया जा सकता है।
इन क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और भारत को ग्लोबल सर्विस हब के रूप में स्थापित करने की काफी संभावनाएं हैं।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर बन सकते हैं बड़ा ग्रोथ इंजन
भारत में ग्लोबल कंपनियां लगातार अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का विस्तार कर रही हैं। इन केंद्रों में टेक्नोलॉजी, रिसर्च, फाइनेंस, एनालिटिक्स, इंजीनियरिंग और अन्य हाई-वैल्यू सेवाओं से जुड़े काम किए जाते हैं।
अगर भारत इन गतिविधियों के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल मानव संसाधन और आसान कारोबारी माहौल उपलब्ध कराता है तो GCC सेक्टर आने वाले वर्षों में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश और हाई-स्किल नौकरियां आकर्षित कर सकता है।
इससे केवल सर्विस एक्सपोर्ट बढ़ाने में मदद नहीं मिलेगी, बल्कि भारतीय शहरों में रोजगार और आर्थिक गतिविधियां भी बढ़ सकती हैं।
टूरिज्म और एजुकेशन में भी बड़ी संभावनाएं
भारत के लिए टूरिज्म ऐसा क्षेत्र है जिसमें रोजगार और विदेशी मुद्रा कमाने की काफी क्षमता है। देश में ऐतिहासिक स्थल, धार्मिक पर्यटन, प्राकृतिक पर्यटन, मेडिकल टूरिज्म और सांस्कृतिक विरासत जैसी कई खूबियां हैं।
बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी, होटल क्षमता और पर्यटन सेवाओं में सुधार से भारत वैश्विक पर्यटकों के लिए और आकर्षक बन सकता है।
इसी तरह शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधार जरूरी माना गया है। उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता, रिसर्च, विदेशी छात्रों को आकर्षित करने और स्किल आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने से भारत की मानव पूंजी मजबूत हो सकती है।
रेलवे में निजी भागीदारी से बदल सकता है सेक्टर
रिपोर्ट में रेलवे के क्षेत्र में निजी भागीदारी और सुधारों की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। अजय गर्ग ने इसके लिए टेलीकॉम सेक्टर का उदाहरण दिया।
टेलीकॉम सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए अधिक खोलने के बाद भारत में मोबाइल और इंटरनेट सेवाओं का तेजी से विस्तार हुआ। प्रतिस्पर्धा बढ़ने से सेवाओं की पहुंच आबादी के बड़े हिस्से तक हुई और टैरिफ में भी लंबे समय में बड़ी कमी देखने को मिली।
इसी तरह रेलवे में भी निजी भागीदारी और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने से सेवा की गुणवत्ता, दक्षता और निवेश में सुधार की संभावना हो सकती है। हालांकि, रेलवे जैसे रणनीतिक और बड़े सार्वजनिक क्षेत्र में निजीकरण का तरीका और उसकी सीमा महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे।
20 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी के लिए सिर्फ GDP बढ़ाना काफी नहीं
भारत के लिए 20 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना एक बड़ा आर्थिक लक्ष्य होगा। लेकिन इस लक्ष्य की सफलता केवल जीडीपी के आंकड़े से नहीं मापी जानी चाहिए। देश के लिए यह भी जरूरी होगा कि आर्थिक विकास से रोजगार के अवसर बढ़ें, प्रति व्यक्ति आय में सुधार हो और उत्पादकता में तेजी आए।
इसके लिए पूंजी बाजार, बैंकिंग और फाइनेंस, सर्विसेज, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में सुधारों की जरूरत होगी।
Equirus का अनुमान इसी बात की ओर इशारा करता है कि यदि भारत अपनी मौजूदा आर्थिक क्षमता को संरचनात्मक सुधारों के साथ जोड़ता है तो विकास की रफ्तार को और तेज किया जा सकता है।
क्या 2036 तक 20 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी बनना संभव है?
Equirus का अनुमान बताता है कि सही नीतिगत सुधारों के साथ भारत 2036 तक 20 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है। लेकिन यह लक्ष्य कई आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति, तेल की कीमतें, ब्याज दरें, विदेशी निवेश, रुपये की विनिमय दर, घरेलू मांग और भारत की उत्पादकता जैसे कई कारक भविष्य की ग्रोथ को प्रभावित करेंगे।
इसलिए 20 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य एक संभावित आर्थिक रोडमैप के तौर पर देखा जाना चाहिए, न कि निश्चित परिणाम के रूप में। इसके लिए लगातार उच्च आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ ऐसे सुधारों की जरूरत होगी जो निवेश और उत्पादकता को लंबे समय तक बढ़ावा दें।
अगर भारत इन सुधारों को प्रभावी तरीके से लागू करने में सफल रहता है तो 2036 का दशक भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हो सकता है। वहीं, अगर सुधारों की रफ्तार धीमी रहती है और अर्थव्यवस्था पिछले दशक की गति से ही बढ़ती है, तो इस लक्ष्य तक पहुंचने में अधिक समय लग सकता है।


