नई दिल्ली: भारतीय रुपया सिर्फ अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ही नहीं, बल्कि चीन की मुद्रा युआन के सामने भी कमजोर पड़ता जा रहा है। इसका सीधा असर उन भारतीय कंपनियों और कारोबारियों पर पड़ रहा है जो चीन से कच्चा माल, मशीनरी या इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स आयात करते हैं। बढ़ती आयात लागत ने कई कंपनियों के बजट को प्रभावित किया है और मुनाफे पर दबाव बढ़ा दिया है।
कमजोर रुपये से बढ़ी आयात लागत
रुपये में गिरावट का सबसे बड़ा असर उन उद्योगों पर दिख रहा है जो चीन से कच्चे माल और कंपोनेंट्स की खरीद पर निर्भर हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो कंपोनेंट्स, सोलर उपकरण, मशीनरी, केमिकल्स और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की कंपनियों की लागत लगातार बढ़ रही है।
शक्ति पंप्स के डायरेक्टर और सीएमओ अंकित पाटीदार के अनुसार, रुपये के कमजोर होने से निर्यातकों को कुछ प्रतिस्पर्धात्मक फायदा जरूर मिलता है, लेकिन दूसरी तरफ इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, मैग्नेट, सेमीकंडक्टर्स, कॉपर और एल्युमिनियम जैसे जरूरी आयातित सामान महंगे हो जाते हैं। इससे कंपनियों का लागत ढांचा बिगड़ता है और मुनाफा घटता है।
इसी तरह मैसूर डीप परफ्यूमरी हाउस के पार्टनर अंकित अग्रवाल का कहना है कि चाहे भुगतान डॉलर में किया जाए या युआन में, आयात लागत में लगातार वृद्धि हो रही है। वहीं वैश्विक मांग कमजोर रहने से निर्यात ऑर्डर भी अपेक्षित गति से नहीं बढ़ रहे हैं।
कुछ कंपनियां युआन में कारोबार पर कर रहीं विचार
डॉलर की मजबूती और रुपये की कमजोरी के बीच कुछ भारतीय व्यवसायों ने चीन के साथ सीधे युआन में लेन-देन की संभावनाएं तलाशनी शुरू की हैं। उनका मानना है कि इससे डॉलर के जरिए होने वाले अतिरिक्त मुद्रा जोखिम और ट्रांजेक्शन लागत को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह विकल्प अभी सीमित दायरे में ही उपयोगी है। बड़ी और संगठित कंपनियों के पास विदेशी मुद्रा प्रबंधन के लिए विशेष टीमें और बैंकिंग सुविधाएं होती हैं, जबकि अधिकांश MSME कारोबारी अभी भी डॉलर आधारित भुगतान प्रणाली को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक मानते हैं।
MSMEs के लिए अभी भी डॉलर ही पहली पसंद
विशेषज्ञों के अनुसार भारत के छोटे और मध्यम उद्योगों में युआन आधारित व्यापार का चलन अभी बहुत कम है। इसकी बड़ी वजह बैंकिंग प्रक्रियाओं की जटिलता, सीमित जानकारी और मुद्रा जोखिम को लेकर चिंता है।
जानकारों का मानना है कि जब तक बैंक युआन में भुगतान और सेटलमेंट की प्रक्रिया को डॉलर जितना आसान नहीं बनाते, तब तक छोटे कारोबारियों के लिए इसे अपनाना मुश्किल रहेगा। इसके लिए प्रशिक्षण, जागरूकता और बेहतर बैंकिंग सपोर्ट की जरूरत होगी।
क्या युआन में कारोबार करना सुरक्षित है?
अर्थशास्त्रियों और जोखिम प्रबंधन विशेषज्ञों का कहना है कि युआन में व्यापार करना हर स्थिति में फायदेमंद नहीं है। चीन का केंद्रीय बैंक समय-समय पर युआन की विनिमय दर को प्रभावित कर सकता है, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा हो सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रेड सेटलमेंट और करेंसी रिस्क मैनेजमेंट दो अलग-अलग चीजें हैं। केवल इस उम्मीद में युआन अपनाना कि वह डॉलर जैसा व्यवहार करेगा, सही रणनीति नहीं मानी जा सकती। यदि किसी कंपनी की आय युआन में नहीं है और उसे केवल आयात भुगतान के लिए युआन खरीदना पड़ता है, तो मुद्रा जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।
भारत-चीन व्यापार घाटा भी बड़ी चिंता
भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा काफी बड़ा है। ऐसे में यदि भारतीय कंपनियां बड़े पैमाने पर युआन में भुगतान करने लगती हैं, जबकि उनके पास युआन में कमाई का स्रोत नहीं है, तो चीन की मुद्रा और भुगतान प्रणाली पर निर्भरता बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दीर्घकालिक समाधान युआन में भुगतान नहीं, बल्कि आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू विनिर्माण बढ़ाना और सप्लाई चेन में विविधता लाना है। इससे विदेशी मुद्रा जोखिम भी कम होगा और भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता भी मजबूत होगी।
आयात पर निर्भरता घटाना ही स्थायी समाधान
उद्योग जगत का मानना है कि युआन में व्यापार कुछ परिस्थितियों में अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। भारत को घरेलू उत्पादन बढ़ाने, वैकल्पिक सप्लायर देशों की तलाश करने और स्थानीय सप्लाई चेन को मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। यही रणनीति भविष्य में रुपये की कमजोरी से होने वाले नुकसान को कम करने में सबसे प्रभावी साबित हो सकती है।


