Income Tax Notice: बेंगलुरु के एक टैक्सपेयर को इनकम टैक्स से जुड़े मामले में बड़ी राहत नहीं मिल पाई। आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की बेंगलुरु बेंच ने करीब चार साल की देरी से दाखिल की गई अपील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। मामला बैंक खाते में जमा ₹41.69 लाख की नकदी को अघोषित आय मानने से जुड़ा है।
टैक्सपेयर ने दलील दी थी कि उसे आयकर विभाग की कार्रवाई की जानकारी काफी समय बाद हुई, जब विदेश यात्रा के लिए वीजा आवेदन करते समय उससे ITR से जुड़े दस्तावेज मांगे गए। उसने यह भी कहा कि उसकी सालाना आय ₹5 लाख से कम थी और परिवार के सदस्य उसके खर्च उठाते थे। इसी वजह से वह नियमित रूप से ITR दाखिल नहीं करता था और आयकर विभाग की ईमेल या ऑनलाइन सूचनाओं पर भी ध्यान नहीं दे पाया।
हालांकि, ITAT ने इन दलीलों को इतनी लंबी देरी को माफ करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
बैंक में जमा ₹41.69 लाख पर उठा सवाल
यह मामला बेंगलुरु निवासी रेड्डी से संबंधित है। टैक्सपेयर के अनुसार, उनकी आमदनी का प्रमुख स्रोत किराये से होने वाली आय थी और सालाना आय ₹5 लाख से कम थी।
आयकर विभाग की जांच में उनके बैंक खाते में ₹41.69 लाख की नकद जमा सामने आई। आयकर अधिकारी ने इस रकम को आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत अघोषित धन माना।
इसके अलावा, विभाग ने करीब ₹3.69 लाख की अघोषित क्रेडिट और ₹1.50 लाख की बिजनेस या प्रोफेशनल इनकम भी आय में जोड़ दी। इसके बाद टैक्स देनदारी के साथ ब्याज और पेनल्टी की कार्रवाई भी शुरू हुई।
टैक्सपेयर ने क्या दलील दी?
टैक्सपेयर का कहना था कि उसे आयकर विभाग की कार्यवाही की जानकारी समय पर नहीं मिल सकी। उसके मुताबिक, मार्च 2023 में विदेश जाने के लिए वीजा आवेदन करते समय उसे ITR से संबंधित जरूरत का पता चला और तभी उसे पिछली टैक्स कार्रवाई के बारे में जानकारी मिली।
उसने यह भी दावा किया कि:
- उसकी सालाना आय ₹5 लाख से कम थी।
- उसके रोजमर्रा के खर्च पत्नी और पिता उठाते थे।
- उसे आयकर नियमों की पर्याप्त जानकारी नहीं थी।
- वह नियमित रूप से ईमेल और इनकम टैक्स पोर्टल चेक नहीं करता था।
- कोविड-19 महामारी के कारण भी परिस्थितियां कठिन रही थीं।
- बाद में टैक्स प्रोफेशनल की मदद लेकर उसने अपील दाखिल की।
लेकिन इन दलीलों के बावजूद अपील दाखिल करने में काफी लंबी देरी हो चुकी थी।
अपील में हुई करीब 1480 दिन की देरी
मामला ITAT के सामने पहुंचने तक मुख्य अपील दाखिल करने में लगभग 1480 दिन की देरी हो चुकी थी। वहीं, दो पेनल्टी अपीलों में करीब 1298 दिन की देरी हुई।
सबसे पहले Commissioner of Income Tax (Appeals) यानी CIT(A)/NFAC के स्तर पर देरी माफ कराने की मांग की गई। लेकिन वहां भी टैक्सपेयर को राहत नहीं मिली।
CIT(A) का मानना था कि देरी के लिए दिए गए कारण सामान्य प्रकृति के हैं और उनके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज या ठोस सबूत पेश नहीं किए गए।
इसके बाद टैक्सपेयर ने ITAT का रुख किया।
ITAT ने देरी माफ करने से क्यों किया इनकार?
ITAT ने मामले पर विचार करते हुए पाया कि टैक्सपेयर पहले के वर्षों में ITR दाखिल कर चुका था। ऐसे में यह तर्क कि उसे आयकर नियमों की जानकारी नहीं थी, पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जा सकता।
ट्रिब्यूनल ने माना कि कुछ परिस्थितियों में लंबी देरी को माफ किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए संबंधित व्यक्ति को देरी का ठोस, विश्वसनीय और प्रमाणित कारण बताना जरूरी होता है।
सिर्फ यह कहना कि टैक्स नियमों की जानकारी नहीं थी या बाद में कार्रवाई का पता चला, हजारों दिनों की देरी को अपने आप उचित नहीं बना देता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
ITAT ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसके अनुसार केवल सहानुभूति के आधार पर अत्यधिक देरी को माफ नहीं किया जा सकता।
किसी अपील में हुई देरी को माफ कराने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय कारण दिखाना जरूरी है। खासकर तब, जब देरी कई वर्षों की हो।
इस मामले में ITAT को टैक्सपेयर की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण इतने पर्याप्त नहीं लगे कि करीब चार साल की देरी को माफ किया जा सके।
₹41.69 लाख की टैक्स बढ़ोतरी पर ITAT ने क्या कहा?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। ITAT ने इस स्तर पर यह फैसला नहीं दिया कि ₹41.69 लाख को धारा 69A के तहत अघोषित आय मानना सही था या गलत।
ट्रिब्यूनल के सामने मुख्य मुद्दा अपील में हुई अत्यधिक देरी को माफ करने से जुड़ा था। चूंकि देरी माफ नहीं की गई, इसलिए अपील पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई नहीं हो सकी।
इसका मतलब यह है कि संबंधित टैक्स, ब्याज और पेनल्टी से जुड़े पहले के आदेश फिलहाल प्रभावी रहते हैं।
अब टैक्सपेयर के पास क्या विकल्प है?
ITAT के इस आदेश के बाद टैक्सपेयर के पास कानूनी रास्ते सीमित हो गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वह आयकर अधिनियम की धारा 260A के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख कर सकता है, यदि मामले में कानून का महत्वपूर्ण प्रश्न बनता है।
हालांकि, हाईकोर्ट में जाने के लिए भी मामले की कानूनी स्थिति और अपील की स्वीकार्यता महत्वपूर्ण होगी।
टैक्सपेयर्स के लिए क्या है सबक?
यह मामला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिन्हें आयकर विभाग से नोटिस या ऑनलाइन सूचना मिलती है। केवल नोटिस को नजरअंदाज करने या ईमेल/इनकम टैक्स पोर्टल नियमित रूप से नहीं देखने से बाद में समस्या बढ़ सकती है।
अगर किसी व्यक्ति को आयकर विभाग की ओर से नोटिस मिलता है, तो उसे समय सीमा के भीतर उसका जवाब देना चाहिए। यदि कोई वास्तविक परेशानी है, तो समय रहते टैक्स एक्सपर्ट या चार्टर्ड अकाउंटेंट से सलाह लेना बेहतर होता है।
ध्यान दें: यह मामला ITAT में अपील की देरी से संबंधित आदेश पर आधारित है। ₹41.69 लाख की रकम को अघोषित आय मानने की मूल कार्रवाई की वैधता पर ITAT ने इस अपील में अंतिम निर्णय नहीं दिया।


