भारत में एक समय ऐसा था जब कलाई पर बंधी घड़ी सिर्फ समय देखने का साधन नहीं बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी। आज की तरह मोबाइल फोन हर हाथ में नहीं था और न ही स्मार्टवॉच का दौर था। उस समय यदि किसी युवक को नौकरी मिलती, कोई छात्र परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करता या किसी शादी में दामाद को सम्मानित करना होता, तो उपहार के रूप में HMT की घड़ी देना गर्व की बात मानी जाती थी।
HMT यानी हिंदुस्तान मशीन टूल्स की घड़ियां दशकों तक भारतीय बाजार की पहचान बनी रहीं। एक दौर में भारतीय घड़ी बाजार के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से पर HMT का कब्जा था। लेकिन जिस कंपनी को कभी “देश की धड़कन” कहा जाता था, वह धीरे-धीरे बाजार से गायब हो गई और अंततः 2016 में उसका घड़ी कारोबार बंद हो गया। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश की सबसे लोकप्रिय घड़ी कंपनी इतिहास बनकर रह गई?
आत्मनिर्भर भारत के शुरुआती सपनों में शामिल था HMT
HMT की स्थापना वर्ष 1953 में भारत सरकार ने एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के रूप में की थी। उस समय देश स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में था और सरकार का लक्ष्य औद्योगिक आत्मनिर्भरता हासिल करना था। शुरुआत में कंपनी मशीन टूल्स बनाने का काम करती थी, लेकिन बाद में इसे घड़ी निर्माण के क्षेत्र में भी उतारा गया।
वर्ष 1961 में बेंगलुरु स्थित फैक्ट्री में HMT ने घड़ियों का उत्पादन शुरू किया। इसके लिए जापान की प्रसिद्ध Citizen Watch Company के साथ तकनीकी सहयोग समझौता किया गया। यह भारत के लिए बड़ी उपलब्धि मानी गई क्योंकि उस दौर में अधिकांश तकनीकी उत्पाद विदेशों से आयात किए जाते थे। HMT की पहली घड़ियों की लॉन्चिंग तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी। यही कारण है कि HMT को केवल एक ब्रांड नहीं बल्कि भारत के औद्योगिक आत्मनिर्भरता अभियान का प्रतीक माना गया।
आम भारतीय की पहली पसंद कैसे बनी HMT?
1960 और 1970 के दशक में भारतीय बाजार में विकल्प बहुत सीमित थे। विदेशी घड़ियां महंगी थीं और आम लोगों की पहुंच से बाहर थीं। ऐसे में HMT ने मजबूत, भरोसेमंद और अपेक्षाकृत सस्ती घड़ियां उपलब्ध कराईं। HMT की मैकेनिकल घड़ियां हाथ से चाबी भरकर चलती थीं। इनकी सबसे बड़ी खासियत टिकाऊपन थी। कई परिवारों में एक ही घड़ी वर्षों तक चलती रहती थी और अगली पीढ़ी तक पहुंच जाती थी। उस दौर में HMT की “जनता”, “पायलट”, “कोहिनूर”, “सोना” और “कंचन” जैसी घड़ियां बेहद लोकप्रिय हुईं। भारत के मध्यम वर्ग के लिए HMT एक सपने जैसा ब्रांड बन चुका था। शादी में दामाद को HMT घड़ी देना सम्मान की बात समझी जाती थी। नौकरी लगने पर पिता अपने बेटे को HMT घड़ी उपहार में देते थे। इस तरह यह केवल एक उत्पाद नहीं बल्कि भावनात्मक जुड़ाव वाला ब्रांड बन गया।
जब HMT ने बाजार पर कर लिया था लगभग एकाधिकार
1970 और 1980 के दशक में HMT भारतीय घड़ी उद्योग की निर्विवाद नेता थी। बाजार में उसकी हिस्सेदारी करीब 90 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। उस समय घड़ी खरीदने वाले अधिकांश लोगों की पहली पसंद HMT ही होती थी। कंपनी का वितरण नेटवर्क पूरे देश में फैला हुआ था। छोटे शहरों और कस्बों तक HMT की पहुंच थी। उस समय निजी प्रतिस्पर्धा लगभग नहीं के बराबर थी, इसलिए कंपनी को बाजार में अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई। वर्ष 1991 में HMT ने करीब 70 लाख घड़ियों का उत्पादन किया था। कंपनी ने अपने पूरे सफर में 11 करोड़ से अधिक घड़ियां बेचीं, जो उस समय के हिसाब से एक बड़ी उपलब्धि थी।
टाइटन की एंट्री और भारतीय घड़ी बाजार में क्रांति
HMT के लिए असली चुनौती 1980 के दशक के मध्य में सामने आई। टाटा समूह और तमिलनाडु इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के संयुक्त उपक्रम के रूप में Titan की शुरुआत हुई। वर्ष 1984-85 में Titan ने भारतीय बाजार में प्रवेश किया। यह केवल एक नई कंपनी की एंट्री नहीं थी बल्कि भारतीय घड़ी उद्योग के लिए एक तकनीकी और मार्केटिंग क्रांति साबित हुई। जहां HMT अपनी घड़ियों को जरूरत की वस्तु के रूप में बेच रही थी, वहीं Titan ने घड़ी को फैशन और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट के रूप में पेश किया। कंपनी ने आकर्षक डिजाइन, आधुनिक पैकेजिंग और आक्रामक विज्ञापन अभियान शुरू किए। यहीं से भारतीय उपभोक्ताओं की सोच बदलनी शुरू हुई।
Quartz Technology ने बदल दिया पूरा खेल
HMT की अधिकांश घड़ियां मैकेनिकल तकनीक पर आधारित थीं। इनमें समय-समय पर चाबी भरनी पड़ती थी और इनकी सटीकता भी सीमित थी। दूसरी ओर Titan ने Quartz Technology वाली घड़ियां पेश कीं। क्वार्ट्ज घड़ियां बैटरी से चलती थीं, अधिक सटीक थीं और उन्हें नियमित रूप से चाबी भरने की जरूरत नहीं होती थी। दुनिया के कई देशों में 1970 के दशक से ही Quartz Revolution शुरू हो चुकी थी। लेकिन भारत में यह बदलाव Titan के माध्यम से बड़े पैमाने पर आया। उपभोक्ताओं को आधुनिक तकनीक और आकर्षक डिजाइन पसंद आने लगे। धीरे-धीरे HMT की पारंपरिक छवि उसके लिए चुनौती बनने लगी।
350 इंजीनियरों का Titan जाना क्यों माना जाता है बड़ा झटका?
मीडिया रिपोर्ट्स और उद्योग जगत में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि HMT के लगभग 350 इंजीनियर Titan से जुड़ गए थे। उस समय इसे HMT के लिए बड़ा झटका माना गया।
इन इंजीनियरों के पास घड़ी निर्माण का वर्षों का अनुभव था। जब अनुभवी तकनीकी प्रतिभाएं Titan जैसे उभरते ब्रांड के साथ जुड़ीं, तो नई कंपनी को उत्पादन और गुणवत्ता सुधारने में बड़ा फायदा मिला।
हालांकि HMT की गिरावट का कारण केवल यही नहीं था, लेकिन यह घटना उस व्यापक बदलाव का प्रतीक बन गई जिसमें निजी क्षेत्र अधिक आकर्षक और प्रतिस्पर्धी बनता जा रहा था।
बदलते समय के साथ खुद को क्यों नहीं बदल पाई HMT?
व्यापार जगत में सबसे बड़ा नियम है कि जो समय के साथ नहीं बदलता, वह पीछे रह जाता है। HMT के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जब दुनिया नई तकनीकों की ओर बढ़ रही थी, तब HMT लंबे समय तक अपनी पारंपरिक मैकेनिकल घड़ियों पर निर्भर रही। कंपनी ने बाद में “सोना” और “विजय” जैसे क्वार्ट्ज मॉडल जरूर लॉन्च किए, लेकिन तब तक बाजार काफी बदल चुका था। इसके अलावा एक सरकारी कंपनी होने के कारण निर्णय लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी थी। नए उत्पादों की मंजूरी, तकनीकी निवेश और बाजार रणनीति में तेजी की कमी दिखाई दी। जब तक कंपनी ने प्रतिस्पर्धा को गंभीरता से लिया, तब तक Titan सहित कई अन्य कंपनियां मजबूत स्थिति बना चुकी थीं।
1991 के आर्थिक उदारीकरण ने बढ़ाई मुश्किलें
वर्ष 1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण लागू हुआ। इसके बाद विदेशी कंपनियों और निजी ब्रांडों के लिए भारतीय बाजार के दरवाजे खुल गए। अब उपभोक्ताओं के पास विकल्पों की भरमार थी। Casio, Seiko, Timex और अन्य अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भी भारतीय बाजार में अपनी मौजूदगी बढ़ाने लगे। जहां पहले HMT को लगभग एकाधिकार प्राप्त था, वहीं अब उसे दर्जनों प्रतिस्पर्धियों का सामना करना पड़ रहा था। नई कंपनियां आधुनिक तकनीक, बेहतर डिजाइन और प्रभावी मार्केटिंग के साथ बाजार में उतर रही थीं। HMT इस बदलते माहौल के अनुरूप खुद को पर्याप्त तेजी से नहीं ढाल सकी।
घाटे का दौर और बंद होने की नौबत
1990 के दशक के मध्य से HMT के वित्तीय प्रदर्शन में लगातार गिरावट आने लगी। बिक्री घटने लगी और उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था। कंपनी पर बढ़ता खर्च, घटती मांग और बाजार हिस्सेदारी में कमी का दबाव बढ़ता गया। विभिन्न रिपोर्टों में लालफीताशाही, इन्वेंट्री प्रबंधन की समस्याओं और नवाचार की कमी जैसे कारणों का भी उल्लेख किया गया। धीरे-धीरे घाटा सैकड़ों करोड़ रुपये तक पहुंच गया। 2000 के दशक में HMT मुख्यधारा के घड़ी बाजार से लगभग गायब हो चुकी थी। अंततः भारत सरकार ने मई 2016 में HMT के घड़ी कारोबार को बंद करने का निर्णय लिया। कर्मचारियों को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (VRS) दी गई और कई उत्पादन इकाइयों पर ताला लग गया।
बंद होने के बाद भी क्यों जिंदा है HMT का जादू?
दिलचस्प बात यह है कि HMT का ब्रांड आज भी लोगों की यादों में जीवित है। पुरानी HMT घड़ियों की मांग कलेक्टरों और घड़ी प्रेमियों के बीच लगातार बनी हुई है। “जनता”, “कोहिनूर”, “पायलट” और “हिमालय” जैसे कई मॉडल आज सेकेंडरी मार्केट में ऊंची कीमतों पर बिकते हैं। सोशल मीडिया पर HMT प्रेमियों के कई समूह मौजूद हैं, जहां लोग पुरानी घड़ियों की खरीद-बिक्री और मरम्मत की जानकारी साझा करते हैं। कई लोगों के लिए HMT केवल एक घड़ी नहीं बल्कि भारत के औद्योगिक इतिहास और आत्मनिर्भरता की याद है।
HMT की कहानी क्या सिखाती है?
HMT की कहानी भारतीय उद्योग जगत के लिए महत्वपूर्ण सबक देती है। किसी भी कंपनी के लिए शुरुआती सफलता हमेशा स्थायी नहीं होती। बाजार, तकनीक और उपभोक्ता की पसंद लगातार बदलती रहती है। HMT ने भारतीय घड़ी उद्योग की नींव मजबूत की, लेकिन तकनीकी बदलाव और नई प्रतिस्पर्धा के साथ कदम नहीं मिला सकी। दूसरी तरफ Titan ने बदलती जरूरतों को समझा और खुद को एक आधुनिक लाइफस्टाइल ब्रांड के रूप में स्थापित किया। यही कारण है कि कभी भारतीय बाजार पर राज करने वाली HMT इतिहास बन गई, जबकि Titan आज देश की सबसे बड़ी घड़ी कंपनियों में शामिल है। फिर भी HMT का नाम भारतीय औद्योगिक विकास, आत्मनिर्भरता और गुणवत्ता के प्रतीक के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। यह एक ऐसा ब्रांड है जिसने करोड़ों भारतीयों को पहली बार अपनी कलाई पर समय बांधने का गर्व महसूस कराया।
Also Read:


