हरियाणा सरकार ने एक बड़े वित्तीय घोटाले में सख्त कदम उठाते हुए विकास एवं पंचायत विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया है। यह कार्रवाई ₹590 करोड़ के कथित IDFC First Bank fraud case से जुड़ी जांच के बाद की गई है, जिसने राज्य प्रशासन और बैंकिंग सिस्टम में हड़कंप मचा दिया है।
सरकार का कहना है कि यह मामला केवल एक वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि एक संगठित और बहु-स्तरीय फर्जीवाड़ा है, जिसमें सरकारी धन को कथित रूप से शेल कंपनियों के माध्यम से हेरफेर किया गया।
जांच के बाद बड़ा प्रशासनिक कदम
हरियाणा सरकार ने जिस अधिकारी को सेवा से हटाया है, उनका नाम नरेश भुवानी बताया गया है, जो विकास एवं पंचायत विभाग में अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे।
सरकारी बयान के अनुसार, यह कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(b) के तहत की गई है, जो गंभीर अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार के मामलों में बिना विस्तृत विभागीय सुनवाई के बर्खास्तगी की अनुमति देता है।
सरकार का कहना है कि जांच में मिले सबूत “पर्याप्त और गंभीर प्रकृति” के थे, जिसके आधार पर यह कठोर निर्णय लिया गया।
मामला कैसे सामने आया?
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब फरवरी 2026 में विकास एवं पंचायत विभाग के निदेशक द्वारा एक आंतरिक जांच समिति का गठन किया गया।
इस समिति का उद्देश्य बैंक खातों और सरकारी लेन-देन में संदिग्ध गतिविधियों की जांच करना था। जांच के दौरान IDFC First Bank और AU Small Finance Bank में कई खातों में अनियमितताएं सामने आईं।
जांच रिपोर्ट में पाया गया कि कुछ खातों के जरिए सरकारी फंड्स का संदिग्ध ट्रांसफर किया गया था, जो सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया से मेल नहीं खाता था।
FIR और ACB की एंट्री
जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद मामला राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (SV&ACB) को सौंप दिया गया।
इसके बाद 23 फरवरी 2026 को पंचकूला स्थित ACB थाने में इस मामले में FIR दर्ज की गई।
FIR में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है।
ACB अधिकारियों के अनुसार, यह कोई साधारण वित्तीय गड़बड़ी नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क आधारित फ्रॉड है।
शेल कंपनियों का इस्तेमाल और फर्जीवाड़े का पैटर्न
जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार, सरकारी धन को कई शेल कंपनियों (shell companies) के माध्यम से ट्रांसफर किया गया।
इन कंपनियों का उपयोग केवल कागजों पर मौजूद संस्थाओं के रूप में किया गया, जिनका वास्तविक संचालन बहुत सीमित या न के बराबर था।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि इन कंपनियों के माध्यम से धन को अलग-अलग खातों में घुमाकर अंततः निजी संपत्तियों की खरीद में इस्तेमाल किया गया।
अधिकारी की कथित भूमिका
जांच एजेंसियों का दावा है कि नरेश भुवानी ने कुछ निजी व्यक्तियों के साथ मिलकर एक फर्जी फर्म बनाई थी।
इस फर्म के जरिए सरकारी फंड को बैंकिंग चैनलों के माध्यम से घुमाया गया और फिर उसे निजी खातों में ट्रांसफर किया गया।
प्रारंभिक जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि इस पैसे का उपयोग संपत्तियों की खरीद और अन्य निजी निवेशों में किया गया।
हालांकि, आरोपी अधिकारी की ओर से अभी तक सार्वजनिक रूप से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सरकार का सख्त रुख
हरियाणा सरकार ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने पहले ही स्पष्ट निर्देश दिए थे कि किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सरकारी प्रवक्ता के अनुसार, यह कार्रवाई “जीरो टॉलरेंस पॉलिसी” का हिस्सा है।
प्रशासन का कहना है कि चाहे कोई भी अधिकारी कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, अगर भ्रष्टाचार में शामिल पाया गया तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।
बैंकिंग सिस्टम पर भी उठे सवाल
इस केस ने बैंकिंग प्रक्रियाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर उन मामलों में जहां बड़े पैमाने पर फंड ट्रांसफर हुआ और वह लंबे समय तक संदिग्ध नहीं माना गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि बैंकिंग सिस्टम में KYC और ट्रांजेक्शन मॉनिटरिंग को और मजबूत करने की जरूरत है ताकि इस तरह के मामलों को शुरुआती चरण में ही रोका जा सके।
बड़ा आर्थिक और प्रशासनिक संकेत
यह मामला सिर्फ एक राज्य-स्तरीय भ्रष्टाचार का केस नहीं है, बल्कि यह भारत में सरकारी फंड मैनेजमेंट और बैंकिंग निगरानी प्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाता है।
590 करोड़ रुपये जैसी बड़ी राशि का इस तरह कथित रूप से हेरफेर होना सिस्टम की कमजोरियों की ओर इशारा करता है।
निष्कर्ष: जांच अभी भी जारी
फिलहाल यह मामला जांच के अधीन है और ACB इस पूरे नेटवर्क की गहराई से जांच कर रही है।
आने वाले समय में और भी नाम सामने आ सकते हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां इस पूरे फंड ट्रेल को ट्रैक कर रही हैं।
सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस केस में और भी कठोर कार्रवाई संभव है अगर नए सबूत सामने आते हैं।
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