नई दिल्ली। भारत में तेल और पेट्रोलियम कारोबार की चर्चा होते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में रिलायंस इंडस्ट्रीज और उसके संस्थापक धीरूभाई अंबानी का नाम आता है। जामनगर रिफाइनरी से लेकर पेट्रोकेमिकल्स तक, रिलायंस ने देश के ऊर्जा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। लेकिन भारतीय पेट्रोलियम उद्योग का इतिहास केवल धीरूभाई अंबानी से शुरू नहीं होता।
उनसे कई दशक पहले गुजरात के एक कारोबारी ने न केवल बर्मा (आज का म्यांमार) में विशाल व्यापारिक साम्राज्य खड़ा किया बल्कि तेल कारोबार में ऐसी पहचान बनाई कि उन्हें उस दौर का ‘ऑयल किंग’ कहा जाने लगा। यह शख्स थे सर अब्दुल करीम अब्दुल शकूर जमाल, जिनकी कंपनी इंडो-बर्मा पेट्रोलियम (IBP) लगभग एक सदी तक भारतीय पेट्रोलियम क्षेत्र का अहम हिस्सा बनी रही।
जामनगर से रंगून तक का सफर
सर अब्दुल करीम जमाल का जन्म 1862 में गुजरात के जामनगर में हुआ था। उस समय बड़ी संख्या में गुजराती व्यापारी बेहतर अवसरों की तलाश में दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर जा रहे थे। बचपन में ही उनका परिवार बर्मा के रंगून (वर्तमान यंगून) में बस गया। रंगून उस दौर में ब्रिटिश साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। यहां भारतीय व्यापारियों के लिए नए अवसर मौजूद थे। अब्दुल करीम जमाल ने इन्हीं अवसरों को पहचानते हुए कारोबार की दुनिया में कदम रखा और कुछ ही वर्षों में अपनी अलग पहचान बना ली। उन्होंने ‘जमाल ब्रदर्स एंड कंपनी लिमिटेड’ की स्थापना की, जो धीरे-धीरे बर्मा के सबसे प्रभावशाली व्यापारिक समूहों में शामिल हो गई। कंपनी का कारोबार चावल, कपास, चाय, रबर, चीनी, खनन और लकड़ी जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ था।
जब मिला ‘किंग ऑफ राइस’ का खिताब
अब्दुल करीम जमाल की सबसे बड़ी सफलता चावल व्यापार में रही। उस समय बर्मा दुनिया के सबसे बड़े चावल निर्यातकों में शामिल था और जमाल ब्रदर्स ने इस क्षेत्र में जबरदस्त पकड़ बना ली थी। व्यापारिक इतिहासकारों के अनुसार, उनके समूह का चावल निर्यात कारोबार इतना बड़ा हो गया था कि उन्हें ‘किंग ऑफ राइस’ कहा जाने लगा। यह उपाधि उस दौर में किसी भी व्यापारी के लिए असाधारण उपलब्धि मानी जाती थी।
तेल कारोबार में देखा भविष्य
जहां अधिकांश कारोबारी पारंपरिक व्यापार तक सीमित थे, वहीं अब्दुल करीम जमाल ने ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया था। 20वीं सदी की शुरुआत में मोटर वाहन उद्योग तेजी से बढ़ रहा था। पेट्रोल और डीजल की मांग भी बढ़ रही थी। इसी दौर में उन्होंने ‘जमाल ऑयल कंपनी लिमिटेड’ की स्थापना की।
साल 1909 में इस कंपनी का पुनर्गठन किया गया और इसका नाम ‘इंडो-बर्मा पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड’ (IBP) रखा गया। उस समय भारत और बर्मा के तेल बाजार पर विदेशी कंपनियों का दबदबा था, लेकिन IBP ने स्वदेशी कारोबारी समूह के रूप में अपनी मजबूत पहचान बनाई।
कैसे बने ‘ऑयल किंग’?
IBP केवल तेल बेचने वाली कंपनी नहीं थी। उसने पेट्रोलियम उत्पादों के वितरण, भंडारण और मार्केटिंग का बड़ा नेटवर्क विकसित किया। ब्रिटिश शासन के दौरान किसी भारतीय मूल के कारोबारी द्वारा तेल उद्योग में इतनी बड़ी उपस्थिति बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। इसी वजह से व्यापारिक जगत में अब्दुल करीम जमाल को ‘ऑयल किंग’ कहा जाने लगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि उन्होंने उस दौर में जो काम किया, वही आगे चलकर भारतीय निजी क्षेत्र की ऊर्जा कंपनियों के लिए प्रेरणा बना।
महात्मा गांधी से था विशेष संबंध
अब्दुल करीम जमाल केवल सफल उद्योगपति ही नहीं थे बल्कि भारतीय समुदाय के प्रमुख समाजसेवी भी माने जाते थे। रंगून स्थित उनका आलीशान निवास ‘जमाल विला’ भारतीय नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का प्रमुख केंद्र था। जब महात्मा गांधी बर्मा की यात्रा पर जाते थे तो अक्सर वहीं ठहरते थे। इतिहासकारों के अनुसार, जमाल विला केवल एक निजी आवास नहीं बल्कि भारतीय प्रवासियों के सामाजिक और राजनीतिक संवाद का महत्वपूर्ण केंद्र था। यहां स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कई नेताओं का आना-जाना रहता था।
98 साल तक कायम रही कंपनी
IBP ने स्वतंत्र भारत में भी अपनी पहचान बनाए रखी। कंपनी दशकों तक पेट्रोलियम उत्पादों की मार्केटिंग और वितरण से जुड़ी रही। जब भारत में तेल क्षेत्र का विस्तार हुआ और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां मजबूत हुईं, तब भी IBP बाजार में सक्रिय रही। कंपनी का नेटवर्क देश के कई हिस्सों में फैला हुआ था। आखिरकार 2007 में IBP का विलय इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) में कर दिया गया। इसके साथ ही लगभग 98 वर्षों तक स्वतंत्र रूप से काम करने वाली इस ऐतिहासिक कंपनी का अध्याय समाप्त हो गया।
धीरूभाई अंबानी और अब्दुल करीम जमाल में क्या समानता थी?
दोनों कारोबारियों की सबसे बड़ी समानता उनकी दूरदर्शिता थी। धीरूभाई अंबानी ने जिस तरह पेट्रोकेमिकल और रिफाइनिंग सेक्टर में भविष्य देखा, उसी तरह अब्दुल करीम जमाल ने 20वीं सदी की शुरुआत में तेल उद्योग की क्षमता को पहचान लिया था। दोनों की जड़ें गुजरात से जुड़ी थीं और दोनों ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अपने विस्तार का आधार बनाया। फर्क सिर्फ इतना था कि जमाल ने ब्रिटिश काल में यह उपलब्धि हासिल की, जबकि धीरूभाई अंबानी ने स्वतंत्र भारत में औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व किया।
भारत के कारोबारी इतिहास का भूला-बिसरा अध्याय
आज जब भारतीय ऊर्जा क्षेत्र में रिलायंस, इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल जैसे बड़े नाम चर्चा में रहते हैं, तब सर अब्दुल करीम जमाल का नाम अपेक्षाकृत कम सुनाई देता है। लेकिन भारतीय पेट्रोलियम उद्योग के इतिहास में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने साबित किया कि भारतीय उद्यमी विदेशी कंपनियों के प्रभुत्व वाले क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना सकते हैं। यही कारण है कि उन्हें भारतीय व्यापारिक इतिहास के शुरुआती ‘ऑयल किंग’ के रूप में याद किया जाता है।
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