Gold Outlook: सोने की कीमतों में हालिया तेजी के बाद निवेशकों के बीच यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या अब गोल्ड और सिल्वर में निवेश बढ़ाना चाहिए। एक तरफ Vallum Capital की रिपोर्ट कीमती धातुओं पर सकारात्मक रुख बनाए रखने की सलाह देती है, वहीं YES Securities के स्ट्रैटेजिस्ट इसे सोने में केवल एक अस्थायी तेजी मान रहे हैं।
Gold Outlook: सोने की कीमतों में हालिया तेजी ने निवेशकों का ध्यान एक बार फिर कीमती धातुओं की ओर खींचा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गोल्ड के $4,600 प्रति औंस के ऊपर पहुंचने के बाद अब सवाल यह है कि क्या हालिया करेक्शन के बाद सोना और चांदी दोबारा खरीदने का सही समय है।
इस मुद्दे पर बाजार विशेषज्ञों की राय पूरी तरह एक जैसी नहीं है। Vallum Capital ने अपनी अगस्त Macro Grid Chartbook में सोने और चांदी को लेकर सकारात्मक रुख बरकरार रखा है और निवेशकों को गिरावट के दौरान इन धातुओं में दोबारा पोजीशन बनाने यानी ‘reload’ करने की सलाह दी है। दूसरी तरफ YES Securities के इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज रिसर्च स्ट्रैटेजिस्ट हितेश जैन का मानना है कि मौजूदा तेजी को सोने में किसी बड़े संरचनात्मक बदलाव के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।
अगस्त में सोने ने दिया मजबूत रिटर्न
Vallum Capital के मुताबिक अगस्त में सोने ने करीब 9 फीसदी का रिटर्न दिया है। यह व्यापक इक्विटी बाजार के रिटर्न से लगभग पांच गुना अधिक रहा। इसी अवधि में गोल्ड माइनर्स के शेयरों में करीब 21 फीसदी की तेजी देखने को मिली।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सोने की कीमतों में बीच-बीच में आने वाला करेक्शन कीमती धातुओं को लेकर लंबे समय की सकारात्मक कहानी को कमजोर नहीं करता। इसके पीछे केंद्रीय बैंकों की लगातार खरीदारी, बढ़ता वैश्विक कर्ज और करेंसी डिबेसमेंट की चिंता जैसे प्रमुख कारण बताए गए हैं।
कमजोर डॉलर और घटती बॉन्ड यील्ड से मिला सपोर्ट
सोने की हालिया तेजी को अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नरमी और डॉलर की कमजोरी से भी समर्थन मिला है। अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड की खरीद बढ़ाने के फैसले से लॉन्ग-टर्म यील्ड पर दबाव आया।
आमतौर पर बॉन्ड यील्ड में गिरावट सोने के लिए सकारात्मक मानी जाती है। इसकी वजह यह है कि सोने पर ब्याज नहीं मिलता, इसलिए जब बॉन्ड से मिलने वाला रिटर्न घटता है तो सोने को रखने की अवसर लागत भी कम हो जाती है।
इसके अलावा अमेरिका समेत कई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते राजकोषीय घाटे और कर्ज को लेकर चिंताओं ने करेंसी की वास्तविक वैल्यू को लेकर बहस तेज कर दी है। ऐसे माहौल में सोने को पारंपरिक तौर पर एक सुरक्षित परिसंपत्ति और करेंसी जोखिम के खिलाफ हेज माना जाता है।
सेंट्रल बैंकों की खरीदारी बनी बड़ा सपोर्ट
Vallum Capital के सकारात्मक नजरिए की एक बड़ी वजह केंद्रीय बैंकों की मजबूत गोल्ड खरीदारी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026 की दूसरी तिमाही में केंद्रीय बैंकों ने करीब 288.9 टन सोना खरीदा। तिमाही आधार पर यह खरीदारी 411 फीसदी अधिक रही।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान पश्चिमी गोल्ड ETF से करीब 44.8 टन सोने की निकासी हुई और ज्वेलरी की मांग में लगभग 17 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई।
इससे संकेत मिलता है कि सोने की मांग का स्वरूप बदल रहा है। जहां पारंपरिक ज्वेलरी मांग कमजोर हो सकती है, वहीं केंद्रीय बैंकों और निवेशकों की मांग कीमतों को सहारा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
सप्लाई में नहीं हुई बड़ी बढ़ोतरी
सोने की कीमतों में तेजी के बावजूद इसकी सप्लाई में कोई बड़ी वृद्धि नहीं दिखाई दी है। Vallum के अनुसार, माइन प्रोडक्शन में लगभग 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई, जबकि रिसाइकिल्ड गोल्ड की सप्लाई करीब 6 फीसदी घट गई। इसके चलते कुल सोने की सप्लाई लगभग स्थिर बनी रही।
बाजार में मजबूत मांग और सीमित सप्लाई का यह संतुलन लंबे समय में कीमतों के लिए सपोर्टिव फैक्टर बन सकता है।
बढ़ता वैश्विक कर्ज भी सोने के पक्ष में
Vallum Capital का मानना है कि वैश्विक कर्ज लगातार बढ़ने के साथ सोने की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जमीन के ऊपर मौजूद कुल सोने की कीमत करीब 31 ट्रिलियन डॉलर है।
इसके मुकाबले प्रमुख केंद्रीय बैंकों की मनी सप्लाई लगभग 102 ट्रिलियन डॉलर और वैश्विक कर्ज करीब 350 ट्रिलियन डॉलर है। ऐसे आंकड़े यह संकेत देते हैं कि वैश्विक वित्तीय प्रणाली में कर्ज और मनी सप्लाई का आकार सोने की तुलना में काफी बड़ा है।
यही कारण है कि निवेशक अपने पोर्टफोलियो में सोने को एक वैकल्पिक संपत्ति के रूप में शामिल करते हैं।
चांदी पर भी क्यों है एक्सपर्ट्स की नजर?
Vallum की रिपोर्ट में चांदी को भी कीमती धातुओं के सकारात्मक आउटलुक का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। 2021 से 2026 के बीच चांदी में करीब 263 फीसदी की तेजी आई है, जबकि इसी अवधि में सोना लगभग 164 फीसदी चढ़ा है।
इसके बावजूद गोल्ड-सिल्वर रेश्यो करीब 69 गुना है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह इसके लंबे समय के 45-50 गुना के मध्य स्तर से काफी ऊपर है।
इस आधार पर देखा जाए तो चांदी में आगे चलकर सोने की तुलना में बेहतर प्रदर्शन की गुंजाइश होने की संभावना पर भी बाजार में चर्चा है। हालांकि, चांदी सोने की तुलना में अधिक उतार-चढ़ाव वाली धातु है और इसकी कीमत पर औद्योगिक मांग का भी बड़ा असर पड़ता है।
लेकिन हर एक्सपर्ट सोने को लेकर नहीं है बुलिश
सोने के मजबूत आउटलुक के बावजूद सभी विशेषज्ञ इसे लंबी अवधि की तेजी नहीं मान रहे हैं।
YES Securities के इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज रिसर्च स्ट्रैटेजिस्ट हितेश जैन के अनुसार, हालिया तेजी को सोने में किसी बड़े संरचनात्मक बदलाव के बजाय एक टैक्टिकल राहत के रूप में देखना चाहिए।
उनका तर्क है कि अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से लॉन्ग-एंड बॉन्ड बायबैक बढ़ाने के फैसले से लंबी अवधि की यील्ड में कमी आई है। इससे सोने को तत्काल सपोर्ट मिला, लेकिन इससे अमेरिका की मूल राजकोषीय समस्या खत्म नहीं होती।
बायबैक किए गए बॉन्ड की जगह सरकार को नए बॉन्ड जारी करने पड़ सकते हैं। ऐसे में अमेरिकी कर्ज और फिस्कल स्थिति से जुड़ी मूल चुनौतियां बनी रह सकती हैं।
महंगी पूंजी सोने के लिए बन सकती है चुनौती
हितेश जैन की एक बड़ी चिंता आने वाले वर्षों में ग्लोबल कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी Capex Cycle को लेकर है।
दुनिया भर की सरकारें और कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर, डिफेंस, सेमीकंडक्टर, एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग को दोबारा अपने देशों में लाने यानी reshoring पर भारी निवेश कर रही हैं।
इससे पूंजी की मांग बढ़ सकती है और ब्याज दरें लंबे समय तक अपेक्षाकृत ऊंची रह सकती हैं। जैन का अनुमान है कि अगले तीन से पांच वर्षों में सोना इक्विटी और इंडस्ट्रियल मेटल्स की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर सकता है।
भारतीय निवेशक भी नहीं लगा रहे हैं पूरा दांव
घरेलू निवेश के आंकड़े भी बताते हैं कि भारतीय निवेशक सोने की तेजी के पीछे पूरी तरह से नहीं भाग रहे हैं।
Vallum के अनुसार, जुलाई में प्रेशियस-मेटल फंड में निवेश घटकर करीब ₹4,084 करोड़ रह गया, जबकि जून में यह आंकड़ा ₹8,680 करोड़ था।
इसके उलट मनी मार्केट फंड में निवेश बढ़ा। जून में जहां मनी मार्केट फंड से करीब ₹65,530 करोड़ की निकासी हुई थी, वहीं जुलाई में इसमें लगभग ₹1.40 लाख करोड़ का निवेश आया।
हालांकि, लंबी अवधि में भारतीय निवेशकों की गोल्ड में दिलचस्पी काफी मजबूत रही है। जनवरी 2025 से जनवरी 2026 के बीच भारतीय रिटेल निवेशकों ने गोल्ड फंड और ETF में लगभग ₹93,000 करोड़ लगाए। अकेले जनवरी में करीब ₹33,837 करोड़ का रिकॉर्ड निवेश हुआ।
तो क्या अभी सोना और चांदी खरीदना चाहिए?
मौजूदा स्थिति में सोने और चांदी में निवेश का फैसला केवल हालिया तेजी देखकर करना जोखिम भरा हो सकता है। एक तरफ केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, कमजोर डॉलर, बॉन्ड यील्ड में नरमी और बढ़ता वैश्विक कर्ज सोने के पक्ष में हैं। दूसरी तरफ ऊंची वैल्यूएशन और भविष्य में मजबूत Capex Cycle जैसी परिस्थितियां सोने के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती हैं।
अगर कोई निवेशक अभी कीमती धातुओं में निवेश करना चाहता है तो एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना जोखिम को नियंत्रित करने का एक तरीका हो सकता है। निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो, निवेश अवधि और जोखिम क्षमता के हिसाब से फैसला लेना चाहिए।
किन संकेतकों पर रखें नजर?
आने वाले समय में सोने और चांदी की दिशा समझने के लिए कुछ प्रमुख संकेतक महत्वपूर्ण रहेंगे:
- अमेरिकी डॉलर की चाल
- अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और रियल यील्ड
- केंद्रीय बैंकों की गोल्ड खरीदारी
- अमेरिका की फिस्कल पॉलिसी और कर्ज
- गोल्ड ETF में निवेश और निकासी
- वैश्विक ज्वेलरी डिमांड
- माइन प्रोडक्शन और रिसाइक्लिंग सप्लाई
- औद्योगिक मांग, खासकर चांदी के मामले में
निष्कर्ष: सोने और चांदी को लेकर फिलहाल बाजार में दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं। Vallum Capital जहां गिरावट को खरीदारी के मौके के तौर पर देख रहा है, वहीं YES Securities की राय ज्यादा सतर्क है। इसलिए निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि केवल तेजी देखकर फैसला न लें और अपनी जोखिम क्षमता के अनुसार ही पोर्टफोलियो में कीमती धातुओं का हिस्सा तय करें।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी बाजार विशेषज्ञों और उपलब्ध रिपोर्टों पर आधारित है। यह निवेश सलाह नहीं है। सोना, चांदी या किसी अन्य वित्तीय उत्पाद में निवेश करने से पहले अपने वित्तीय लक्ष्य, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि को ध्यान में रखें तथा जरूरत पड़ने पर SEBI-रजिस्टर्ड निवेश सलाहकार से सलाह लें।


