सरकार को आशंका है कि ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी की वजह से आधिकारिक चैनल के बजाय अनऑफिशियल रास्तों से सोने और चांदी की आवक बढ़ सकती है। ऐसे में ड्यूटी घटाने से कानूनी आयात को बढ़ावा देने और स्मगलिंग पर लगाम लगाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
Gold Import Duty: सोने और चांदी की खरीदारी करने वालों के लिए आने वाले दिनों में बड़ी खबर सामने आ सकती है। केंद्र सरकार सोने और चांदी पर लगने वाली इंपोर्ट ड्यूटी को कम करने के प्रस्ताव पर विचार कर रही है। सरकार के भीतर इस बात पर चर्चा चल रही है कि ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी की वजह से कहीं सोने और चांदी का आयात आधिकारिक चैनल से हटकर अनऑफिशियल चैनलों के जरिए तो नहीं बढ़ रहा है।
मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से जुड़े तीन सूत्रों ने बताया है कि सरकार इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के संभावित असर का आकलन कर रही है। हालांकि, अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है। अगर सरकार ड्यूटी घटाने का फैसला करती है तो इसका असर सोने की कीमतों, ज्वेलरी कारोबार और आधिकारिक गोल्ड इंपोर्ट पर पड़ सकता है।
इंपोर्ट ड्यूटी घटाने से स्मगलिंग रोकने की उम्मीद
सरकार से जुड़े एक सूत्र के अनुसार, सरकार के एक वर्ग में यह विचार चल रहा है कि इंपोर्ट ड्यूटी कम करने से सोने की स्मगलिंग को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। इसके पीछे तर्क यह है कि जब कानूनी तरीके से आयात किए गए सोने की लागत और अनऑफिशियल तरीके से लाए गए सोने की लागत के बीच बड़ा अंतर होता है, तो स्मगलिंग अधिक आकर्षक हो सकती है।
अगर इंपोर्ट ड्यूटी कम होती है तो आधिकारिक चैनल से आयात किए गए सोने की कीमत और अनधिकृत तरीके से लाए गए सोने के बीच का अंतर कम हो सकता है। इससे कारोबारियों और खरीदारों के लिए कानूनी चैनल के जरिए सोना हासिल करना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प बन सकता है।
हालांकि, यह अभी सरकार के स्तर पर विचाराधीन प्रस्ताव है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि इंपोर्ट ड्यूटी निश्चित तौर पर घटाई जाएगी।
ज्वेलर्स लंबे समय से कर रहे हैं ड्यूटी कम करने की मांग
सोने और चांदी के कारोबार से जुड़े उद्योग प्रतिनिधि लंबे समय से इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती की मांग कर रहे हैं। बुलियन ट्रेडर्स और ज्वेलर्स की ओर से इंपोर्ट ड्यूटी को मौजूदा करीब 15 फीसदी से घटाकर 6 फीसदी करने की मांग की जा रही है।
इंडस्ट्री का तर्क है कि ज्यादा ड्यूटी से आधिकारिक रूप से आयात किए जाने वाले सोने की लागत बढ़ती है। इसका असर आगे चलकर ज्वेलरी की कीमतों पर भी पड़ सकता है। दूसरी तरफ, ऊंची ड्यूटी और आधिकारिक आयात की ज्यादा लागत के कारण अनधिकृत तरीके से सोना लाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने की आशंका रहती है।
इसी वजह से कारोबारी संगठन सरकार से ड्यूटी स्ट्रक्चर पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे हैं।
मई 2026 में सरकार ने बढ़ाई थी इंपोर्ट ड्यूटी
सरकार ने 13 मई 2026 को सोने और चांदी के आयात पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने का ऐलान किया था। उस समय सरकार का उद्देश्य महंगे कीमती धातुओं के आयात को नियंत्रित करना और देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाले दबाव को कम करना था।
भारत सोने की अपनी घरेलू जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत बढ़ती है या घरेलू मांग मजबूत होती है, तो सोने के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा भी बढ़ सकती है।
सरकार के लिए सोने का बढ़ता आयात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके चलते देश के आयात बिल पर दबाव बढ़ सकता है। इसी को देखते हुए इंपोर्ट ड्यूटी में बदलाव को आयात को नियंत्रित करने के एक उपाय के तौर पर देखा गया था।
भारत हर साल करीब 700-800 टन सोना करता है आयात
भारत दुनिया के प्रमुख गोल्ड इंपोर्टर्स में शामिल है। देश में हर साल करीब 700-800 टन सोने का आयात किया जाता है। घरेलू स्तर पर ज्वेलरी की मजबूत मांग इसकी प्रमुख वजहों में से एक है।
भारत में सोने का इस्तेमाल केवल निवेश के लिए ही नहीं होता, बल्कि शादी-ब्याह और दूसरे सामाजिक अवसरों पर ज्वेलरी खरीदने की परंपरा के कारण भी इसकी मांग काफी मजबूत रहती है।
भारत यूएई, थाईलैंड और सिंगापुर जैसे बाजारों से सोने से जुड़े कारोबार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। देश से गोल्ड ज्वेलरी का निर्यात भी किया जाता है। ऐसे में इंपोर्ट ड्यूटी में किसी भी बड़े बदलाव का असर घरेलू ज्वेलरी इंडस्ट्री के साथ-साथ एक्सपोर्ट कारोबार पर भी पड़ सकता है।
अप्रैल में गोल्ड इंपोर्ट में आया था बड़ा उछाल
इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाए जाने से पहले अप्रैल में भारत के गोल्ड इंपोर्ट में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली थी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल में सोने का आयात सालाना आधार पर करीब 82 फीसदी बढ़ा था।
सोने की कीमतों में तेजी के बावजूद आयात में बढ़ोतरी ने सरकार और इंडस्ट्री के लिए चिंता बढ़ाई थी। इसका एक कारण घरेलू मांग के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव भी रहा है।
ऐसे माहौल में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ उसे सोने के बढ़ते आयात को नियंत्रित करना है, ताकि विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो। दूसरी तरफ, बहुत ज्यादा इंपोर्ट ड्यूटी से आधिकारिक आयात प्रभावित होने और स्मगलिंग बढ़ने की आशंका भी बनी रहती है।
ड्यूटी बढ़ने के बाद स्मगलिंग बढ़ने का दावा
इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र ने दावा किया है कि मई में इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ने के बाद देश में सोने की स्मगलिंग में तेजी आई है। हालांकि, यह इंडस्ट्री सूत्र का दावा है और सरकार की ओर से इस पर अंतिम आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो मई में भारत का गोल्ड इंपोर्ट करीब 34 फीसदी बढ़ा था। इसके बाद जून और जुलाई में सोने का आयात लगभग 5.5 फीसदी बढ़कर 6.13 अरब डॉलर रहा।
इंडस्ट्री का मानना है कि अगर कानूनी आयात और अनऑफिशियल सप्लाई के बीच लागत का अंतर बहुत अधिक हो जाता है, तो अवैध चैनल के जरिए सोने की आवक बढ़ सकती है। इसी वजह से कुछ कारोबारी संगठन कम इंपोर्ट ड्यूटी को बेहतर विकल्प मानते हैं।
विदेशी मुद्रा भंडार और करेंट अकाउंट डेफिसिट पर असर
भारत के लिए सोने का आयात केवल ज्वेलरी और निवेश की मांग से जुड़ा मुद्दा नहीं है। इसका सीधा संबंध देश के विदेशी मुद्रा खर्च और करेंट अकाउंट डेफिसिट यानी CAD से भी है।
जब भारत बड़ी मात्रा में सोना आयात करता है तो इसके भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा की जरूरत होती है। अगर आयात बिल लगातार बढ़ता है तो देश के व्यापार घाटे और करेंट अकाउंट डेफिसिट पर दबाव बढ़ सकता है।
इसका अप्रत्यक्ष असर रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है। इस साल मई के मध्य तक डॉलर के मुकाबले रुपया करीब 6 फीसदी कमजोर हो चुका था। ऐसे माहौल में सरकार के लिए आयात को संतुलित रखना महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकार के सामने क्या है चुनौती?
सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने का फैसला सरकार के लिए आसान नहीं होगा। ड्यूटी ज्यादा रखने से आधिकारिक आयात को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे कानूनी आयात महंगा हो सकता है। दूसरी ओर, ड्यूटी कम करने से आधिकारिक चैनल से आयात बढ़ सकता है, लेकिन इससे सोने के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा बढ़ने का जोखिम भी रहेगा।
इसलिए सरकार को राजस्व, विदेशी मुद्रा, घरेलू मांग, ज्वेलरी इंडस्ट्री और स्मगलिंग जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखकर फैसला करना होगा।
अगर सरकार ड्यूटी में कटौती करती है तो इसका असर घरेलू गोल्ड मार्केट पर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि, सोने की खुदरा कीमत केवल इंपोर्ट ड्यूटी से तय नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव, डॉलर-रुपये की विनिमय दर, स्थानीय टैक्स, ज्वेलरी मेकिंग चार्ज और घरेलू मांग जैसे कई दूसरे कारक भी कीमत को प्रभावित करते हैं।
अभी अंतिम फैसले का इंतजार
फिलहाल सोने और चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी घटाने का प्रस्ताव विचार के स्तर पर है। सरकार की ओर से अभी कोई अंतिम घोषणा नहीं की गई है। ऐसे में ज्वेलर्स, बुलियन ट्रेडर्स और आम खरीदारों को आधिकारिक फैसले का इंतजार करना होगा।
अगर सरकार ड्यूटी घटाने का फैसला करती है तो इसका सबसे बड़ा उद्देश्य आधिकारिक आयात को प्रोत्साहित करना और अनऑफिशियल चैनलों के जरिए होने वाले आयात को हतोत्साहित करना हो सकता है। वहीं, अगर ड्यूटी में कोई बदलाव नहीं किया जाता है तो सरकार का फोकस सोने के बढ़ते आयात और विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को नियंत्रित करने पर बना रह सकता है।
फिलहाल बाजार की नजर इस बात पर है कि सरकार इस प्रस्ताव को लेकर आगे क्या फैसला करती है। इंपोर्ट ड्यूटी में कटौती होने की स्थिति में इसका असर गोल्ड मार्केट, ज्वेलरी कारोबार और सोने की घरेलू कीमतों पर पड़ने की संभावना रहेगी।


