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    7 नवम्बर 2026
    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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Reading: Gold Price Today: सोने की 8 महीने में सबसे बड़ी साप्ताहिक छलांग, कहां पहुंच गई कीमत और आगे कैसी रहेगी चाल?
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Gold Price Today: सोने की 8 महीने में सबसे बड़ी साप्ताहिक छलांग, कहां पहुंच गई कीमत और आगे कैसी रहेगी चाल?

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/08 at 2:01 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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12 Min Read
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सोने की कीमत में एक बार फिर जोरदार तेजी देखने को मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना दो महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। इस सप्ताह सोने की कीमत में करीब 7 फीसदी की तेजी आई है, जो पिछले करीब आठ महीनों में इसकी सबसे बड़ी साप्ताहिक बढ़त बताई जा रही है। वहीं, पिछले एक महीने में सोना करीब 10 फीसदी महंगा हो चुका है।

Contents
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने ने पकड़ी रफ्तारआखिर क्यों चढ़ रहा है सोना?कमजोर डॉलर ने भी दिया सोने को सपोर्टभारत में भी लगातार चौथे दिन बढ़ा सोनाMCX पर भी सोने में तेजी24 कैरेट, 22 कैरेट और 18 कैरेट सोने का भावक्या सोना फिर बना सकता है नया रिकॉर्ड?सेंट्रल बैंक खरीदारी से भी मिल रहा सपोर्टआगे सोने की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?निवेशकों के लिए क्या मतलब?निष्कर्ष

सोने में इस तेजी ने निवेशकों का ध्यान एक बार फिर बुलियन मार्केट की ओर खींच दिया है। अमेरिका से कमजोर रोजगार आंकड़े आने, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और अमेरिकी डॉलर पर दबाव के बीच बाजार में यह उम्मीद बढ़ी है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लेकर ज्यादा आक्रामक रुख नहीं अपनाएगा। ब्याज दरों को लेकर नरम उम्मीदों से सोने को सपोर्ट मिला है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने ने पकड़ी रफ्तार

शुक्रवार को स्पॉट गोल्ड की कीमत करीब 2.3 फीसदी बढ़कर 4,336.02 डॉलर प्रति औंस पहुंच गई। कारोबार के दौरान फ्यूचर्स गोल्ड 4,400 डॉलर प्रति औंस के स्तर के ऊपर भी चला गया। यह 5 जून के बाद सोने का सबसे ऊंचा स्तर रहा।

इससे पहले कारोबारी सत्र में भी सोने में 3 फीसदी से ज्यादा की तेजी देखने को मिली थी। इस तरह लगातार मजबूत प्रदर्शन के कारण सोने ने जनवरी के बाद अपनी सबसे बड़ी साप्ताहिक छलांग दर्ज की।

हालांकि, मौजूदा तेजी को समझने के लिए जनवरी का रिकॉर्ड स्तर भी महत्वपूर्ण है। जनवरी के अंतिम दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना करीब 5,500 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया था। इसके बाद इसमें बड़ी गिरावट आई और कीमत काफी नीचे चली गई। अब एक बार फिर निवेशकों की खरीदारी बढ़ने से सोने में तेजी लौटती दिखाई दे रही है।

आखिर क्यों चढ़ रहा है सोना?

सोने की कीमत में मौजूदा तेजी के पीछे कई बड़े कारण हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेत हैं।

अमेरिका के लेबर डिपार्टमेंट के ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में रोजगार को लेकर कमजोर आंकड़े सामने आए। रिपोर्ट में 23,000 नौकरियों की कमी बताई गई, जबकि बाजार को पेरोल में करीब 85,000 की बढ़ोतरी की उम्मीद थी।

कमजोर रोजगार आंकड़ों का सीधा असर फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति पर पड़ सकता है। अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत बने रहते हैं तो फेड के लिए ब्याज दरों को बढ़ाने की संभावना कम हो सकती है।

यह स्थिति सोने के लिए सकारात्मक मानी जाती है।

दरअसल, सोना खुद कोई ब्याज नहीं देता। इसलिए जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं तो निवेशकों के लिए बॉन्ड और दूसरी ब्याज देने वाली परिसंपत्तियां ज्यादा आकर्षक हो सकती हैं। इसके उलट जब ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद बढ़ती है तो सोने की मांग मजबूत हो सकती है।

कमजोर डॉलर ने भी दिया सोने को सपोर्ट

अमेरिकी डॉलर में कमजोरी भी सोने की कीमत के लिए सकारात्मक रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है। ऐसे में डॉलर कमजोर होने पर दूसरे देशों के निवेशकों के लिए सोना अपेक्षाकृत सस्ता हो जाता है और इसकी मांग बढ़ सकती है।

इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी ने भी बाजार की ब्याज दरों को लेकर उम्मीदों को प्रभावित किया है। तेल की कीमतों में गिरावट से महंगाई के दबाव को लेकर चिंता कुछ कम हो सकती है। इससे फेडरल रिजर्व के लिए ब्याज दरों पर नरम रुख अपनाने की गुंजाइश बढ़ती है।

यही वजह है कि इस समय कमजोर रोजगार आंकड़े, नरम डॉलर और तेल की कीमतों में गिरावट तीनों फैक्टर सोने के पक्ष में जाते दिखाई दे रहे हैं।

भारत में भी लगातार चौथे दिन बढ़ा सोना

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी का असर भारतीय सर्राफा बाजार पर भी देखने को मिला। राष्ट्रीय राजधानी के सर्राफा बाजार में शुक्रवार को सोने की कीमत लगातार चौथे दिन बढ़ी।

शुक्रवार को सोना 200 रुपये बढ़कर 1,54,000 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। इससे एक दिन पहले गुरुवार को इसका भाव 1,53,800 रुपये प्रति 10 ग्राम था।

घरेलू बाजार में सोने की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के अलावा रुपये की चाल, आयात लागत और स्थानीय मांग जैसे कई फैक्टर प्रभावित करते हैं। इस समय वैश्विक स्तर पर सोने में तेजी और डॉलर में कमजोरी का असर घरेलू कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है।

MCX पर भी सोने में तेजी

मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी MCX पर भी सोने की कीमत में तेजी रही। शुक्रवार को 5 अक्टूबर डिलीवरी वाला सोना 165 रुपये की बढ़त के साथ 1,51,985 रुपये पर बंद हुआ।

इससे संकेत मिलता है कि घरेलू वायदा बाजार में भी निवेशकों का रुझान सोने की ओर मजबूत बना हुआ है।

हालांकि, MCX और सर्राफा बाजार की कीमतों में अंतर होना सामान्य है। वायदा कीमतें एक्सचेंज पर कारोबार, डिलीवरी महीने और बाजार की अपेक्षाओं से प्रभावित होती हैं, जबकि खुदरा बाजार में टैक्स, मेकिंग चार्ज और स्थानीय मांग जैसे अतिरिक्त फैक्टर भी कीमत को प्रभावित करते हैं।

24 कैरेट, 22 कैरेट और 18 कैरेट सोने का भाव

घरेलू बाजार में खुदरा कीमतों में भी तेजी दिखाई दे रही है। गुडरिटर्न्स के मुताबिक, 24 कैरेट सोना करीब 1,52,350 रुपये प्रति 10 ग्राम के स्तर पर पहुंच गया है।

वहीं, 22 कैरेट सोने की कीमत करीब 1,39,650 रुपये प्रति 10 ग्राम और 18 कैरेट सोने का भाव करीब 1,14,260 रुपये प्रति 10 ग्राम है।

यहां यह समझना जरूरी है कि वेबसाइटों और अलग-अलग शहरों में सोने के भाव में मामूली अंतर हो सकता है। ज्वेलरी खरीदते समय मेकिंग चार्ज, GST और अन्य शुल्क जुड़ने के कारण ग्राहक को वास्तविक भुगतान बाजार में बताए गए बेस गोल्ड रेट से ज्यादा करना पड़ सकता है।

क्या सोना फिर बना सकता है नया रिकॉर्ड?

सोने में हालिया तेजी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या कीमत एक बार फिर अपने रिकॉर्ड स्तर की ओर बढ़ सकती है। विशेषज्ञों की राय इस समय सोने के लिए लंबी अवधि में सकारात्मक दिखाई देती है, लेकिन रास्ते में उतार-चढ़ाव से इनकार नहीं किया जा सकता।

जेफरीज के ग्लोबल हेड ऑफ इक्विटी स्ट्रैटेजी क्रिस्टोफर वुड और अरबपति हेज फंड मैनेजर जॉन पॉलसन जैसे निवेशकों का मानना है कि हालिया गिरावट ने लंबी अवधि के निवेशकों को सोना जमा करने का अवसर दिया है।

इस नजरिए के मुताबिक, सोने में मौजूदा तेजी केवल छोटी अवधि की रिकवरी नहीं हो सकती बल्कि यह एक बड़े बुल रन की शुरुआत का हिस्सा भी हो सकती है।

सेंट्रल बैंक खरीदारी से भी मिल रहा सपोर्ट

सोने के लिए सबसे महत्वपूर्ण लंबी अवधि के सपोर्ट में केंद्रीय बैंकों की खरीदारी भी शामिल है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं।

इसका कारण यह है कि सोने को किसी एक देश की मुद्रा या सरकार के क्रेडिट पर निर्भर नहीं माना जाता। वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में केंद्रीय बैंक अपने रिजर्व को डायवर्सिफाई करने के लिए सोने का इस्तेमाल कर सकते हैं।

यदि केंद्रीय बैंकों की खरीदारी मजबूत बनी रहती है और निवेशकों की मांग भी बढ़ती है तो इससे सोने की कीमत को लंबी अवधि में सपोर्ट मिल सकता है।

आगे सोने की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?

आने वाले दिनों में सोने की दिशा मुख्य रूप से अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति, अमेरिकी डॉलर, रोजगार और महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगी।

अगर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में कमजोरी के संकेत बढ़ते हैं और फेड के नरम रुख की उम्मीद मजबूत होती है तो सोने को फायदा मिल सकता है। इसके अलावा डॉलर में लगातार कमजोरी भी बुलियन की कीमत को ऊपर ले जा सकती है।

दूसरी तरफ अगर अमेरिकी महंगाई अपेक्षा से ज्यादा रहती है, डॉलर मजबूत होता है या फेड ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाता है तो सोने में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है।

इसलिए मौजूदा तेजी के बावजूद निवेशकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि सोना भी लगातार एक ही दिशा में नहीं चलता। रिकॉर्ड स्तरों के आसपास तेज उतार-चढ़ाव और करेक्शन दोनों देखने को मिल सकते हैं।

निवेशकों के लिए क्या मतलब?

सोने में करीब एक महीने में 10 फीसदी की तेजी के बाद निवेशकों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि केवल तेजी देखकर जल्दबाजी में पूरी रकम निवेश न करें। सोना पोर्टफोलियो में विविधता लाने और आर्थिक अनिश्चितता के समय सुरक्षा देने वाली परिसंपत्ति के तौर पर उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसकी कीमत में भी काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है।

अगर कोई निवेशक लंबी अवधि के लिए सोने में निवेश करना चाहता है तो एकमुश्त निवेश के बजाय चरणबद्ध तरीके से निवेश करना जोखिम को कुछ हद तक संतुलित कर सकता है। वहीं, ज्वेलरी खरीदने वालों के लिए शुद्धता, मेकिंग चार्ज, GST और खरीद-बिक्री के बीच के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

निष्कर्ष

कुल मिलाकर, सोने में इस सप्ताह आई करीब 7 फीसदी की तेजी ने बुलियन मार्केट में नई जान डाल दी है। कमजोर अमेरिकी रोजगार आंकड़े, डॉलर में नरमी, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और फेड की ब्याज दरों को लेकर नरम उम्मीदों ने सोने को मजबूत सपोर्ट दिया है।

भारत में भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है और सोना 1.54 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास पहुंच गया है। आगे इसकी चाल अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और फेड के फैसलों के साथ-साथ केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और वैश्विक जोखिमों पर निर्भर करेगी।

ऐसे में सोने में लंबी अवधि की कहानी अभी भी मजबूत दिखाई देती है, लेकिन हालिया तेज उछाल के बाद निवेशकों को जोखिम, निवेश अवधि और खरीदारी के स्तर को ध्यान में रखकर ही फैसला लेना चाहिए।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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