Gig Workers News: देश की नई वर्कफोर्स के लिए बड़ी तैयारी
नई दिल्ली। भारत की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी से जुड़े करीब 1 करोड़ लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर सामने आई है। केंद्र सरकार नए सोशल सिक्योरिटी फ्रेमवर्क के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा का दायरा देने की दिशा में तेजी से काम कर रही है। इसी कड़ी में सभी ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने यहां काम करने वाले गिग वर्कर्स का पंजीकरण 22 जून तक ई-श्रम पोर्टल पर पूरा करें।
यह कदम केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसे भारत के श्रम बाजार में एक बड़े बदलाव की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है। यदि सरकार की योजना सफल रहती है तो लाखों डिलीवरी पार्टनर्स, कैब ड्राइवरों, फ्रीलांस कर्मचारियों और अन्य प्लेटफॉर्म वर्कर्स को पहली बार संगठित सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल सकता है।
क्या कहा श्रम मंत्रालय के अधिकारी ने?
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय में संयुक्त सचिव आशुतोष ए. टी. पेडनेकर ने FICCI-AIOE (ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ एंप्लॉयर्स) के एक कार्यक्रम में कहा कि सरकार देशभर के गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स का डेटा जुटा रही है। इसके लिए सभी ई-कॉमर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपने कर्मचारियों का विवरण ई-श्रम पोर्टल पर उपलब्ध कराने को कहा गया है। उन्होंने बताया कि सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत गिग वर्कर्स के लिए विशेष सामाजिक सुरक्षा योजनाएं तैयार की जा रही हैं। इन योजनाओं के स्वरूप और फंडिंग मॉडल को अंतिम रूप देने के लिए फंड मैनेजर्स और विशेषज्ञ संस्थानों की सहायता ली जा रही है। सरकार का मानना है कि जब तक इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की सही संख्या और उनकी प्रोफाइल का डेटा उपलब्ध नहीं होगा, तब तक प्रभावी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था लागू करना मुश्किल होगा।
आखिर कौन होते हैं गिग वर्कर्स?
पिछले कुछ वर्षों में “गिग वर्कर” शब्द काफी चर्चा में आया है। गिग वर्कर्स वे लोग होते हैं जो किसी कंपनी के स्थायी कर्मचारी नहीं होते, बल्कि किसी ऐप या डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए काम करते हैं। उदाहरण के लिए फूड डिलीवरी पार्टनर, कैब और टैक्सी ड्राइवर, ई-कॉमर्स डिलीवरी एजेंट, ऑनलाइन फ्रीलांसर, घरेलू सेवाएं देने वाले ऐप आधारित कर्मचारी, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग से जुड़े प्लेटफॉर्म वर्कर्स. इन कर्मचारियों को पारंपरिक नौकरी की तरह भविष्य निधि (PF), ग्रेच्युटी, पेंशन, मेडिकल कवर या अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं नहीं मिलतीं। यही कारण है कि लंबे समय से इनके लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था की मांग उठती रही है।
भारत में तेजी से बढ़ रही है गिग इकोनॉमी
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। स्मार्टफोन, इंटरनेट और ऑनलाइन सेवाओं के विस्तार ने लाखों लोगों को रोजगार के नए अवसर दिए हैं। फूड डिलीवरी, ई-कॉमर्स, ऑनलाइन ट्रांसपोर्ट, फ्रीलांसिंग और डिजिटल सर्विस सेक्टर में काम करने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि गिग इकोनॉमी अब भारतीय रोजगार बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक रोजगार की तुलना में प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार तेजी से बढ़ सकता है। ऐसे में इस वर्ग के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बनाना सरकार की प्राथमिकता बन गई है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में क्या कहा गया?
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान समय में भारत में लगभग 1 करोड़ गिग वर्कर्स कार्यरत हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2030 तक यह संख्या बढ़कर 2.35 करोड़ से अधिक हो सकती है। इसका अर्थ यह है कि अगले कुछ वर्षों में देश का एक बड़ा श्रम वर्ग गिग इकोनॉमी का हिस्सा होगा। यदि इनके लिए सुरक्षा व्यवस्था नहीं बनाई गई तो भविष्य में रोजगार से जुड़ी कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार सोशल सिक्योरिटी कोड के जरिए एक स्थायी ढांचा विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
सोशल सिक्योरिटी कोड क्या है?
केंद्र सरकार ने श्रम कानूनों को सरल और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से कई लेबर कोड लागू किए हैं। इन्हीं में से एक सोशल सिक्योरिटी कोड है, जिसे गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इस कोड का उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को भी सुरक्षा कवच देना है। इसके तहत भविष्य में बीमा, स्वास्थ्य सहायता, दुर्घटना कवर और अन्य कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जा सकता है। सरकार ने 8 मई को सोशल सिक्योरिटी कोड के नियमों को अधिसूचित किया था। इसके बाद अब गिग वर्कर्स से संबंधित प्रक्रियाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है।
गिग वर्कर्स को क्या-क्या लाभ मिल सकते हैं?
हालांकि सरकार ने अभी अंतिम योजना की घोषणा नहीं की है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि गिग वर्कर्स को निम्न प्रकार के लाभ मिल सकते हैं स्वास्थ्य बीमा सुविधा, दुर्घटना बीमा कवर, जीवन बीमा, सामाजिक सुरक्षा सहायता, भविष्य में पेंशन जैसी योजनाएं, आर्थिक संकट की स्थिति में सहायता यदि ऐसा होता है तो पहली बार गिग वर्कर्स को भी पारंपरिक कर्मचारियों जैसी सुरक्षा मिलने लगेगी।
22 जून की तारीख क्यों है महत्वपूर्ण?
सरकार ने सभी प्लेटफॉर्म कंपनियों को 22 जून तक अपने यहां कार्यरत गिग वर्कर्स का डेटा ई-श्रम पोर्टल पर अपलोड करने को कहा है। इस तारीख के बाद सरकार के पास देशभर के गिग वर्कर्स का अपेक्षाकृत व्यापक डेटा उपलब्ध हो सकता है। इसी डेटा के आधार पर लाभार्थियों की पहचान, योजनाओं का स्वरूप और फंडिंग मॉडल तय किया जाएगा। यही कारण है कि 22 जून को गिग वर्कर्स के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।
आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि सामाजिक सुरक्षा मिलने से गिग वर्कर्स की आर्थिक स्थिरता बढ़ेगी। इससे न केवल उनके जीवन स्तर में सुधार होगा बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म सेक्टर में काम करने वाले लोगों का भरोसा भी मजबूत होगा। इसके अलावा कंपनियों को भी अधिक प्रशिक्षित और स्थिर वर्कफोर्स मिल सकेगी। लंबे समय में यह कदम भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को और मजबूत बनाने में मदद कर सकता है।
आगे क्या?
भारत में रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। लाखों युवा पारंपरिक नौकरी की जगह प्लेटफॉर्म आधारित काम को अपना रहे हैं। ऐसे में गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था बनाना केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि भविष्य की आवश्यकता बन चुका है। यदि सोशल सिक्योरिटी कोड के तहत प्रस्तावित योजनाएं लागू होती हैं तो देश के लगभग 1 करोड़ गिग वर्कर्स को बड़ा लाभ मिल सकता है। यही वजह है कि 22 जून की तारीख पर न केवल प्लेटफॉर्म कंपनियों बल्कि लाखों कर्मचारियों की भी नजरें टिकी हुई हैं।
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