देश में कैब ड्राइवर, फूड डिलीवरी बॉय और दूसरे प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए अच्छी खबर है। केंद्र सरकार इन कर्मचारियों को सोशल सिक्योरिटी के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत उन्हें लाइफ इंश्योरेंस, एक्सीडेंट इंश्योरेंस, हेल्थ कवर और मैटरनिटी बेनिफिट जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं। खास बात यह है कि इन सुविधाओं के लिए गिग वर्कर्स को अपनी जेब से पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा। प्रस्तावित योजना का खर्च मुख्य रूप से उन कंपनियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म यानी एग्रीगेटर्स की ओर से उठाया जाएगा, जिनके लिए ये कर्मचारी काम करते हैं।
सरकार ने इस दिशा में नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड का गठन किया है। यह बोर्ड देश के करोड़ों गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की रूपरेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाएगा। बोर्ड की बैठक नवंबर के दूसरे पखवाड़े में होने की उम्मीद है, जिसमें प्रस्तावित योजना के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा हो सकती है।
1.2 करोड़ से ज्यादा वर्कर्स को मिलेगा फायदा
भारत में गिग इकॉनमी तेजी से बढ़ रही है। आज बड़ी संख्या में लोग फुल टाइम नौकरी के बजाय डिजिटल प्लेटफॉर्म और कंपनियों के माध्यम से काम कर रहे हैं। इनमें कैब चलाने वाले ड्राइवर, ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाले डिलीवरी पार्टनर, घरेलू सेवाएं देने वाले कर्मचारी और दूसरे ऑन-डिमांड सर्विस प्रोवाइडर शामिल हैं।
गिग वर्कर्स ऐसे कर्मचारी होते हैं, जो किसी कंपनी के साथ स्थायी रोजगार संबंध के बजाय शॉर्ट टर्म, प्रोजेक्ट आधारित या जरूरत के मुताबिक काम करते हैं। उदाहरण के तौर पर Ola, Uber, Zomato, Swiggy और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर इस श्रेणी में आते हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 में देश में गिग वर्कर्स की संख्या करीब 77 लाख थी। वित्त वर्ष 2025-26 तक यह बढ़कर 1.2 करोड़ से अधिक हो गई है। यानी कुछ ही वर्षों में इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
सरकार की प्रस्तावित सोशल सिक्योरिटी योजना का उद्देश्य इन कर्मचारियों को ऐसी सुविधाएं देना है, जो आमतौर पर नियमित नौकरी करने वाले कर्मचारियों को उपलब्ध होती हैं।
कौन-कौन से फायदे मिल सकते हैं?
प्रस्तावित सोशल सिक्योरिटी स्कीम के तहत गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को कई तरह की सुविधाएं देने की योजना है। इसका मकसद काम के दौरान होने वाले जोखिम और अचानक आने वाली आर्थिक परेशानियों से कर्मचारियों को सुरक्षा देना है।
लाइफ इंश्योरेंस: योजना के तहत पात्र गिग वर्कर्स को जीवन बीमा की सुविधा मिल सकती है। इससे कर्मचारी की मृत्यु होने की स्थिति में उसके परिवार को आर्थिक सहायता देने का प्रावधान हो सकता है।
एक्सीडेंट इंश्योरेंस: कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर का काम सड़क पर अधिक समय बिताने से जुड़ा होता है। ऐसे में दुर्घटना का जोखिम भी बना रहता है। प्रस्तावित योजना में दुर्घटना बीमा शामिल किया जा सकता है, जिससे हादसे की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा मिलेगी।
डिसेबिलिटी इंश्योरेंस: दुर्घटना या किसी अन्य कारण से काम करने की क्षमता प्रभावित होने पर दिव्यांगता बीमा के माध्यम से सहायता देने की व्यवस्था हो सकती है।
हेल्थ इंश्योरेंस: गिग वर्कर्स को स्वास्थ्य संबंधी खर्चों से राहत देने के लिए हेल्थ कवर भी योजना का हिस्सा हो सकता है। इससे बीमारी या अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में आर्थिक मदद मिल सकती है।
मैटरनिटी बेनिफिट: महिला गिग वर्कर्स को मातृत्व संबंधी सुविधाएं देने का प्रस्ताव भी शामिल है। इससे गर्भावस्था और मातृत्व के दौरान उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिल सकती है।
हालांकि, इन सभी सुविधाओं की वास्तविक पात्रता, बीमा कवर की राशि, क्लेम की प्रक्रिया और दूसरी शर्तें योजना के अंतिम दिशानिर्देश जारी होने के बाद ही स्पष्ट होंगी।
कहां से आएगा योजना के लिए पैसा?
इस योजना का सबसे अहम पहलू इसका फंडिंग मॉडल है। सरकार एग्रीगेटर कंपनियों से सोशल सिक्योरिटी फंड में योगदान लेने की तैयारी कर रही है। एग्रीगेटर उन कंपनियों या डिजिटल प्लेटफॉर्म को कहा जाता है, जो ग्राहकों और सेवा देने वाले कर्मचारियों के बीच संपर्क स्थापित करते हैं।
इसमें कैब एग्रीगेटर, फूड डिलीवरी कंपनियां और दूसरे डिजिटल सर्विस प्लेटफॉर्म शामिल हो सकते हैं।
सूत्रों के मुताबिक, सरकार एग्रीगेटर्स के कुल टर्नओवर के बजाय प्रत्येक पात्र ट्रांजैक्शन पर 2 फीसदी लेवी लगाने के विकल्प पर विचार कर रही है। इसका मतलब है कि प्लेटफॉर्म के जरिए होने वाले कारोबार से जुड़े पात्र लेनदेन के आधार पर सोशल सिक्योरिटी फंड में योगदान लिया जा सकता है।
इस व्यवस्था के पीछे एक अहम वजह अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बिजनेस मॉडल में अंतर होना है। हर कंपनी का टर्नओवर और उसकी गणना करने का तरीका अलग हो सकता है। ऐसे में केवल कुल टर्नओवर के आधार पर योगदान तय करने से कंपनियों के बीच असमानता पैदा हो सकती है।
ट्रांजैक्शन आधारित लेवी से सीधे उस कारोबार को योगदान से जोड़ने में मदद मिल सकती है, जिससे गिग वर्कर्स की सेवाएं जुड़ी हुई हैं।
क्या सरकार और कर्मचारियों को भी देना होगा पैसा?
मौजूदा प्रस्ताव के अनुसार, सोशल सिक्योरिटी फंड में योगदान की जिम्मेदारी मुख्य रूप से एग्रीगेटर कंपनियों की होगी। यानी इस व्यवस्था में केंद्र सरकार या गिग वर्कर्स की ओर से सीधे योगदान देने का प्रस्ताव नहीं है।
इससे कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ने की उम्मीद है। हालांकि, 2 फीसदी लेवी किस तरह के ट्रांजैक्शन पर लागू होगी और उसका वास्तविक आधार क्या होगा, इस पर अंतिम दिशानिर्देश महत्वपूर्ण होंगे।
सरकार का उद्देश्य ऐसा फंडिंग मॉडल तैयार करना है, जिसमें गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा मिल सके और अलग-अलग एग्रीगेटर कंपनियों के बीच योगदान की व्यवस्था भी व्यावहारिक बनी रहे।
2027 में लागू हो सकती है योजना
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस योजना का खाका लगभग तैयार है और इसे वर्ष 2027 में लागू किया जा सकता है। नवंबर के दूसरे पखवाड़े में नेशनल सोशल सिक्योरिटी बोर्ड की प्रस्तावित बैठक में इस पर आगे चर्चा होने की उम्मीद है।
बोर्ड का काम गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन और नीतिगत ढांचे को लेकर सुझाव देना होगा।
योजना लागू होने के बाद पात्र कर्मचारियों को मिलने वाली सुविधाओं और उनके लिए जरूरी पंजीकरण प्रक्रिया की जानकारी भी सामने आ सकती है।
किसे मिलेगा सोशल सिक्योरिटी योजना का फायदा?
सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 के प्रावधानों के अनुसार, गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने की पात्रता में काम करने की अवधि भी महत्वपूर्ण है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, किसी एक एग्रीगेटर के साथ एक वित्त वर्ष में कम से कम 90 दिन काम करने वाले कर्मचारी पात्रता के दायरे में आ सकते हैं। वहीं, एक से अधिक प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले कर्मचारियों के लिए कुल 120 दिन काम करने की शर्त बताई गई है।
इसका मतलब है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही कंपनी के बजाय अलग-अलग प्लेटफॉर्म के माध्यम से काम करता है, तो उसकी कुल कार्य अवधि को भी ध्यान में रखा जा सकता है। हालांकि, अंतिम पात्रता और पंजीकरण की प्रक्रिया संबंधित योजना के नियमों के अनुसार तय होगी।
2029-30 तक 2.35 करोड़ हो सकती है गिग वर्कर्स की संख्या
नीति आयोग के अनुमानों के मुताबिक, भारत में गिग इकॉनमी आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ सकती है। वित्त वर्ष 2029-30 तक देश में गिग वर्कर्स की संख्या बढ़कर करीब 2.35 करोड़ पहुंचने का अनुमान है।
यह संख्या देश की कुल वर्कफोर्स का लगभग 6.7 फीसदी हो सकती है। गिग इकॉनमी का आर्थिक योगदान भी लगातार बढ़ने की संभावना है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2029-30 तक इस क्षेत्र का योगदान देश की जीडीपी में करीब 2.35 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
इस वृद्धि के पीछे ऑनलाइन शॉपिंग, फूड डिलीवरी, कैब सर्विस, डिजिटल प्लेटफॉर्म और ऑन-डिमांड सेवाओं का विस्तार प्रमुख कारण हैं।
पेंशन और पीएफ जैसी सुविधाएं अभी योजना में नहीं
प्रस्तावित सोशल सिक्योरिटी स्कीम में फिलहाल लाइफ इंश्योरेंस, एक्सीडेंट इंश्योरेंस, हेल्थ कवर और मैटरनिटी बेनिफिट जैसी सुविधाओं पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि, कर्मचारियों के लिए लंबे समय की आर्थिक सुरक्षा भी एक बड़ा मुद्दा है।
इसी वजह से पेंशन, प्रोविडेंट फंड (PF) और बुढ़ापे में नियमित आर्थिक सहायता जैसी सुविधाओं को भविष्य में योजना में शामिल करने पर विचार किया जा सकता है।
गिग वर्कर्स के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में नौकरी की स्थिरता, नियमित आय, स्वास्थ्य सुरक्षा और रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सहारा शामिल हैं। प्रस्तावित योजना इन चुनौतियों को कम करने की दिशा में एक कदम हो सकती है।
निष्कर्ष
सरकार की प्रस्तावित सोशल सिक्योरिटी योजना देश के 1.2 करोड़ से अधिक गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। इसके तहत कैब ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर और दूसरे प्लेटफॉर्म कर्मचारियों को बीमा, स्वास्थ्य और मातृत्व संबंधी सुविधाएं देने की तैयारी है। योजना के लिए एग्रीगेटर कंपनियों से ट्रांजैक्शन आधारित योगदान लेने का प्रस्ताव है। हालांकि, योजना के अंतिम नियम, 2 फीसदी लेवी का आधार और कर्मचारियों को मिलने वाले वास्तविक लाभ की जानकारी आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगी।
Source: मीडिया रिपोर्ट्स और नीति आयोग के अनुमानों पर आधारित।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी प्रस्तावित सरकारी योजना और उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित है। योजना के अंतिम नियमों और पात्रता संबंधी शर्तों में बदलाव संभव है।


