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Fuel Prices: तेल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकार ने खुद सहा ₹30,000 करोड़ का घाटा, विपक्ष ने लगाया टैक्स वसूली का आरोप

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/23 at 9:40 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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Highlights

  • पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकार को ₹30,000 करोड़ का नुकसान।
  • सरकार का दावा- यूपीए दौर के ऑयल बॉन्ड का बोझ अब भी चुकाया जा रहा।
  • कांग्रेस ने ईंधन कीमतों पर केंद्र को घेरा, सरकार ने दिया जवाब।
  • मिडिल ईस्ट तनाव और कच्चे तेल की महंगाई का असर भारतीय बाजार पर भी पड़ा।

नई दिल्ली। देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। एक तरफ विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर ईंधन के जरिए “अत्यधिक टैक्स वसूली” का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी सूत्रों ने दावा किया है कि मौजूदा सरकार आज भी पिछली यूपीए सरकार के समय जारी किए गए “ऑयल बॉन्ड्स” का कर्ज और ब्याज चुका रही है। सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद आम लोगों को राहत देने के लिए एक्साइज ड्यूटी में कटौती की गई, जिसका करीब ₹30,000 करोड़ का बोझ केंद्र ने खुद उठाया।

Contents
Highlightsमिडिल ईस्ट तनाव के बाद बढ़ा तेल संकटपेट्रोल पर ₹3 की कटौती, डीजल पर राहतकांग्रेस ने सरकार को क्यों घेरा?सरकार ने ऑयल बॉन्ड्स का मुद्दा उठायाकितनी रकम चुकाई गई?एक्साइज ड्यूटी क्या होती है?आम जनता पर क्या असर पड़ा?सरकार की रणनीति बनाम पुराना मॉडलआगे क्या हो सकता है?निष्कर्ष

मिडिल ईस्ट तनाव के बाद बढ़ा तेल संकट

फरवरी 2026 से पश्चिम एशिया यानी मिडिल ईस्ट में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक तेल बाजार पर साफ दिखाई दिया। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में तनाव बढ़ने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई प्रभावित हुई। इसका असर ब्रेंट क्रूड की कीमतों पर भी पड़ा, जिससे दुनिया के कई देशों में ईंधन महंगा होने लगा।

भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी का सीधा असर घरेलू पेट्रोल और डीजल कीमतों पर पड़ता है। इसी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 को स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में कटौती का फैसला लिया।

पेट्रोल पर ₹3 की कटौती, डीजल पर राहत

सरकारी सूत्रों के अनुसार, पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹3 प्रति लीटर घटाई गई, जबकि डीजल पर इसे लगभग शून्य स्तर तक लाया गया। सरकार का कहना है कि अगर यह राहत नहीं दी जाती, तो आम लोगों को पेट्रोल और डीजल के लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती।

सूत्रों का दावा है कि इस फैसले से चालू वित्त वर्ष में केंद्र सरकार को करीब ₹30,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ। सरकार ने यह बोझ सीधे बजट पर लिया, न कि उपभोक्ताओं पर डाला।

कांग्रेस ने सरकार को क्यों घेरा?

कांग्रेस लगातार यह मुद्दा उठा रही है कि मई 2014 में पेट्रोल की कीमत करीब ₹71 प्रति लीटर थी, जबकि आज कई शहरों में यह ₹98 प्रति लीटर के आसपास पहुंच चुकी है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर भारी टैक्स लगाकर आम जनता से अतिरिक्त वसूली कर रही है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई बार कच्चे तेल की कीमतें नीचे आने के बावजूद आम लोगों को पूरी राहत नहीं मिली। यही वजह है कि ईंधन की कीमतें लगातार राजनीतिक मुद्दा बनी हुई हैं।

सरकार ने ऑयल बॉन्ड्स का मुद्दा उठाया

सरकारी सूत्रों ने विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि 2014 के समय दिखाई देने वाली कम कीमतें पूरी तरह वास्तविक नहीं थीं। सूत्रों के मुताबिक, यूपीए सरकार ने 2005 से 2010 के बीच तेल कंपनियों के घाटे को छिपाने और ईंधन कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए करीब ₹1.34 लाख करोड़ के ऑयल बॉन्ड जारी किए थे।

सरल शब्दों में समझें तो उस समय सरकार ने तेल कंपनियों को सीधे नकद भुगतान करने के बजाय बॉन्ड जारी कर दिए थे। यानी तत्काल कीमतें कम रखी गईं, लेकिन भविष्य में उस कर्ज और ब्याज का भुगतान करना तय था। अब केंद्र सरकार का कहना है कि वही वित्तीय बोझ बाद के वर्षों में मौजूदा सरकार को उठाना पड़ा।

कितनी रकम चुकाई गई?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में ऑयल बॉन्ड्स के मूलधन और ब्याज के रूप में बड़ी रकम चुकाई गई है:

वित्त वर्षभुगतान राशि
2021-22करीब ₹10,000 करोड़
2023-24₹31,150 करोड़
2024-25₹52,860 करोड़
2025-26₹36,913 करोड़

सरकारी सूत्रों का दावा है कि यह भुगतान सीधे बजट से किया गया और इसके बावजूद सरकार ने मौजूदा संकट में नया कर्ज लेने के बजाय टैक्स में कटौती का रास्ता चुना।

एक्साइज ड्यूटी क्या होती है?

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कई तरह के टैक्स शामिल होते हैं। इनमें केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों का वैट (VAT) प्रमुख होता है। जब केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी घटाती है, तो ईंधन कीमतों में राहत मिलती है, लेकिन सरकार की टैक्स आय कम हो जाती है। यही वजह है कि ईंधन पर टैक्स कटौती का सीधा असर सरकारी राजस्व पर पड़ता है।

आम जनता पर क्या असर पड़ा?

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार मार्च 2026 में एक्साइज ड्यूटी में कटौती नहीं करती, तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें और तेजी से बढ़तीं, ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती, फल-सब्जी और रोजमर्रा के सामान महंगे होते, महंगाई दर पर अतिरिक्त दबाव आता।

भारत में लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्ट सेक्टर काफी हद तक डीजल पर निर्भर है। ऐसे में डीजल महंगा होने का असर सीधे आम उपभोक्ता तक पहुंचता है।

सरकार की रणनीति बनाम पुराना मॉडल

सरकारी सूत्रों का कहना है कि मौजूदा सरकार ने तेल संकट से निपटने के लिए “पारदर्शी मॉडल” अपनाया है। सरकार का दावा है कि कोई नया ऑयल बॉन्ड जारी नहीं किया गया, भविष्य के टैक्सपेयर्स पर नया कर्ज नहीं डाला गया, सीधे बजट से टैक्स कटौती का नुकसान उठाया गया।

वहीं विपक्ष का कहना है कि आम जनता को अभी भी ईंधन कीमतों में पर्याप्त राहत नहीं मिली है और टैक्स संरचना की समीक्षा की जरूरत है।

आगे क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले महीनों में भारत में ईंधन कीमतों की दिशा काफी हद तक इन कारकों पर निर्भर करेगी मिडिल ईस्ट का भू-राजनीतिक तनाव, ब्रेंट क्रूड की कीमतें, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति, केंद्र और राज्यों की टैक्स नीति।

अगर वैश्विक बाजार में कच्चा तेल महंगा बना रहता है, तो सरकार पर टैक्स में और राहत देने का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि इससे सरकारी राजस्व और वित्तीय घाटे पर भी असर पड़ सकता है।

निष्कर्ष

पेट्रोल-डीजल की कीमतें सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों से तय नहीं होतीं, बल्कि टैक्स ढांचा, पुरानी वित्तीय नीतियां, भू-राजनीतिक संकट और सरकारी राजस्व जरूरतें भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती हैं। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ईंधन कीमतों में राहत देने और सरकारी आय के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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