बांग्लादेश ने एक बार फिर बंगाल की खाड़ी में तेल और गैस की खोज के लिए बड़ा दांव खेला है। ऊर्जा संकट, घटते घरेलू गैस भंडार और महंगे एलएनजी आयात के दबाव के बीच सरकार ने 26 ऑफशोर ब्लॉकों के लिए नया इंटरनेशनल टेंडर जारी किया है। खास बात यह है कि इससे पहले 2024 में इसी तरह का लाइसेंसिंग राउंड पूरी तरह फेल हो गया था और एक भी कंपनी ने बोली नहीं लगाई थी।
अब बांग्लादेश सरकार ने विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए शर्तों में बड़े बदलाव किए हैं। सरकार को उम्मीद है कि नई नीतियां इंटरनेशनल ऑयल एंड गैस कंपनियों की दिलचस्पी फिर से बढ़ा सकती हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार भू-राजनीतिक तनाव, ईरान संकट और सप्लाई बाधाओं के कारण अस्थिर बना हुआ है।
बांग्लादेश के सामने गैस संकट कितना बड़ा?
बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। उद्योग, बिजली उत्पादन और शहरीकरण बढ़ने से प्राकृतिक गैस की मांग भी लगातार बढ़ रही है। लेकिन घरेलू उत्पादन उसी रफ्तार से नहीं बढ़ पाया। देश के कई पुराने गैस फील्ड अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहे हैं। इसके कारण बिजली संयंत्रों और उद्योगों को गैस सप्लाई में दिक्कत आ रही है। हालात ऐसे हैं कि बांग्लादेश को लगातार महंगी LNG (Liquefied Natural Gas) खरीदनी पड़ रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नए गैस स्रोत नहीं मिले तो आने वाले वर्षों में बांग्लादेश का आयात बिल और तेजी से बढ़ सकता है। यही वजह है कि सरकार अब ऑफशोर एक्सप्लोरेशन को प्राथमिकता दे रही है।
क्या है नया ऑफशोर टेंडर?
सरकारी कंपनी पेट्रोबांग्ला ने ‘Bangladesh Offshore Model Production Sharing Contract (PSC) 2026’ के तहत यह नया टेंडर जारी किया है। इसके तहत 15 डीप-वॉटर ब्लॉक, 11 शैलो-वॉटर ब्लॉक विदेशी और घरेलू कंपनियों के लिए ऑफर किए गए हैं।
बोली जमा करने की आखिरी तारीख
30 नवंबर 2026 तय की गई है।
डेटा पैकेज कब मिलेगा?
1 जून से भूवैज्ञानिक और तकनीकी डेटा उपलब्ध कराया जाएगा ताकि कंपनियां संभावित भंडार का आकलन कर सकें।
आखिर 2024 वाला टेंडर क्यों फेल हुआ था?
2024 में भी बांग्लादेश ने ऑफशोर ब्लॉकों के लिए अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित किया था। उस समय कई बड़ी कंपनियों ने डेटा पैकेज खरीदे थे, लेकिन आखिर में एक भी बोली जमा नहीं हुई। इस असफलता के पीछे कई बड़े कारण बताए गए:
1. गैस प्राइसिंग पर असहमति
विदेशी कंपनियों का कहना था कि बांग्लादेश में गैस की कीमतें पर्याप्त आकर्षक नहीं थीं।
2. पाइपलाइन लागत का बोझ
ऑफशोर गैस निकालने के बाद पाइपलाइन और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने की जिम्मेदारी कंपनियों पर ज्यादा पड़ रही थी।
3. प्रॉफिट शेयरिंग की चिंता
कई कंपनियों को लगा कि निवेश के मुकाबले रिटर्न कम मिल सकता है।
4. भूवैज्ञानिक जोखिम
बांग्लादेश के समुद्री क्षेत्र में अब तक कोई बड़ा ऑफशोर गैस भंडार नहीं मिला है। इससे निवेशकों का जोखिम बढ़ जाता है।
इस बार क्या बदला है?
2026 के नए PSC मॉडल में सरकार ने कई अहम रियायतें दी हैं।
एक्सप्लोरेशन एरिया रिटर्न नियम बदला
पहले कंपनियों को खोज के दौरान 50% क्षेत्र वापस करना पड़ता था।अब यह सीमा घटाकर केवल 20% कर दी गई है। इसका मतलब कंपनियों के पास ज्यादा एक्सप्लोरेशन एरिया रहेगा लंबे समय तक सर्वे करने की सुविधा मिलेगी, संभावित खोज की संभावना बढ़ेगी
वेलफेयर फंड योगदान घटाया गया
पहले 5% योगदान जरूरी था अबसिर्फ 1.5% देना होगा इससे कंपनियों की शुरुआती लागत कम होगी।
गैस प्राइसिंग फॉर्मूला भी बदला
यह सबसे बड़ा बदलाव माना जा रहा है। पहले गैस की कीमतें हाई-सल्फर फ्यूल ऑयल से लिंक थीं। अब इन्हें Brent Crude से जोड़ा गया है।
नया फॉर्मूला क्या है?
तीन महीने के औसत Brent Crude का 11%, न्यूनतम सीमा: 70 डॉलर प्रति बैरल, अधिकतम सीमा: 100 डॉलर प्रति बैरल इस बदलाव से विदेशी कंपनियों को ज्यादा स्थिर और बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद है।
भारत से क्यों अलग है बांग्लादेश की कहानी?
यहीं से यह मामला बेहद दिलचस्प बन जाता है।
भारत ने क्या किया?
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में कृष्णा-गोदावरी बेसिन, मुंबई हाई, अंडमान क्षेत्र, डीप-वॉटर ब्लॉक्स में बड़े पैमाने पर एक्सप्लोरेशन बढ़ाया है। भारत की सरकारी कंपनियां जैसे Oil and Natural Gas Corporation, Oil India Limited लगातार ऑफशोर निवेश कर रही हैं। साथ ही सरकार ने Open Acreage Licensing Policy (OALP), HELP नीति, आसान गैस मार्केटिंग नियम जैसे सुधार लागू किए।
बांग्लादेश की सबसे बड़ी समस्या
2012 में भारत और 2014 में म्यांमार के साथ समुद्री सीमा विवाद सुलझने के बावजूद बांग्लादेश अभी तक कोई बड़ा ऑफशोर गैस भंडार खोज नहीं पाया है। इसके उलट भारत, म्यांमार, पाकिस्तान तीनों देशों ने हाल के वर्षों में डीप-वॉटर एक्सप्लोरेशन बढ़ाया है।
कौन-कौन सी कंपनियां पहले काम कर चुकी हैं?
बांग्लादेश के समुद्री ब्लॉकों में पहले कई बड़ी कंपनियां काम कर चुकी हैं ConocoPhillips, Santos Limited, POSCO Daewoo, Oil and Natural Gas Corporation लेकिन बाद में अधिकांश कंपनियां परियोजनाओं से बाहर निकल गईं। विशेषज्ञों का मानना है कि कम व्यावसायिक आकर्षण, उच्च लागत, अनिश्चित भंडार, कमजोर प्राइसिंग मॉडल इसके पीछे मुख्य वजहें थीं।
क्या इस बार सफल होगा टेंडर?
ऊर्जा बाजार के जानकारों का कहना है कि इस बार स्थिति कुछ अलग है।
कारण:
1. वैश्विक गैस संकट
यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया तनाव के बाद एशियाई देशों में गैस सुरक्षा बड़ी प्राथमिकता बन गई है।
2. LNG बेहद महंगी
स्पॉट LNG कीमतों में उतार-चढ़ाव ने आयातक देशों का दबाव बढ़ाया है।
3. घरेलू उत्पादन की जरूरत
बांग्लादेश अब आयात निर्भरता कम करना चाहता है।
4. बेहतर कॉन्ट्रैक्ट शर्तें
नए PSC मॉडल को पहले से ज्यादा निवेशक-फ्रेंडली माना जा रहा है। हालांकि, असली चुनौती अभी भी वही है—क्या बंगाल की खाड़ी में व्यावसायिक रूप से बड़े गैस भंडार मौजूद हैं या नहीं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
भारत और बांग्लादेश दोनों दक्षिण एशिया के तेजी से बढ़ते ऊर्जा बाजार हैं। अगर बांग्लादेश को बड़े गैस भंडार मिलते हैं तो क्षेत्रीय ऊर्जा संतुलन बदल सकता है LNG आयात घट सकता है, बिजली उत्पादन सस्ता हो सकता है, औद्योगिक विकास को गति मिल सकती है इसके अलावा भारतीय कंपनियां भी इस टेंडर में भाग ले सकती हैं, जिससे भारत की ऊर्जा कंपनियों की क्षेत्रीय मौजूदगी मजबूत होगी।
निष्कर्ष
बांग्लादेश का नया ऑफशोर ऑयल-गैस टेंडर सिर्फ एक सामान्य ऊर्जा परियोजना नहीं है, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा आर्थिक दांव है। 2024 की असफलता के बाद सरकार ने शर्तों को ज्यादा आकर्षक बनाकर विदेशी निवेशकों को दोबारा लुभाने की कोशिश की है। अब नजर इस बात पर होगी कि क्या इस बार अंतरराष्ट्रीय कंपनियां बोली लगाती हैं और क्या बंगाल की खाड़ी बांग्लादेश को वह गैस संपदा दे पाती है जिसकी उसे लंबे समय से तलाश है।
Also Read:


