नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की तेज रफ्तार ने दुनिया भर में डेटा सेंटर्स की मांग को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। आज हर देश ऐसे डेटा सेंटर्स बनाने की होड़ में है जो कम बिजली खर्च करें, कम पानी इस्तेमाल करें और पर्यावरण पर कम दबाव डालें। इसी दिशा में चीन ने ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।
चीन ने शंघाई के तट के पास दुनिया का पहला ऐसा अंडरवॉटर डेटा सेंटर शुरू किया है जो समुद्र के नीचे स्थापित है और मुख्य रूप से पवन ऊर्जा (विंड एनर्जी) से संचालित होता है। करीब 238 मिलियन डॉलर (लगभग 2,200 करोड़ रुपये) की लागत वाला यह प्रोजेक्ट भविष्य के डेटा सेंटर्स की नई दिशा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर उद्योग की तस्वीर बदल सकता है।
समुद्र तट से 16 किलोमीटर दूर बनाया गया डेटा सेंटर
शंघाई लिंगांग (Shanghai Lingang) नाम का यह डेटा सेंटर शंघाई के तट से करीब 16 किलोमीटर दूर समुद्र में स्थापित किया गया है। इसकी क्षमता 24 मेगावाट है और इसे समुद्र की सतह से लगभग 10 मीटर नीचे लगाया गया है।
इस परियोजना को हाईक्लाउड टेक्नोलॉजी और सरकारी कंपनी China Communications Construction Company ने मिलकर विकसित किया है। इसका उद्देश्य डेटा प्रोसेसिंग की बढ़ती जरूरतों को पूरा करना और साथ ही ऊर्जा व प्राकृतिक संसाधनों की बचत करना है।
पारंपरिक डेटा सेंटर्स की सबसे बड़ी समस्या
दुनिया भर में डेटा सेंटर्स भारी मात्रा में बिजली और पानी की खपत करते हैं। सर्वर 24 घंटे लगातार चलते हैं, जिससे उनमें अत्यधिक गर्मी पैदा होती है। इस गर्मी को नियंत्रित करने के लिए बड़े कूलिंग सिस्टम की जरूरत पड़ती है।
विशेषज्ञों के अनुसार कई डेटा सेंटर्स में कुल बिजली खपत का 25% से 40% हिस्सा केवल कूलिंग पर खर्च होता है। इसके अलावा सर्वर को ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में साफ पानी भी इस्तेमाल किया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2030 तक दुनिया के डेटा सेंटर्स करीब 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की खपत कर सकते हैं। यह मात्रा लगभग 1.3 अरब लोगों की वार्षिक पेयजल जरूरत के बराबर है।
चीन का मॉडल क्यों है खास?
समुद्र के नीचे स्थापित होने के कारण यह डेटा सेंटर प्राकृतिक रूप से ठंडे वातावरण में रहता है। इससे अलग से बड़े कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता काफी कम हो जाती है।
इस मॉडल की प्रमुख विशेषताएं:
- कूलिंग के लिए अतिरिक्त साफ पानी की जरूरत नहीं।
- पारंपरिक डेटा सेंटर्स की तुलना में लगभग 22.8% कम बिजली खपत।
- 95% से अधिक ऊर्जा ग्रीन स्रोतों से।
- जमीन की जरूरत में 90% से ज्यादा कमी।
- कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय गिरावट।
यही वजह है कि इसे डेटा सेंटर उद्योग में एक बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है।
डेटा सेंटर की दौड़ में चीन और अमेरिका आगे
दुनिया के अधिकांश बड़े डेटा सेंटर्स अभी भी चीन और अमेरिका में स्थित हैं। हालांकि दोनों देशों की रणनीति में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
जहां अमेरिका के कई डेटा सेंटर्स अभी भी पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर हैं, वहीं चीन तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा आधारित डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर रहा है। अंडरवॉटर डेटा सेंटर इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
भारत में भी बढ़ रहा है अरबों डॉलर का निवेश
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते डिजिटल बाजारों में शामिल है। AI, क्लाउड सर्विसेज, फिनटेक, ई-कॉमर्स और डिजिटल पेमेंट्स के विस्तार से डेटा सेंटर्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
देश के बड़े उद्योग समूह भी इस सेक्टर में भारी निवेश कर रहे हैं।
Reliance Industries अपने ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम के साथ बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर विकसित कर रही है। वहीं Adani Enterprises ने वर्ष 2035 तक डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में लगभग 100 अरब डॉलर निवेश की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है।
मुंबई, चेन्नई, नोएडा, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहर तेजी से डेटा सेंटर हब के रूप में उभर रहे हैं।
भारत के लिए क्या है बड़ा अवसर?
भारत के पास 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री तटरेखा है। ऐसे में भविष्य में समुद्र आधारित डेटा सेंटर्स के लिए देश के पास बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि:
- मुंबई तट
- चेन्नई तट
- विशाखापट्टनम
- कोच्चि
- गुजरात का समुद्री क्षेत्र
ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए उपयुक्त स्थान बन सकते हैं।
यदि भारत भविष्य में इस तकनीक को अपनाता है तो न केवल बिजली और पानी की बड़ी बचत होगी, बल्कि महंगी शहरी जमीन पर दबाव भी कम होगा। साथ ही देश ग्रीन डेटा सेंटर टेक्नोलॉजी में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में कदम बढ़ा सकता है।
भविष्य की तकनीक का संकेत
AI के बढ़ते उपयोग के साथ डेटा सेंटर्स की संख्या आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने वाली है। ऐसे में ऊर्जा दक्षता और संसाधनों की बचत सबसे बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है।
चीन का समुद्र के नीचे बना डेटा सेंटर केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भविष्य के डेटा सेंटर्स जमीन पर नहीं बल्कि समुद्र की गहराइयों में भी बस सकते हैं। भारत के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि आने वाले डिजिटल युग की तैयारी का अवसर भी है।


