Property in Delhi: दिल्ली में छोटे प्लॉट पर बिल्डर और जमीन मालिक के बीच होने वाले कोलैबोरेशन एग्रीमेंट को लेकर नियम बदलने की तैयारी है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ऐसे समझौतों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया जा सकता है और इस पर करीब 1 फीसदी शुल्क लगाया जा सकता है। इसके अलावा GPA के जरिए प्रॉपर्टी ट्रांसफर के नियमों को भी सख्त करने पर विचार किया जा रहा है।
80 से 100 गज के प्लॉट पर फ्लैट बनवाने वालों पर पड़ेगा असर
दिल्ली में 80 से 100 गज के छोटे प्लॉट पर जमीन मालिक और बिल्डर के बीच समझौता कर 3 से 4 मंजिल तक फ्लैट बनाने का चलन लंबे समय से है। ऐसे मामलों में जमीन मालिक और बिल्डर के बीच यह तय किया जाता है कि निर्माण के बाद किस पक्ष को कितने फ्लोर या फ्लैट मिलेंगे।
कई मामलों में यह समझौता महज 50 या 100 रुपये के स्टांप पेपर पर कर लिया जाता है। कुछ डील में जमीन मालिक को किसी फ्लोर के बदले नकद भुगतान करने जैसी शर्तें भी शामिल होती हैं। समस्या यह है कि इस तरह के अनौपचारिक समझौतों में भविष्य में विवाद की गुंजाइश बनी रहती है।
इसी को देखते हुए दिल्ली सरकार कोलैबोरेशन एग्रीमेंट को औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के दायरे में लाने की तैयारी कर रही है।
कोलैबोरेशन एग्रीमेंट की रजिस्ट्री हो सकती है जरूरी
प्रस्तावित बदलाव के तहत जमीन मालिक और बिल्डर के बीच होने वाले कोलैबोरेशन एग्रीमेंट को सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत कराना अनिवार्य किया जा सकता है। इस पर करीब 1 फीसदी शुल्क लगाए जाने का प्रस्ताव बताया जा रहा है।
इस बदलाव का उद्देश्य केवल सरकार का राजस्व बढ़ाना नहीं है। रजिस्टर्ड एग्रीमेंट होने से जमीन के मालिकाना हक, निर्माण में हिस्सेदारी, फ्लोर के बंटवारे और भुगतान जैसी शर्तों का आधिकारिक रिकॉर्ड तैयार हो सकेगा।
इससे भविष्य में दोनों पक्षों के बीच विवाद होने पर दस्तावेजी आधार मजबूत रहेगा।
अभी कैसे होती है प्रॉपर्टी की डील?
वर्तमान में दिल्ली में कई छोटे प्लॉटों पर बिल्डर और जमीन मालिक आपसी सहमति से निर्माण का समझौता करते हैं। इसमें यह तय किया जाता है कि बिल्डर निर्माण का खर्च उठाएगा और बदले में उसे कुछ फ्लोर या फ्लैट मिलेंगे, जबकि बाकी हिस्से जमीन मालिक के पास रहेंगे।
लेकिन यदि समझौता केवल साधारण स्टांप पेपर पर किया गया है तो बाद में परिस्थितियां बदलने पर विवाद पैदा हो सकता है। उदाहरण के लिए निर्माण पूरा होने के बाद कोई पक्ष तय हिस्सेदारी से मुकर जाए या फ्लैट बेचने के समय दस्तावेजों को लेकर सवाल खड़ा हो जाए।
प्रस्तावित रजिस्ट्रेशन व्यवस्था ऐसे मामलों में पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिश है।
फ्लैट खरीदने वालों पर भी पड़ सकता है असर
इस बदलाव का असर केवल जमीन मालिक और बिल्डर तक सीमित नहीं रहेगा। ऐसे प्रोजेक्ट में फ्लैट खरीदने वाले लोगों को भी इसका सामना करना पड़ सकता है।
अगर किसी प्रॉपर्टी से जुड़ा कोलैबोरेशन एग्रीमेंट पहले रजिस्टर्ड नहीं कराया गया है और बाद में फ्लैट की बिक्री के समय यह कमी सामने आती है, तो लंबित शुल्क या रजिस्ट्रेशन से जुड़ी देनदारी का सवाल उठ सकता है। ऐसी स्थिति में अतिरिक्त लागत खरीदार पर आने की संभावना बताई जा रही है।
इसलिए दिल्ली में बिल्डर से फ्लैट खरीदने वालों के लिए यह जांचना महत्वपूर्ण होगा कि जमीन मालिक और बिल्डर के बीच हुआ मूल समझौता विधिवत दर्ज और रजिस्टर्ड है या नहीं।
रजिस्ट्रेशन एक्ट में संशोधन की तैयारी
दिल्ली सरकार इस व्यवस्था को लागू करने के लिए रजिस्ट्रेशन एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है। प्रस्ताव लागू होने के बाद छोटे प्लॉटों पर होने वाले डेवलपमेंट और कोलैबोरेशन समझौतों का रिकॉर्ड सरकारी स्तर पर दर्ज हो सकेगा।
इससे संपत्ति के वास्तविक अधिकार और निर्माण के बाद अलग-अलग पक्षों को मिलने वाले हिस्से को लेकर विवाद कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, अंतिम नियम लागू होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि 1 फीसदी शुल्क किन परिस्थितियों में लगेगा, इसकी गणना किस आधार पर होगी और पुराने समझौतों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा।
GPA से प्रॉपर्टी ट्रांसफर पर भी सख्ती
दिल्ली में संपत्ति के लेनदेन को लेकर सरकार की नजर केवल कोलैबोरेशन एग्रीमेंट पर नहीं है। जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी यानी GPA के जरिए संपत्ति ट्रांसफर करने की व्यवस्था को लेकर भी सख्ती की तैयारी है।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ब्लड रिलेशन के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति को GPA के माध्यम से संपत्ति ट्रांसफर करने की स्थिति में स्टांप ड्यूटी लगाए जाने का प्रावधान किया जा सकता है।
इसमें स्टांप शुल्क कितना होगा, यह संबंधित मामले के आधार पर कलेक्टर ऑफ स्टांप द्वारा तय किया जा सकता है।
GPA पर 4 फीसदी स्टांप ड्यूटी का प्रस्ताव
दिल्ली सरकार रजिस्ट्रेशन एक्ट में प्रस्तावित बदलाव के तहत GPA से जुड़े लेनदेन पर 4 फीसदी तक स्टांप शुल्क लेने के विकल्प पर भी विचार कर रही है।
इसका मकसद संपत्ति के ऐसे लेनदेन को अधिक औपचारिक और पारदर्शी बनाना है, जिनमें पावर ऑफ अटॉर्नी का इस्तेमाल करके मालिकाना हक से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल किया जाता है।
प्रॉपर्टी खरीदारों के लिए क्या बदलेगा?
अगर प्रस्तावित बदलाव लागू होते हैं तो दिल्ली में प्रॉपर्टी खरीदने या बिल्डर के साथ जमीन डेवलपमेंट का समझौता करने वालों को पहले की तुलना में अधिक सावधानी बरतनी होगी।
खास तौर पर:
- बिल्डर और जमीन मालिक के बीच कोलैबोरेशन एग्रीमेंट रजिस्टर्ड है या नहीं, इसकी जांच जरूरी होगी।
- केवल सस्ते स्टांप पेपर पर किए गए समझौते को पर्याप्त मानना जोखिम भरा हो सकता है।
- फ्लैट खरीदते समय जमीन के मालिकाना हक और बिल्डर के अधिकारों से जुड़े दस्तावेज देखने चाहिए।
- GPA के जरिए हुए लेनदेन में लागू स्टांप ड्यूटी और दस्तावेजों की वैधता की जांच करनी चाहिए।
- किसी भी प्रॉपर्टी डील से पहले दस्तावेजों की जांच विशेषज्ञ या प्रॉपर्टी वकील से कराना बेहतर रहेगा।
क्यों जरूरी माना जा रहा है बदलाव?
दिल्ली में छोटे प्लॉटों पर अनौपचारिक डेवलपमेंट एग्रीमेंट के कारण कई बार जमीन मालिक, बिल्डर और फ्लैट खरीदार के बीच विवाद सामने आते हैं। रजिस्टर्ड दस्तावेज होने से समझौते की शर्तों का सरकारी रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
सरकार के लिए इससे संपत्ति लेनदेन से जुड़े राजस्व में भी बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं खरीदारों के लिए दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट होने से भविष्य में विवाद का जोखिम कम हो सकता है।
ध्यान दें: कोलैबोरेशन एग्रीमेंट की अनिवार्य रजिस्ट्री, 1 फीसदी शुल्क और GPA पर प्रस्तावित 4 फीसदी स्टांप ड्यूटी से जुड़े प्रावधानों को लागू करने के लिए अंतिम सरकारी अधिसूचना/संशोधन का इंतजार जरूरी है। इसलिए किसी प्रॉपर्टी डील में मौजूदा नियमों की पुष्टि किए बिना अतिरिक्त शुल्क या कानूनी स्थिति को अंतिम न मानें।


