Custom Duty Reform: पिछले कुछ वर्षों में कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स और जीएसटी में बदलाव के बाद केंद्र सरकार अब कस्टम ड्यूटी के ढांचे को और तर्कसंगत बनाने की तैयारी में है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में ज्यादातर वस्तुओं पर कस्टम टैरिफ को सिंगल डिजिट में लाने की दिशा में काम किया जा रहा है। इससे आयात लागत, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग और कारोबार पर असर पड़ सकता है।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार टैक्स व्यवस्था को सरल और व्यावहारिक बनाने की दिशा में लगातार बदलाव कर रही है। कॉरपोरेट टैक्स, इनकम टैक्स और जीएसटी में बदलाव के बाद अब सरकार का फोकस कस्टम ड्यूटी यानी आयात शुल्क पर बढ़ता नजर आ रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संकेत दिया कि आगामी बजट में कस्टम ड्यूटी को कम करने और इसके ढांचे को और तर्कसंगत बनाने पर ध्यान दिया जा सकता है।
वित्त मंत्री ने NCAER द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि कस्टम टैरिफ को व्यावहारिक बनाने की दिशा में लगातार प्रगति हो रही है। उन्होंने संकेत दिया कि 2027-28 के बजट तक कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर कस्टम टैरिफ सिंगल डिजिट में लाया जा सकता है।
ज्यादातर कस्टम टैरिफ सिंगल डिजिट में लाने की तैयारी
निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार ने पहले ही कस्टम ड्यूटी के ढांचे को काफी हद तक तर्कसंगत बनाया है। उन्होंने बताया कि अब भी करीब 13 ऐसी कैटेगरी या आइटम हैं, जिन्हें छोड़कर टैरिफ व्यवस्था को काफी हद तक सरल किया जा चुका है।
सरकार का उद्देश्य कस्टम ड्यूटी के अलग-अलग स्लैब को कम करना और ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिससे कारोबारियों और उद्योगों के लिए आयात से जुड़ी लागत तथा नियमों को समझना आसान हो।
अगर सरकार आने वाले बजटों में आयात शुल्क को और कम करती है, तो इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमोबाइल, मशीनरी और दूसरे उद्योगों की लागत पर पड़ सकता है। हालांकि, सरकार के सामने घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और सस्ते आयात के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी।
इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करने पर जोर
पिछले कुछ बजटों में सरकार ने कस्टम ड्यूटी को सरल बनाने पर खास ध्यान दिया है। इसका एक प्रमुख हिस्सा इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करना रहा है।
इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर उस स्थिति को कहा जाता है जब किसी तैयार उत्पाद पर लगने वाला आयात शुल्क उसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल या इनपुट से कम होता है। इससे घरेलू कंपनियों के लिए देश में उत्पादन करना महंगा हो सकता है।
सरकार की कोशिश रही है कि कच्चे माल और तैयार उत्पादों पर शुल्क की संरचना ऐसी हो, जिससे देश में मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिले और कंपनियों को घरेलू स्तर पर उत्पादन करने के लिए प्रोत्साहन मिले।
प्राइवेट सेक्टर का भरोसा बढ़ने का दावा
वित्त मंत्री ने अर्थव्यवस्था और निजी क्षेत्र के निवेश को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कोविड के बाद केंद्र सरकार के बढ़े हुए कैपिटल एक्सपेंडिचर से अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र का भरोसा मजबूत हुआ है।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरी पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च बढ़ाया है। सरकार का मानना है कि इससे आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिला और निजी कंपनियों को भी निवेश तथा जोखिम लेने के लिए प्रोत्साहन मिला।
सीतारमण के मुताबिक, सरकारी निवेश और निजी क्षेत्र की गतिविधियों के बीच बेहतर तालमेल अर्थव्यवस्था की लंबी अवधि की ग्रोथ के लिए महत्वपूर्ण है।
राज्यों के कर्ज पर भी वित्त मंत्री की सलाह
कार्यक्रम के दौरान वित्त मंत्री ने राज्यों के बढ़ते कर्ज को लेकर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि राज्यों को एसेट बनाने के लिए उतना ही कर्ज लेना चाहिए, जितना वे भविष्य में चुका सकें।
उनका कहना था कि कर्ज का बोझ अगली पीढ़ी पर अनियंत्रित तरीके से नहीं छोड़ा जाना चाहिए। राज्यों को अपनी वित्तीय स्थिति और कर्ज चुकाने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए फैसले लेने चाहिए।
सीतारमण ने बताया कि कई राज्य अब अपने कर्ज को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा जागरूक हैं। कुछ राज्यों ने केंद्र के मंत्रालय की टीमों के साथ बातचीत भी की है, जिससे उन्हें अपने कर्ज को रीस्ट्रक्चर करने में मदद मिली।
कर्ज लेना जरूरी, लेकिन उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए
पब्लिक डेट से जुड़े सवाल पर वित्त मंत्री ने कहा कि किसी भी देश के लिए कर्ज लेना पूरी तरह असामान्य नहीं है। उन्होंने माना कि सरकारें केवल अपने उपलब्ध संसाधनों के आधार पर सभी विकास कार्य नहीं कर सकतीं।
हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कर्ज की मात्रा और उसके इस्तेमाल का उद्देश्य दोनों महत्वपूर्ण हैं। सरकारों को यह देखना चाहिए कि लिया गया कर्ज किस काम में लगाया जा रहा है और उससे भविष्य में कितनी आर्थिक क्षमता तैयार होगी।
इसका मतलब है कि केवल कर्ज बढ़ाना समाधान नहीं है। कर्ज का इस्तेमाल ऐसी परिसंपत्तियां और बुनियादी ढांचा तैयार करने में होना चाहिए, जो भविष्य में अर्थव्यवस्था की क्षमता बढ़ाएं और सरकार को कर्ज चुकाने में मदद करें।
कस्टम ड्यूटी में बदलाव का क्या असर हो सकता है?
अगर आने वाले बजटों में कस्टम ड्यूटी को और कम किया जाता है, तो इसका असर कई स्तरों पर देखने को मिल सकता है। कम आयात शुल्क से कुछ विदेशी सामान और औद्योगिक इनपुट सस्ते हो सकते हैं। इससे उन भारतीय कंपनियों को फायदा मिल सकता है जो आयातित कच्चे माल या मशीनरी का इस्तेमाल करती हैं।
दूसरी तरफ, जिन घरेलू कंपनियों को ऊंचे आयात शुल्क से सुरक्षा मिलती है, उनके लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इसलिए सरकार को हर सेक्टर की स्थिति को ध्यान में रखकर टैरिफ में बदलाव करना होगा।
कुल मिलाकर, वित्त मंत्री के संकेत बताते हैं कि सरकार की टैक्स सुधार की प्रक्रिया अभी खत्म नहीं हुई है। जीएसटी और इनकम टैक्स के बाद अब कस्टम ड्यूटी के ढांचे को और सरल बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यदि 2027-28 तक ज्यादातर टैरिफ सिंगल डिजिट में लाने की योजना आगे बढ़ती है, तो यह भारत की आयात नीति और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव साबित हो सकता है।


