अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में मंगलवार 19 मई 2026 को मामूली कमजोरी देखने को मिली, लेकिन पूरे महीने का ट्रेंड अब भी मजबूती वाला बना हुआ है। वैश्विक बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई है, जिससे दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों के साथ भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दबाव बढ़ रहा है।
मंगलवार को क्रूड ऑयल की कीमत लगभग 0.06 डॉलर की हल्की गिरावट के साथ 110.78 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई। हालांकि मई महीने की शुरुआत की तुलना में अभी भी तेल करीब 3 फीसदी महंगा बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य-पूर्व में जारी तनाव, सप्लाई को लेकर अनिश्चितता और वैश्विक मांग में मजबूती के कारण आने वाले दिनों में कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
मई में कैसा रहा क्रूड ऑयल का प्रदर्शन?
मई 2026 के दौरान कच्चे तेल की कीमतों में काफी अस्थिरता देखने को मिली। महीने की शुरुआत 107.64 डॉलर प्रति बैरल के स्तर से हुई थी, जबकि 19 मई तक यह बढ़कर 110.75 डॉलर के करीब पहुंच गई।
महीने के दौरान सबसे ऊंचा स्तर 4 मई को 113.63 डॉलर प्रति बैरल दर्ज किया गया, जबकि सबसे निचला स्तर 7 मई को 100.63 डॉलर रहा। इस तरह पूरे महीने में क्रूड ऑयल लगभग 2.89 फीसदी मजबूत हुआ है।
| तारीख | कीमत |
|---|---|
| 1 मई 2026 | $107.64 |
| 19 मई 2026 | $110.75 |
| मई का उच्चतम स्तर | $113.63 |
| मई का न्यूनतम स्तर | $100.63 |
| कुल बदलाव | +2.89% |
क्यों बढ़ रही हैं कच्चे तेल की कीमतें?
विशेषज्ञों के मुताबिक इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई ऐसे फैक्टर हैं जो तेल की कीमतों को ऊपर बनाए हुए हैं। सबसे बड़ा कारण मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान, इजरायल और अमेरिका से जुड़े घटनाक्रमों ने सप्लाई चेन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। दुनिया को डर है कि अगर तेल सप्लाई प्रभावित हुई तो कीमतों में और बड़ी तेजी आ सकती है।
इसके अलावा ओपेक प्लस (OPEC+) देशों की उत्पादन नीति भी बाजार को प्रभावित कर रही है। कई तेल उत्पादक देश सप्लाई को सीमित रखकर कीमतों को ऊंचा बनाए रखना चाहते हैं।
उधर अमेरिका और चीन जैसे बड़े देशों में ऊर्जा की मांग मजबूत बनी हुई है। गर्मियों के मौसम में ट्रैवल और इंडस्ट्रियल एक्टिविटी बढ़ने से भी तेल की खपत में तेजी आती है।
भारत पर क्या पड़ेगा असर?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चा तेल आयातक देशों में शामिल है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
अगर क्रूड ऑयल लंबे समय तक 110 डॉलर के ऊपर बना रहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ने से खाने-पीने की चीजें, सब्जियां, FMCG उत्पाद और लॉजिस्टिक्स महंगे हो सकते हैं।
हाल के दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी भी इसी दबाव का संकेत मानी जा रही है। कई ब्रोकरेज रिपोर्ट्स पहले ही चेतावनी दे चुकी हैं कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी जारी रही तो भारत में ईंधन कीमतों में और इजाफा हो सकता है।
रुपये पर भी बढ़ सकता है दबाव
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। जब भारत ज्यादा महंगा तेल खरीदता है तो डॉलर की मांग बढ़ती है। इससे भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर रहीं तो भारत का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) भी प्रभावित हो सकता है। इसका असर शेयर बाजार और महंगाई दोनों पर दिखाई दे सकता है।
आगे क्या हो सकता है?
मार्केट एक्सपर्ट्स के मुताबिक आने वाले हफ्तों में क्रूड ऑयल बाजार काफी संवेदनशील बना रह सकता है। अगर मध्य-पूर्व का तनाव और बढ़ता है या सप्लाई प्रभावित होती है तो कीमतें फिर 115 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं।
हालांकि अगर वैश्विक स्तर पर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है तो बाजार में कुछ राहत देखने को मिल सकती है। फिलहाल निवेशकों की नजर OPEC+ की अगली रणनीति, अमेरिकी क्रूड स्टॉक डेटा और मध्य-पूर्व के घटनाक्रम पर बनी हुई है।
जानकारों का मानना है कि भारत जैसे आयातक देशों के लिए आने वाले कुछ महीने चुनौतीपूर्ण रह सकते हैं क्योंकि ऊंची ऊर्जा कीमतें महंगाई को फिर से बढ़ा सकती हैं।
Source: Goodreturns Crude Oil Prices
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