अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध से वैश्विक कंपनियों पर भारी असर
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रह गया है। इस युद्ध ने दुनिया भर की बड़ी कंपनियों के बिजनेस मॉडल, सप्लाई चेन और मुनाफे को हिला कर रख दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर संकट और शिपिंग लागत बढ़ने से वैश्विक कॉरपोरेट सेक्टर को अब तक करीब 25 अरब डॉलर यानी लगभग ₹2.41 लाख करोड़ का नुकसान हो चुका है।
रॉयटर्स की एक विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका, यूरोप और एशिया की सैकड़ों कंपनियों ने अपने निवेशकों को चेतावनी दी है कि युद्ध की वजह से उनकी लागत तेजी से बढ़ी है और बिक्री प्रभावित हुई है। कई कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ा दिए हैं जबकि कुछ ने कर्मचारियों की छुट्टियां, उत्पादन कटौती और डिविडेंड रोकने जैसे कठोर कदम उठाए हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा संकट
इस पूरे आर्थिक संकट की सबसे बड़ी वजह ईरान की ओर से होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ा तनाव माना जा रहा है। यह दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापारिक मार्ग है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस रूट पर खतरा बढ़ने के बाद ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं।
युद्ध शुरू होने से पहले की तुलना में कच्चे तेल की कीमतों में 50% से ज्यादा की तेजी दर्ज की गई है। इसका असर सीधे तौर पर एयरलाइन कंपनियों, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, ट्रांसपोर्ट कंपनियों, FMCG कंपनियों, ऑटो सेक्टर पर पड़ा है।
ऊर्जा महंगी होने से उत्पादन लागत बढ़ी है और सप्लाई चेन की लागत भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।
279 कंपनियों ने उठाए बड़े कदम
युद्ध से पैदा हुए आर्थिक दबाव को कम करने के लिए दुनिया भर की कम से कम 279 कंपनियों ने आपातकालीन कदम उठाए हैं। इनमें शामिल हैं:
प्रोडक्ट्स महंगे करना
कई कंपनियों ने कच्चे माल और ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ने के बाद अपने प्रोडक्ट्स के दाम बढ़ा दिए हैं। एयरलाइंस ने फ्यूल सरचार्ज भी बढ़ाना शुरू कर दिया है।
प्रोडक्शन में कटौती
कई कंपनियों ने मांग घटने और लागत बढ़ने की वजह से उत्पादन कम कर दिया है। कुछ कंपनियों ने कर्मचारियों को बिना वेतन छुट्टी पर भेजा है।
डिविडेंड और शेयर बायबैक रोके
कई बड़ी कंपनियों ने कैश बचाने के लिए डिविडेंड भुगतान और शेयर बायबैक योजनाएं अस्थायी रूप से रोक दी हैं।
सरकारी मदद की मांग
ऊर्जा और ट्रांसपोर्ट सेक्टर की कुछ कंपनियों ने सरकारों से राहत पैकेज और वित्तीय सहायता की मांग भी की है।
किस सेक्टर को कितना नुकसान?
एविएशन सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित
युद्ध का सबसे बड़ा असर एयरलाइन इंडस्ट्री पर पड़ा है। जेट फ्यूल यानी ATF की कीमतें लगभग दोगुनी हो चुकी हैं। इससे वैश्विक एयरलाइन कंपनियों को अकेले करीब 15 अरब डॉलर का नुकसान होने का अनुमान है।
एयरलाइंस के सामने दोहरी चुनौती है: ईंधन महंगा, यात्रियों की मांग कमजोर. कई अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस ने पश्चिम एशिया के ऊपर से उड़ानें बंद कर दी हैं, जिससे ऑपरेटिंग कॉस्ट और बढ़ गई है।
ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी दबाव
जापान की दिग्गज कार निर्माता Toyota ने चेतावनी दी है कि मौजूदा संकट से उसे करीब 4.3 अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है। वहीं जर्मनी की टायर निर्माता Continental ने दूसरी तिमाही में 100 मिलियन यूरो से अधिक के नुकसान की आशंका जताई है।
ऑटो सेक्टर पर असर की बड़ी वजहें: कच्चे माल की लागत बढ़ना, शिपिंग खर्च बढ़ना, सप्लाई चेन बाधित होना, उपभोक्ता मांग में कमजोरी
FMCG और कंज्यूमर गुड्स कंपनियां भी परेशान
दुनिया की बड़ी FMCG कंपनी Procter & Gamble ने अनुमान लगाया है कि उसके टैक्स के बाद मुनाफे में करीब 1 अरब डॉलर की गिरावट आ सकती है। होम अप्लायंस निर्माता Whirlpool ने पूरे साल के मुनाफे के अनुमान को लगभग आधा कर दिया है।
इन कंपनियों को: प्लास्टिक, पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट, बिजली की लागत बढ़ने से भारी दबाव झेलना पड़ रहा है।
फास्ट फूड कंपनियों पर भी असर
McDonald’s के CEO क्रिस केम्पचिंस्की ने कहा कि ईंधन की बढ़ती कीमतों का असर सबसे ज्यादा कम आय वाले ग्राहकों पर पड़ रहा है। लोग बाहर खाने और गैर-जरूरी खर्च कम कर रहे हैं।
इसका असर: फास्ट फूड बिक्री, रेस्तरां ट्रैफिक, डिलीवरी बिजनेस पर साफ दिखाई देने लगा है।
यूरोप और एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित
विश्लेषकों के मुताबिक सबसे ज्यादा प्रभावित कंपनियां यूरोप और ब्रिटेन की हैं क्योंकि वहां पहले से ही ऊर्जा संकट चल रहा था। अब युद्ध ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। एशिया की कंपनियों पर भी भारी दबाव है क्योंकि: भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, चीन जैसे देश बड़ी मात्रा में मध्य पूर्व से तेल आयात करते हैं।
कई जरूरी वस्तुओं की सप्लाई प्रभावित
युद्ध का असर सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। कई अहम इंडस्ट्रियल उत्पादों की सप्लाई भी प्रभावित हुई है, जिनमें शामिल हैं: फर्टिलाइजर, हीलियम, एल्युमिनियम, पॉलीथीन, पेट्रोकेमिकल्स. इससे आने वाले महीनों में महंगाई और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है।
भारत पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने पर: पेट्रोल-डीजल महंगे हो सकते हैं, महंगाई बढ़ सकती है, रुपया कमजोर हो सकता है, सरकार का आयात बिल बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत समेत एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
Also Read:


