देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। पिछले 5 दिनों में दूसरी बार तेल कंपनियों ने ईंधन के दाम बढ़ाए हैं, लेकिन बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह बढ़ोतरी अभी भी पर्याप्त नहीं है। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज (Kotak Institutional Equities) की ताजा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल के दामों में और बड़ी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
मंगलवार को जारी नए रेट के अनुसार दिल्ली में पेट्रोल 87 पैसे प्रति लीटर महंगा हुआ, जबकि डीजल की कीमत में 91 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि की गई। इससे पहले भी पिछले सप्ताह पेट्रोल और डीजल की कीमतों में करीब 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी। बावजूद इसके तेल कंपनियां अभी भी भारी नुकसान झेल रही हैं।
क्यों बढ़ रहे हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?
इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, ईरान-इजराइल संकट और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास पैदा हुए भू-राजनीतिक जोखिमों ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। यदि यहां किसी तरह का व्यवधान आता है, तो वैश्विक स्तर पर तेल सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इसी आशंका के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं और कई मौकों पर यह 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुका है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश के पेट्रोल-डीजल दामों पर पड़ता है।
तेल कंपनियों को हो रहा भारी नुकसान
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के मुताबिक, हालिया बढ़ोतरी के बाद भी सरकारी तेल विपणन कंपनियां यानी इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम भारी अंडर-रिकवरी का सामना कर रही हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि डीजल पर करीब 11.40 रुपये प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है, पेट्रोल पर लगभग 14.30 रुपये प्रति लीटर की अंडर-रिकवरी बनी हुई है कंपनियों को रोजाना 800 से 900 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है
विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट नहीं आती, तो तेल कंपनियों के लिए कीमतें और बढ़ाना मजबूरी बन जाएगा।
हर महीने 25000 करोड़ रुपये से ज्यादा का बोझ
रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा तेल कीमतों के कारण भारतीय रिफाइनरियों पर हर महीने 25,000 से 26,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ रहा है। सरकार फिलहाल कंपनियों को पूरी तरह कीमतें बढ़ाने की खुली छूट नहीं देना चाहती क्योंकि इससे महंगाई तेजी से बढ़ सकती है।
लेकिन लगातार बढ़ते नुकसान के कारण तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ रहा है। यही वजह है कि बाजार विशेषज्ञ अब आने वाले हफ्तों में एक और बड़ी मूल्य वृद्धि की आशंका जता रहे हैं।
कितनी बढ़ सकती हैं कीमतें?
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज का अनुमान है कि तेल कंपनियों को अपने नुकसान की भरपाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 13 से 17 रुपये प्रति लीटर तक की और बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
अगर ऐसा होता है तो देश में ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ेगी, खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी, टैक्सी और बस किराए बढ़ सकते हैं, ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं की लागत बढ़ सकती है, महंगाई दर पर नया दबाव बनेगा
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार फिलहाल चरणबद्ध तरीके से कीमतें बढ़ाने की रणनीति अपना सकती है ताकि एक बार में जनता पर बड़ा बोझ न पड़े।
आम आदमी पर क्या होगा असर?
पेट्रोल और डीजल सिर्फ वाहन चलाने का ईंधन नहीं हैं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था की लागत इनसे जुड़ी होती है। डीजल महंगा होने से ट्रकों की लागत बढ़ती है, जिसका असर सब्जियों, फल, दूध, दवाइयों और रोजमर्रा की वस्तुओं तक पर पड़ता है।
भारत में ज्यादातर माल ढुलाई सड़क मार्ग से होती है। ऐसे में ईंधन महंगा होने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर दिखाई देता है। खासकर मध्यम वर्ग और छोटे कारोबारियों के लिए यह बड़ा झटका साबित हो सकता है।
सरकार के सामने बड़ी चुनौती
सरकार के सामने इस समय दोहरी चुनौती है। एक तरफ तेल कंपनियों का नुकसान लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने से महंगाई और जनता की नाराजगी का खतरा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है और कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल के दामों में और बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।
क्या आगे राहत मिल सकती है?
राहत तभी संभव है जब: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता हो, पश्चिम एशिया में तनाव कम हो, रूस और ओपेक देशों से सप्लाई बेहतर हो, होर्मुज जलडमरूमध्य में स्थिति सामान्य बने.
हालांकि फिलहाल वैश्विक संकेत राहत देने वाले नजर नहीं आ रहे हैं। यही वजह है कि बाजार विशेषज्ञ आने वाले समय में ईंधन कीमतों पर दबाव जारी रहने की संभावना जता रहे हैं।
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