Crude Oil Price Outlook: कच्चे तेल की कीमतों में इन दिनों भू-राजनीतिक तनाव के चलते काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। खासकर मिडिल ईस्ट और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जुड़े जोखिमों ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, अगर आने वाले समय में तनाव कम होता है तो क्रूड ऑयल की कीमतों पर दबाव देखने को मिल सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा कीमतों में भू-राजनीतिक जोखिम के कारण जो अतिरिक्त प्रीमियम जुड़ा हुआ है, अगर वह धीरे-धीरे खत्म होता है तो अगले 12 महीनों में कच्चे तेल की कीमतें मौजूदा स्तरों से काफी नीचे आ सकती हैं। कोटक सिक्योरिटीज की AVP-Commodity Research कायनात चेनवाला ने क्रूड ऑयल के आउटलुक को लेकर अहम अनुमान साझा किए हैं।
क्रूड ऑयल पर एक्सपर्ट का बड़ा अनुमान
कायनात चेनवाला के मुताबिक, अगले 12 महीनों में अगर मिडिल ईस्ट में तनाव कम होता है और वैश्विक तेल सप्लाई सामान्य स्थिति में लौटती है, तो ब्रेंट क्रूड की कीमत 60-70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकती है।
वहीं अमेरिकी बेंचमार्क WTI क्रूड 55-65 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच सकता है। हालांकि, यह अनुमान इस बात पर निर्भर करेगा कि भू-राजनीतिक परिस्थितियां किस दिशा में जाती हैं और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आवाजाही कितनी सामान्य रहती है।
Highlights
- भू-राजनीतिक तनाव फिलहाल क्रूड ऑयल की कीमतों का सबसे बड़ा ड्राइवर बना हुआ है।
- तनाव कम होने पर ब्रेंट क्रूड 60-70 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकता है।
- WTI की कीमत 55-65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहने का अनुमान है।
- 2027 तक वैश्विक तेल सप्लाई में करीब 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी संभव है।
- मांग में करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की रिकवरी का अनुमान है।
- सप्लाई और मांग के बीच बड़ा अंतर बनने पर क्रूड की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
अभी क्रूड की कीमतों में इतना उतार-चढ़ाव क्यों?
कच्चे तेल के बाजार में इस समय सबसे बड़ा जोखिम भू-राजनीतिक तनाव है। सामान्य परिस्थितियों में देखें तो कई ऐसे फैक्टर मौजूद हैं जो क्रूड की कीमतों पर दबाव डाल सकते हैं।
अमेरिका और ब्राजील जैसे गैर-OPEC देशों से तेल उत्पादन और सप्लाई बढ़ रही है। दूसरी तरफ दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोक्ताओं में शामिल चीन की मांग में भी इस साल अपेक्षाकृत कमजोरी देखने को मिली है।
इन दोनों परिस्थितियों को देखते हुए सामान्य बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बनना चाहिए था। लेकिन मिडिल ईस्ट में तनाव और खासकर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जुड़ा जोखिम बाजार की सामान्य तस्वीर पर भारी पड़ रहा है।
यही वजह है कि क्रूड ऑयल में इस समय किसी एक दिशा में लगातार तेजी या गिरावट के बजाय तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापारिक मार्गों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले कच्चे तेल की बड़ी मात्रा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है।
ऐसे में अगर किसी संघर्ष या सुरक्षा संकट के कारण इस मार्ग से तेल की आवाजाही बाधित होती है, तो वैश्विक बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है। इसका सीधा असर क्रूड ऑयल की कीमतों पर पड़ सकता है।
इसी कारण बाजार में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को लेकर आने वाली हर खबर पर निवेशकों और ट्रेडर्स की नजर रहती है।
अगले 12 महीनों में कितने हो सकते हैं Crude Oil के दाम?
विशेषज्ञ के अनुमान के मुताबिक, मौजूदा कीमतों में शामिल भू-राजनीतिक जोखिम के प्रीमियम को अलग कर दिया जाए तो अगले 12 महीनों में क्रूड की कीमतें काफी नरम हो सकती हैं।
अनुमान के अनुसार:
| क्रूड | अगले 12 महीनों का संभावित दायरा |
|---|---|
| Brent Crude | $60-$70 प्रति बैरल |
| WTI Crude | $55-$65 प्रति बैरल |
हालांकि, ये अनुमान सामान्य परिस्थितियों के लिए हैं। अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहता है या तेल की सप्लाई में बड़ी बाधा आती है तो कीमतें इस अनुमान से काफी ऊपर जा सकती हैं।
2027 तक सप्लाई में 8 मिलियन बैरल की बढ़ोतरी
क्रूड ऑयल के आउटलुक में सबसे महत्वपूर्ण बात वैश्विक सप्लाई से जुड़ी है। विशेषज्ञ के मुताबिक, 2027 तक वैश्विक तेल सप्लाई में करीब 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी हो सकती है।
दूसरी तरफ इस अवधि में वैश्विक तेल मांग में करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की रिकवरी का अनुमान है।
अगर सप्लाई और मांग के इन अनुमानों को साथ रखकर देखा जाए तो बाजार में बड़ी मात्रा में अतिरिक्त तेल उपलब्ध हो सकता है। यही संभावित सप्लाई सरप्लस आने वाले समय में क्रूड ऑयल की कीमतों को नीचे रखने वाला सबसे बड़ा कारण बन सकता है।
करीब 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन का सरप्लस बन सकता है
सप्लाई में अनुमानित 8 मिलियन बैरल प्रतिदिन की बढ़ोतरी और मांग में करीब 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की रिकवरी के बीच बड़ा अंतर है। विशेषज्ञ के अनुमान के मुताबिक बाजार में करीब 5 मिलियन बैरल प्रतिदिन का सप्लाई सरप्लस बन सकता है।
इतनी बड़ी अतिरिक्त सप्लाई बाजार के लिए महत्वपूर्ण है। अगर मांग उस अनुपात में नहीं बढ़ती है, तो उत्पादकों के पास उपलब्ध अतिरिक्त तेल कीमतों पर दबाव डाल सकता है।
हालांकि, वास्तविक सरप्लस कई अन्य फैक्टर्स पर भी निर्भर करेगा। इसमें OPEC+ की उत्पादन नीति, अमेरिका और ब्राजील का उत्पादन, रूस की सप्लाई तथा वैश्विक आर्थिक गतिविधियों की रफ्तार प्रमुख हैं।
कब फिर तेजी से बढ़ सकते हैं कच्चे तेल के दाम?
क्रूड ऑयल के लिए सबसे बड़ा जोखिम फिलहाल भू-राजनीतिक स्थिति बनी हुई है। अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज लंबे समय तक बाधित रहता है या वहां गंभीर सप्लाई संकट पैदा होता है, तो तेल की कीमतें मौजूदा अनुमान से काफी ऊपर जा सकती हैं।
ऐसी स्थिति में बाजार में अचानक सप्लाई की कमी का डर पैदा होगा। तेल आयात करने वाले देशों की तरफ से अतिरिक्त खरीदारी बढ़ सकती है और इससे क्रूड की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों का अनुमान किसी निश्चित कीमत की गारंटी नहीं है, बल्कि मौजूदा परिस्थितियों और संभावित सप्लाई-डिमांड संतुलन के आधार पर तैयार किया गया आउटलुक है।
अगर मिडिल ईस्ट में तनाव खत्म हुआ तो क्या होगा?
इसके उलट अगर मिडिल ईस्ट में तनाव तेजी से कम होता है और तेल की सप्लाई सामान्य होने लगती है, तो क्रूड ऑयल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके साथ अगर OPEC+ उत्पादन बढ़ाने में अनुशासन बनाए रखता है, खाड़ी देशों का उत्पादन सामान्य स्तर पर लौटता है और रूस की सप्लाई भी बाजार में वापस आती है, तो अतिरिक्त तेल उपलब्धता और बढ़ सकती है।
ऐसी स्थिति में ब्रेंट और WTI दोनों अपने अनुमानित दायरे के निचले स्तर की ओर तेजी से बढ़ सकते हैं।
भारत पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत के लिए सकारात्मक खबर हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड सस्ता होने पर देश के आयात बिल पर दबाव कम हो सकता है।
इसके अलावा कम तेल कीमतों से महंगाई को नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है। पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों, परिवहन लागत और कई उद्योगों के इनपुट कॉस्ट पर भी इसका अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
हालांकि, भारतीय उपभोक्ताओं को इसका पूरा फायदा कितनी जल्दी मिलेगा, यह घरेलू ईंधन कीमतों, टैक्स, रुपये की डॉलर के मुकाबले स्थिति और तेल कंपनियों की प्राइसिंग पर भी निर्भर करता है।
निवेशकों को किन बातों पर रखनी चाहिए नजर?
आने वाले महीनों में क्रूड ऑयल की दिशा तय करने वाले कुछ प्रमुख संकेतक होंगे। इनमें सबसे पहले मिडिल ईस्ट की भू-राजनीतिक स्थिति और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल की आवाजाही शामिल है।
इसके अलावा OPEC+ की बैठक और उत्पादन नीति, अमेरिका का तेल उत्पादन, चीन की मांग, वैश्विक आर्थिक विकास और डॉलर की चाल भी कच्चे तेल के बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहेंगे।
अगर सप्लाई लगातार बढ़ती है और मांग कमजोर रहती है तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं किसी बड़े भू-राजनीतिक घटनाक्रम से सप्लाई बाधित हुई तो बाजार में अचानक तेजी भी आ सकती है।
निष्कर्ष
कच्चे तेल के लिए फिलहाल तस्वीर दो अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करती दिखाई दे रही है। मिडिल ईस्ट में तनाव कम होता है तो बढ़ती सप्लाई और कमजोर मांग क्रूड की कीमतों को नीचे खींच सकती है। ऐसे में अगले 12 महीनों में ब्रेंट के 60-70 डॉलर और WTI के 55-65 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में आने का अनुमान है।
दूसरी तरफ, अगर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से जुड़ा संकट लंबा खिंचता है या वैश्विक तेल सप्लाई में बड़ी बाधा आती है, तो कीमतों में फिर तेज उछाल देखने को मिल सकता है। इसलिए आने वाले समय में क्रूड बाजार के लिए भू-राजनीति बनाम बढ़ती सप्लाई की यह जंग सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर रहेगी।
नोट: यह लेख उपलब्ध विशेषज्ञ अनुमान पर आधारित है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बदल सकती हैं और किसी भी निवेश या ट्रेडिंग निर्णय से पहले स्वतंत्र रिसर्च और विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।


