Crude Oil Price: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच समझौते की उम्मीद कमजोर होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर 91 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। वहीं, अमेरिकी WTI क्रूड भी 85 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर कारोबार कर रहा है। बाजार में सप्लाई बाधित होने की आशंका बढ़ने से निवेशकों की नजर अब ईरान-अमेरिका तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति पर बनी हुई है।
ब्रेंट क्रूड 91 डॉलर के पार
पिछले कारोबारी सत्र में 30 जुलाई के बाद के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचने के बाद ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 27 सेंट यानी 0.3% बढ़कर 91.14 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गए।
वहीं, US वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड फ्यूचर्स 42 सेंट बढ़कर 85.04 डॉलर प्रति बैरल हो गए। कारोबार के दौरान WTI में 1% से ज्यादा की तेजी देखने को मिली और यह 85.37 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो 31 जुलाई के बाद का इसका सबसे ऊंचा स्तर रहा।
ईरान-US तनाव बढ़ने से क्यों महंगा हुआ कच्चा तेल?
तेल की कीमतों में तेजी की सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव है। ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम और किसी व्यापक समझौते की उम्मीद कमजोर हुई है। ईरान ने अपना रुख ज्यादा आक्रामक किया है, जबकि अमेरिका ने युद्धविराम को आगे बढ़ाने से इनकार किया है।
इस घटनाक्रम से बाजार में यह चिंता बढ़ी है कि अगर तनाव और बढ़ता है तो मिडिल ईस्ट से होने वाली एनर्जी सप्लाई प्रभावित हो सकती है। दुनिया के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की सप्लाई अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है।
60 दिन की समय-सीमा खत्म, लेकिन समझौता नहीं
ईरान और अमेरिका के बीच अंतिम समझौते के लिए तय की गई 60 दिन की समय-सीमा बिना किसी समझौते के खत्म हो गई है। इससे बाजार में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
वॉशिंगटन और तेहरान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज समेत कई अहम मुद्दों पर अभी भी गहरी असहमति बनी हुई है। ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग के प्रबंधन को लेकर ओमान के साथ बातचीत कर रहा है, जबकि अमेरिका इन वार्ताओं में शामिल नहीं है।
रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की ओर से ईरान पर नए और कड़े प्रतिबंध लगाए जाने की भी संभावना है। अगर ये प्रतिबंध लागू होते हैं तो वैश्विक तेल बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता और बढ़ सकती है।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर बाजार की नजर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की बड़ी बाधा वैश्विक कच्चे तेल की सप्लाई पर असर डाल सकती है।
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने के साथ इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। इसी वजह से निवेशक तेल की कीमतों में संभावित सप्लाई रिस्क को प्रीमियम के तौर पर शामिल कर रहे हैं।
अगर होर्मुज में आवाजाही प्रभावित होती है या तेल निर्यात में बड़ी रुकावट आती है तो कच्चे तेल की कीमतों में और तेज उछाल देखने को मिल सकता है।
इस साल क्रूड ऑयल करीब 50% चढ़ा
मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव और युद्ध के कारण इस साल कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50% की तेजी आई है। बाजार में लगातार यह चिंता बनी हुई है कि क्षेत्रीय संघर्ष के कारण एनर्जी सप्लाई बाधित हो सकती है।
हालांकि, पर्शियन गल्फ के प्रमुख तेल उत्पादक देश सप्लाई बनाए रखने के लिए वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे संभावित सप्लाई संकट को कुछ हद तक नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
सऊदी अरब की ओर से ऐसे कार्गो की पेशकश भी की जा रही है जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बाहर से आने वाले रास्तों का इस्तेमाल करते हैं। इससे संकेत मिलता है कि प्रमुख तेल उत्पादक देश चोकपॉइंट से बचने के लिए वैकल्पिक एक्सपोर्ट रूट तलाश रहे हैं।
$95 तक जा सकता है क्रूड?
कमोडिटी मार्केट विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर ईरान-अमेरिका तनाव और बढ़ता है या नए प्रतिबंधों के कारण तेल की सप्लाई प्रभावित होती है तो कच्चे तेल की कीमत में और तेजी आ सकती है।
कोटक सिक्योरिटीज में कमोडिटी रिसर्च की AVP कायनात चेनवाला के मुताबिक, तनाव बढ़ने या प्रतिबंधों के कारण स्थिति बिगड़ने पर क्रूड ऑयल की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है। वहीं, अगर क्षेत्र में हमलों और तनाव में कमी आती है तो कीमतों में तेजी सीमित हो सकती है।
इससे साफ है कि आने वाले दिनों में क्रूड की दिशा काफी हद तक ईरान-अमेरिका बातचीत, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की स्थिति और संभावित अमेरिकी प्रतिबंधों पर निर्भर करेगी।
भारत पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड महंगा होने से भारत का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और रुपये पर भी दबाव पड़ सकता है।
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बना रहता है तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और परिवहन लागत पर भी पड़ सकता है। हालांकि, घरेलू ईंधन की कीमतों में बदलाव कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है।
फिलहाल निवेशकों की नजर मिडिल ईस्ट के घटनाक्रम पर है। ईरान-अमेरिका तनाव में किसी तरह की कमी आने पर क्रूड की कीमतों पर दबाव बन सकता है, जबकि तनाव बढ़ने पर 95 डॉलर का स्तर भी बाजार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
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