CJI Surya Kant: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने वैश्विक मनी लॉन्ड्रिंग के विशाल पैमाने को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि एक साल में दुनिया भर में लॉन्डर किया जाने वाला पैसा इतना हो सकता है कि उससे धरती पर मौजूद करीब 8 अरब लोगों में से हर व्यक्ति के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सके।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने वैश्विक स्तर पर बढ़ते आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर गंभीर चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि दुनिया में हर साल अवैध तरीके से घुमाया जाने वाला धन इतना बड़ा हो सकता है कि उससे करीब 8 अरब लोगों में से प्रत्येक के लिए एक साधारण लैपटॉप खरीदा जा सके। चिंता की बात यह है कि इस विशाल अवैध रकम का बेहद छोटा हिस्सा ही आखिरकार बरामद हो पाता है।
जस्टिस सूर्यकांत ने यह टिप्पणी शनिवार को कैम्ब्रिज में आयोजित ‘इकोनॉमिक क्राइम’ पर 43वें इंटरनेशनल सिम्पोजियम के समापन सत्र में की। उन्होंने आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए केवल अपराध की पहचान और जांच तक सीमित रहने के बजाय अवैध धन का पता लगाने, उसे फ्रीज करने, जब्त करने और पीड़ितों या संबंधित देशों को वापस दिलाने पर ज्यादा ध्यान देने की अपील की।
मनी लॉन्ड्रिंग का पैमाना कितना बड़ा?
जस्टिस सूर्यकांत ने वैश्विक मनी लॉन्ड्रिंग के अनुमान को बेहद व्यापक बताते हुए कहा कि अगर उपलब्ध वैश्विक अनुमान मोटे तौर पर भी सही हैं, तो एक साल में लॉन्डर किया जाने वाला पैसा इतनी बड़ी रकम हो सकती है कि उससे दुनिया की पूरी आबादी के लिए एक सामान्य लैपटॉप खरीदा जा सके और इसके बाद भी पैसा बच जाए।
उन्होंने यह भी बताया कि अवैध धन की इतनी बड़ी मात्रा में से एक प्रतिशत से भी कम रकम वास्तविक रूप से वापस हासिल हो पाती है। उनके मुताबिक, हर 100 हिस्सों में से 99 हिस्से की चर्चा रिपोर्टों और भाषणों तक सीमित रह जाती है, जबकि वास्तविक रूप से बहुत छोटा हिस्सा ही बरामद किया जा पाता है।
CJI के मुताबिक, आर्थिक अपराध के खिलाफ सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि जांच एजेंसियां अपराध का खुलासा कितनी अच्छी तरह करती हैं। असली सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि अपराध से कमाई गई संपत्ति का पता लगाने और उसे वापस हासिल करने में कितनी कामयाबी मिली।
पुराने आर्थिक अपराधों से लेकर ‘डिजिटल अरेस्ट’ तक
जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि आर्थिक अपराध आधुनिक दौर की देन नहीं हैं। धोखाधड़ी और आर्थिक अपराध सदियों से मौजूद रहे हैं, लेकिन समय के साथ उनकी तकनीक और तरीके बदलते गए हैं।
उन्होंने चौथी सदी ईसा पूर्व के यूनानी व्यापारी हेगेस्ट्रेटोस का उदाहरण दिया। उनके मुताबिक, उस मामले में बीमा का लाभ हासिल करने के लिए अपने माल को बेचने और फिर जहाज डुबोने की कथित योजना बनाई गई थी। इसे आर्थिक धोखाधड़ी के शुरुआती उदाहरणों में से एक के तौर पर पेश किया गया।
CJI ने भारतीय परंपरा के संदर्भ में कौटिल्य के अर्थशास्त्र का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस प्राचीन ग्रंथ में सरकारी राजस्व के गबन के करीब 40 तरीकों का उल्लेख मिलता है। साथ ही ऑडिट, मुखबिरों, क्रॉस-वेरिफिकेशन और जब्ती जैसे उपायों की भी चर्चा की गई है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह अर्थशास्त्र में चोरी के तरीकों की पहचान की गई थी, उसी तरह आज जरूरत है कि अवैध धन का पता लगाने, उसे फ्रीज करने और वापस हासिल करने के आधुनिक तरीकों को और मजबूत किया जाए।
‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे नए अपराध भी चुनौती
जस्टिस सूर्यकांत ने तेजी से बदलते साइबर अपराधों का भी जिक्र किया। उन्होंने ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसे मामलों को उदाहरण बनाते हुए कहा कि अपराधी टेक्नोलॉजी और वित्तीय प्रणालियों में बदलाव का फायदा उठाकर ठगी के नए तरीके अपना रहे हैं।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम में आमतौर पर ठग खुद को पुलिस, जांच एजेंसी या किसी अन्य सरकारी संस्था का अधिकारी बताकर लोगों को डराते हैं। इसके बाद गिरफ्तारी का भय दिखाकर उनसे पैसे ट्रांसफर करवाने की कोशिश की जाती है।
CJI ने कहा कि भारतीय न्यायपालिका ने ऐसे नए प्रकार के अपराधों पर प्रतिक्रिया देने में तेजी दिखाई है और इसके लिए हर बार संसद की ओर से नए कानून का इंतजार करना जरूरी नहीं समझा गया।
भारत में मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कानूनी ढांचा
जस्टिस सूर्यकांत ने भारत में आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए कानूनी ढांचे का भी उल्लेख किया। इनमें प्रमुख रूप से Prevention of Money Laundering Act, 2002 (PMLA) और Fugitive Economic Offenders Act, 2018 शामिल हैं।
उन्होंने अपराध से अर्जित संपत्ति का पता लगाने, उसे जब्त करने और कानूनी प्रक्रिया के तहत अपने कब्जे में लेने के लिए काम करने वाली संस्थाओं और विशेष अदालतों की भूमिका पर भी जोर दिया।
उनका कहना था कि केवल देश के भीतर कानून और संस्थागत व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि अवैध धन अक्सर अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को पार कर जाता है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग क्यों जरूरी?
CJI सूर्यकांत ने आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना था कि अपराध से कमाया गया पैसा अक्सर उस देश में नहीं रहता, जहां से उसे चोरी या अवैध तरीके से हासिल किया गया था।
उन्होंने Mutual Legal Assistance Treaty (MLAT) यानी आपसी कानूनी सहायता समझौतों को संपत्ति की बरामदगी के लिए महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, ऐसे समझौते कई मामलों में प्रत्यर्पण की तुलना में अवैध संपत्ति को वापस लाने के लिए अधिक उपयोगी साबित हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग देशों की कानूनी व्यवस्थाएं और प्रक्रियाएं भले ही एक जैसी न हों, लेकिन आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए उनके बीच सहयोग बढ़ाना जरूरी है।
फाइनेंशियल इंटेलिजेंस और बेनिफिशियल ओनरशिप पर जोर
जस्टिस सूर्यकांत ने अवैध फंड के प्रवाह को समझने के लिए Financial Intelligence Sharing और Beneficial Ownership Registry जैसे तंत्रों को मजबूत करने की आवश्यकता बताई।
बेनिफिशियल ओनरशिप का मकसद यह पता लगाने में मदद करना है कि किसी कंपनी, संपत्ति या वित्तीय संरचना के पीछे वास्तविक लाभार्थी कौन है। आर्थिक अपराधों में अक्सर जटिल कंपनियों और वित्तीय लेनदेन का इस्तेमाल असली मालिक या धन के स्रोत को छिपाने के लिए किया जा सकता है।
इसलिए अलग-अलग देशों की वित्तीय खुफिया और जांच एजेंसियों के बीच सूचनाओं का बेहतर आदान-प्रदान अवैध धन के नेटवर्क तक पहुंचने में अहम भूमिका निभा सकता है।
अब सिर्फ अपराध बताने से नहीं, पैसा वापस लाने से तय होगी सफलता
जस्टिस सूर्यकांत का मुख्य संदेश यही था कि आर्थिक अपराध के खिलाफ लड़ाई को केवल जांच और मुकदमे तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। अपराध से हासिल की गई संपत्ति को ट्रैक करना, फ्रीज करना, जब्त करना और अंततः वापस हासिल करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
उनके मुताबिक, आर्थिक अपराधों के खिलाफ व्यवस्था की प्रभावशीलता इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि समस्या का वर्णन कितनी अच्छी तरह किया गया है। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि चोरी या अवैध तरीके से हासिल की गई संपत्ति को वापस लाने में व्यवस्था कितनी सफल रही।
इस तरह CJI सूर्यकांत ने वैश्विक मनी लॉन्ड्रिंग के विशाल पैमाने के साथ-साथ उस धन की बेहद कम रिकवरी पर भी ध्यान खींचा। उनका जोर साफ तौर पर ‘अपराध की पहचान’ से आगे बढ़कर ‘अवैध धन की रिकवरी’ पर रहा।


