China GDP Growth Rate: दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को बड़ा आर्थिक झटका लगा है। वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही (अप्रैल-जून) में चीन की जीडीपी वृद्धि दर केवल 4.3% रही, जो न सिर्फ बाजार के अनुमान से कम है बल्कि बीजिंग द्वारा तय किए गए वार्षिक लक्ष्य से भी नीचे है। मजबूत निर्यात के बावजूद घरेलू मांग में कमजोरी, रियल एस्टेट सेक्टर की सुस्ती और ईरान संघर्ष के कारण बढ़ी वैश्विक अनिश्चितता का असर चीन की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई दिया है।
Highlights
- चीन की दूसरी तिमाही (Q2) में GDP ग्रोथ 4.3% रही।
- यह बाजार के 4.5% अनुमान से भी कम रही।
- 1991 के बाद सबसे कम आर्थिक लक्ष्य भी हासिल नहीं कर पाया चीन।
- घरेलू मांग में कमजोरी और ईरान संघर्ष का असर अर्थव्यवस्था पर दिखा।
- मजबूत निर्यात के बावजूद आर्थिक गतिविधियों में अपेक्षित तेजी नहीं आई।
- चीन का ट्रेड सरप्लस बढ़ा, लेकिन आयात और तेल खरीद में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
दूसरी तिमाही में उम्मीद से कमजोर रही चीन की अर्थव्यवस्था
चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून 2026 के दौरान देश की अर्थव्यवस्था केवल 4.3% की दर से बढ़ी। पहली तिमाही में चीन ने 5% की विकास दर दर्ज की थी, लेकिन दूसरी तिमाही में आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की अर्थव्यवस्था अभी भी कई मोर्चों पर दबाव झेल रही है। उपभोक्ताओं का खर्च उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ रहा, प्रॉपर्टी सेक्टर में संकट बना हुआ है और उद्योगों की घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है।
1991 के बाद सबसे कम विकास लक्ष्य भी नहीं हुआ हासिल
मार्च 2026 में चीन ने अपने वार्षिक आर्थिक विकास लक्ष्य को घटाकर 4.5% से 5% के दायरे में रखा था। यह 1991 के बाद का सबसे कम विकास लक्ष्य माना गया था।
हालांकि दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि चीन फिलहाल इस लक्ष्य तक पहुंचने में भी संघर्ष कर रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं।
मजबूत एक्सपोर्ट भी नहीं बचा सका अर्थव्यवस्था को
दिलचस्प बात यह है कि एक दिन पहले जारी व्यापार आंकड़ों में चीन के जून महीने के निर्यात में सालाना 27% की वृद्धि दर्ज की गई थी।
इसके बावजूद घरेलू मांग कमजोर रहने से निर्यात की मजबूती आर्थिक विकास को गति नहीं दे सकी। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल निर्यात के भरोसे लंबे समय तक आर्थिक विकास बनाए रखना संभव नहीं है।
ईरान संघर्ष और महंगे तेल का भी पड़ा असर
वैश्विक स्तर पर ईरान संघर्ष के कारण ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ी है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़े असर ने चीन की विनिर्माण गतिविधियों और आयात लागत को प्रभावित किया।
विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव का असर चीन जैसी निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई देने लगा है।
घरेलू मांग बनी सबसे बड़ी चिंता
फाइनेंशियल फर्म Natixis की एशिया पैसिफिक चीफ इकोनॉमिस्ट एलिसिया गार्सिया-हेरेरो का कहना है कि चीन के सामने सबसे बड़ी चुनौती घरेलू मांग की कमजोरी है।
उनके अनुसार यदि देश केवल निर्यात पर निर्भर रहेगा और घरेलू खपत नहीं बढ़ेगी, तो लंबे समय तक आर्थिक विकास बनाए रखना मुश्किल होगा।
आयात में बड़ा बदलाव, कच्चे तेल की खरीद घटी
ताजा आंकड़ों के अनुसार चीन का कुल आयात सालाना आधार पर 36% बढ़कर पांच वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंच गया।
हालांकि कच्चे तेल के आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। जून में चीन ने अपना मासिक क्रूड ऑयल आयात घटाकर लगभग एक दशक के सबसे निचले स्तर पर ला दिया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 41.3% कम रहा।
ट्रेड सरप्लस बढ़ने से बढ़ सकता है वैश्विक तनाव
जून महीने में चीन का ट्रेड सरप्लस बढ़कर 125.62 अरब डॉलर पहुंच गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का बढ़ता व्यापार अधिशेष यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के साथ तनाव बढ़ा सकता है। यूरोपीय संघ पहले भी चीन पर अपने औद्योगिक उत्पादों के जरिए वैश्विक बाजारों में असंतुलन पैदा करने का आरोप लगाता रहा है।
आगे क्या है चुनौती?
आर्थिक जानकारों का मानना है कि चीन को आने वाले महीनों में विकास दर बढ़ाने के लिए घरेलू खपत को प्रोत्साहित करना होगा। इसके अलावा रियल एस्टेट सेक्टर में सुधार, निवेश बढ़ाना और रोजगार सृजन पर ध्यान देना जरूरी होगा। यदि वैश्विक तनाव और ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी रहती है, तो चीन के लिए पूरे वर्ष का आर्थिक लक्ष्य हासिल करना और कठिन हो सकता है।


