नई दिल्ली: भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने मुफ्त योजनाओं (Freebies) और अत्यधिक सब्सिडी वाली सरकारी सेवाओं को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि ‘फ्री’ (मुफ्त) शब्द सार्वजनिक नीतियों में सबसे महंगा और सबसे नुकसानदेह साबित हो सकता है, क्योंकि किसी भी सेवा की वास्तविक लागत अंततः किसी न किसी को चुकानी ही पड़ती है। यह कीमत या तो उपभोक्ता देता है, या टैक्सपेयर्स पर बोझ बढ़ता है, या फिर इंफ्रास्ट्रक्चर की गुणवत्ता खराब होने लगती है।
चेन्नई में आयोजित CII Tamil Nadu Infrastructure Summit को संबोधित करते हुए अनंत नागेश्वरन ने कहा कि यदि पानी, बिजली और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं की कीमत कृत्रिम रूप से बहुत कम रखी जाती है या उन्हें पूरी तरह मुफ्त कर दिया जाता है, तो इससे संसाधनों का गलत इस्तेमाल बढ़ता है और अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक दबाव पड़ता है।
‘फ्री’ की असली कीमत आखिर कौन चुकाता है?
मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि दुनिया में कोई भी सेवा वास्तव में मुफ्त नहीं होती। यदि सरकार किसी सुविधा को बिना शुल्क उपलब्ध कराती है, तो उसकी लागत किसी न किसी माध्यम से वसूली जाती है।
उन्होंने बताया कि इसकी कीमत तीन तरीकों से सामने आती है—
- उपभोक्ता सीधे अधिक भुगतान करें।
- टैक्सपेयर्स पर अतिरिक्त करों का बोझ बढ़े।
- रखरखाव के लिए पर्याप्त धन न मिलने से इंफ्रास्ट्रक्चर धीरे-धीरे खराब होने लगे।
उनके मुताबिक यदि किसी सेवा की वास्तविक लागत नहीं वसूली जाती, तो लंबे समय में उसकी गुणवत्ता प्रभावित होती है और नई परियोजनाओं में निवेश भी कम हो जाता है।
मुफ्त पानी पर भी उठाए सवाल
अनंत नागेश्वरन ने विशेष रूप से पानी की मुफ्त आपूर्ति का उदाहरण देते हुए कहा कि जब किसी संसाधन की कीमत शून्य कर दी जाती है, तो लोग उसे असीमित मानकर उसका अधिक उपयोग करने लगते हैं। इससे पानी की बर्बादी बढ़ती है और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि मुफ्त पानी का सबसे बड़ा लाभ अक्सर उन परिवारों को मिलता है जिनके घर पहले से पाइपलाइन कनेक्शन उपलब्ध हैं। दूसरी ओर गरीब और जरूरतमंद परिवार, जिनके पास पाइपलाइन नहीं है, उन्हें निजी टैंकरों से कई गुना अधिक कीमत देकर पानी खरीदना पड़ता है।
उनके अनुसार यदि सेवाओं की उचित कीमत तय की जाए और जरूरतमंद लोगों को सीधे आर्थिक सहायता (Direct Benefit Support) दी जाए, तो व्यवस्था अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बन सकती है।
यूटिलिटी कंपनियों को भी होगा फायदा
CEA ने कहा कि बिजली, पानी और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की वास्तविक कीमत मिलने से यूटिलिटी कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत होगी। इससे उनके पास नेटवर्क विस्तार, नई पाइपलाइन, बेहतर वितरण प्रणाली और दूरदराज के क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होंगे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में कई कंपनियां वित्तीय दबाव में काम करती हैं, जिससे सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
निवेशक भावनाओं से नहीं, रिटर्न से आते हैं
अनंत नागेश्वरन ने निवेशकों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी निवेशक से केवल देशभक्ति या धैर्य के आधार पर निवेश करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि “Patient Capital” यानी लंबी अवधि का निवेश तभी आता है, जब निवेशकों को अगले 20 से 30 वर्षों तक स्थिर और भरोसेमंद रिटर्न मिलने का विश्वास हो।
उनके अनुसार यदि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की आर्थिक व्यवहार्यता मजबूत होगी और सेवाओं की उचित कीमत तय होगी, तभी निजी निवेश आकर्षित किया जा सकेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था पर भी जताया भरोसा
अपने संबोधन में मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था लगभग 7.7% की विकास दर से आगे बढ़ रही है और केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) बढ़कर 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है।
हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी खर्च के भरोसे लंबे समय तक विकास संभव नहीं है। निजी निवेश, टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय अनुशासन भी उतने ही आवश्यक हैं।
लंबे समय की विकास रणनीति पर जोर
नागेश्वरन ने कहा कि भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनने के लिए केवल लोकलुभावन योजनाओं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसके बजाय ऐसी नीतियां बनानी होंगी जो आर्थिक रूप से टिकाऊ हों, अनुबंधों का सम्मान करें और सार्वजनिक सेवाओं की वास्तविक लागत को स्वीकार करें।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार हर सेवा को मुफ्त देने की नीति अपनाती है, तो भविष्य में या तो टैक्स का बोझ बढ़ेगा या फिर सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
निष्कर्ष
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन का संदेश स्पष्ट है कि ‘फ्री’ शब्द जितना आकर्षक दिखाई देता है, उसकी वास्तविक आर्थिक कीमत उतनी ही बड़ी होती है। उनका मानना है कि जरूरतमंद लोगों को लक्षित सहायता देना बेहतर विकल्प है, बजाय इसके कि सभी के लिए सेवाओं को मुफ्त कर दिया जाए। इससे सरकारी वित्तीय स्थिति मजबूत रहेगी, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास होगा और निजी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा।


