Surjit Bhalla Analysis: BRICS को अक्सर भारत समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़े वैश्विक मंच के तौर पर देखा जाता है। लेकिन अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के ताजा विश्लेषण ने इस समूह के भीतर आर्थिक प्रदर्शन को लेकर एक अलग तस्वीर सामने रखी है। उनके मुताबिक, शुरुआती पांच BRICS सदस्यों में भारत का प्रदर्शन दूसरा सबसे अच्छा रहा है और पिछले 15 वर्षों में देश ने वास्तविक आर्थिक प्रगति की है। हालांकि, भल्ला का कहना है कि सिर्फ BRICS का सदस्य होना भारत की आर्थिक तरक्की की पूरी कहानी नहीं बताता।
सुरजीत भल्ला ने 2011 से 2025 के बीच BRICS देशों के आर्थिक प्रदर्शन और व्यापार से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। उनके मुताबिक, इस अवधि में समूह की वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी में बड़ी बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा चीन से आया। यही वजह है कि चीन को अलग करके BRICS के बाकी देशों के प्रदर्शन को देखने पर तस्वीर काफी अलग नजर आती है।
BRICS में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा?
1/ BRICS went from 21.9% of world income in 2011 to 28.9% in 2025.
Now take out China.
The other ten members went from 11.9% to 11.5%.
They did not rise. They fell. pic.twitter.com/rq18XYMIA1
— Surjit Bhalla (@surjitbhalla) September 13, 2026 भल्ला के मुताबिक, शुरुआती पांच BRICS सदस्यों में भारत का प्रदर्शन चीन के बाद दूसरा सबसे अच्छा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले डेढ़ दशक में वास्तविक आर्थिक प्रगति की है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
उनके विश्लेषण के अनुसार, भारत की सालाना आर्थिक वृद्धि दर इस अवधि में करीब 5.2 फीसदी रही और वैश्विक आय में भारत की हिस्सेदारी 2011 के करीब 2.5 फीसदी से बढ़कर 2025 में 3.5 फीसदी हो गई। इसी तरह, दुनिया की औसत प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति आय का स्तर भी 13.4 फीसदी से बढ़कर 18.7 फीसदी हुआ।
भल्ला ने इस प्रदर्शन को वास्तविक प्रगति बताया है। उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने निश्चित तौर पर आगे बढ़त हासिल की है। लेकिन उनकी चिंता यह है कि इस प्रगति को भारत के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
यही वह बिंदु है जहां उनका विश्लेषण भारत के सामने मौजूद बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है।
‘भारत की तरक्की असली है, लेकिन काफी नहीं’
सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत की आर्थिक प्रगति को स्वीकार किया जाना चाहिए, खासकर ऐसे समय में जब देश की ग्रोथ को लेकर अलग-अलग तरह की नकारात्मक धारणाएं सामने आती रहती हैं। लेकिन उनके मुताबिक भारत को अपनी मौजूदा उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए।
उनके विश्लेषण में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कितना आगे बढ़ा, बल्कि यह भी है कि इसी अवधि में दूसरे उभरते देशों ने कितना तेज प्रदर्शन किया। इसी तुलना में भारत के सामने कुछ कमजोरियां दिखाई देती हैं, खासकर निर्यात के मोर्चे पर।
BRICS की पूरी ग्रोथ में चीन का बड़ा योगदान
भल्ला के मुताबिक, 2011 में दुनिया की कुल आय में BRICS की हिस्सेदारी करीब 21.9 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़कर 28.9 फीसदी हो गई। पहली नजर में यह BRICS की मजबूत आर्थिक प्रगति दिखाई देती है।
लेकिन चीन को इस गणना से अलग कर दें तो तस्वीर बदल जाती है। उनके कैलकुलेशन के मुताबिक, चीन के बिना BRICS की वैश्विक आय में हिस्सेदारी 2011 के 11.9 फीसदी से घटकर 2025 में करीब 11.5 फीसदी रह गई।
इस दौरान अकेले चीन की वैश्विक आय में हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी से बढ़कर 17.4 फीसदी हो गई। यानी BRICS की कुल आय में हुई बढ़ोतरी का लगभग 72 फीसदी हिस्सा चीन से आया।
इसका मतलब यह है कि BRICS की सामूहिक आर्थिक ताकत बढ़ी जरूर, लेकिन इस बढ़ोतरी में चीन का योगदान बाकी सदस्यों की तुलना में कहीं ज्यादा रहा।
BRICS के भीतर चीन का दबदबा बढ़ा
चीन की बढ़ती आर्थिक हिस्सेदारी सिर्फ वैश्विक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। BRICS के भीतर भी चीन का वजन काफी बढ़ा है।
2011 में BRICS की कुल आय में चीन की हिस्सेदारी करीब 45.6 फीसदी थी। 2025 तक यह बढ़कर 60.2 फीसदी हो गई। अगर केवल शुरुआती पांच सदस्यों की बात करें तो इस समूह की कुल आय में चीन की हिस्सेदारी 54.1 फीसदी से बढ़कर 68.9 फीसदी हो गई।
भल्ला ने इसी आधार पर BRICS के बदलते स्वरूप पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि आबादी को छोड़कर लगभग हर आर्थिक पैमाने पर यह समूह पहले की तुलना में ज्यादा चीन-केंद्रित हो गया है।
हालांकि, आबादी के लिहाज से BRICS की स्थिति जरूर अलग है। 2011 में दुनिया की आबादी में इस समूह की हिस्सेदारी करीब 50.9 फीसदी थी, जो 2025 में लगभग 50.5 फीसदी रही।
व्यापार के आंकड़े भी चीन की कहानी बताते हैं
सुरजीत भल्ला ने अपने विश्लेषण में केवल GDP या आय के आंकड़ों पर निर्भर नहीं किया। उन्होंने BRICS के व्यापार प्रदर्शन को भी देखा और यहां तस्वीर और ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है।
दुनिया के कुल गुड्स एक्सपोर्ट में BRICS की हिस्सेदारी 2011 में करीब 23 फीसदी थी, जो 2023 में बढ़कर 25 फीसदी हो गई। लेकिन चीन को हटा दें तो यही हिस्सेदारी 12.4 फीसदी से घटकर सिर्फ 10.1 फीसदी रह गई।
इस अवधि में BRICS के गुड्स एक्सपोर्ट में हुई कुल बढ़ोतरी का करीब 94 फीसदी हिस्सा चीन से आया।
यह आंकड़ा बताता है कि वैश्विक व्यापार में BRICS की बढ़ती मौजूदगी को सिर्फ पूरे समूह की सामूहिक सफलता के तौर पर देखना अधूरी तस्वीर हो सकती है। इसमें चीन का निर्यात प्रदर्शन सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।
तेल निर्यातक देशों की वजह से तुलना थोड़ी जटिल
भल्ला ने यह भी माना कि BRICS के व्यापार आंकड़ों की तुलना करते समय एक महत्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना चाहिए। रूस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे सदस्य बड़े तेल निर्यातक देश हैं।
इसलिए इन देशों के निर्यात आंकड़ों पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का बड़ा असर पड़ सकता है। तेल की कीमत बढ़ने पर बिना निर्यात मात्रा में समान वृद्धि के भी डॉलर के हिसाब से एक्सपोर्ट बढ़ सकता है।
इसी वजह से भल्ला ने एक और तुलना की, जिसमें चीन और चार प्रमुख तेल निर्यातक देशों को अलग कर दिया गया।
चीन और तेल निर्यातकों को हटाने पर क्या बचता है?
चीन, रूस, सऊदी अरब, UAE और ईरान को छोड़कर BRICS के छह देशों में ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया शामिल हैं।
भल्ला के अनुसार, इन छह देशों की दुनिया के गुड्स एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी 2011 में भी करीब 5.1 फीसदी थी और 2023 में भी लगभग 5.1 फीसदी रही।
यही आंकड़ा उनके विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि चीन और तेल की कीमतों के प्रभाव को हटाने पर BRICS के इन देशों की वैश्विक वस्तु व्यापार में हिस्सेदारी में लगभग कोई बदलाव नहीं आया।
यानी समूह की बढ़ती वैश्विक आर्थिक और व्यापारिक ताकत का फायदा सभी सदस्यों को समान रूप से नहीं मिला।
भारत के सामने वियतनाम ने खड़ी की बड़ी चुनौती
भारत के प्रदर्शन को समझने के लिए भल्ला ने वियतनाम का उदाहरण भी दिया। यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही एशियाई अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।
2011 में दुनिया के गुड्स एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी करीब 1.71 फीसदी थी, जो 2023 में बढ़कर 1.88 फीसदी हुई। यानी भारत की हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन बढ़ोतरी बहुत सीमित रही।
इसके मुकाबले वियतनाम की हिस्सेदारी इसी अवधि में 0.52 फीसदी से बढ़कर 1.50 फीसदी हो गई।
वियतनाम का गुड्स एक्सपोर्ट करीब 93 अरब डॉलर से बढ़कर 345 अरब डॉलर पहुंच गया। दूसरी ओर भारत का गुड्स एक्सपोर्ट करीब 307 अरब डॉलर से बढ़कर 432 अरब डॉलर हुआ।
भल्ला ने इस तुलना के जरिए भारत के निर्यात प्रदर्शन पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि काफी छोटी आबादी वाला वियतनाम वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत के करीब पहुंच गया है।
भारत के लिए असली चुनौती क्या है?
भल्ला का विश्लेषण मूल रूप से BRICS की सफलता या असफलता का फैसला करने के बजाय भारत की आर्थिक रणनीति पर सवाल उठाता है।
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, घरेलू बाजार बड़ा है और वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक भूमिका भी बढ़ी है। लेकिन अगर भारत को चीन के विकल्प के तौर पर वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में जगह बनानी है, तो सिर्फ घरेलू आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी।
इसके लिए निर्यात, मैन्युफैक्चरिंग, वैश्विक सप्लाई चेन में भागीदारी और विदेशी निवेश जैसे क्षेत्रों में तेज प्रगति जरूरी होगी।
वियतनाम का उदाहरण बताता है कि छोटी अर्थव्यवस्था भी वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा सकती है, अगर वह निर्यात आधारित मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन में मजबूत जगह बना ले।
चीन के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भी चिंता का विषय
भल्ला ने भारत-चीन आर्थिक संबंधों को भी अपने विश्लेषण में महत्वपूर्ण माना। उनके मुताबिक, पिछले 15 वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि BRICS के आर्थिक प्रभाव में चीन का दबदबा काफी बढ़ा है।
उनका कहना है कि BRICS की कुल आर्थिक ताकत में बड़ी हिस्सेदारी ऐसे सदस्य के पास है जिसके रणनीतिक और आर्थिक हित भारत से हमेशा मेल नहीं खाते।
भारत और चीन के बीच व्यापार में बड़ा असंतुलन भी लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में सामान और औद्योगिक उत्पाद आयात करता है, जबकि भारत का चीन को निर्यात उसके मुकाबले काफी कम है।
यही वजह है कि भल्ला का संकेत यह है कि भारत को अपनी आर्थिक रणनीति तय करते समय केवल BRICS जैसे बहुपक्षीय समूहों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका और अन्य प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक रिश्तों को भी समान महत्व देना चाहिए।
BRICS भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला रास्ता नहीं
सुरजीत भल्ला के विश्लेषण को BRICS के खिलाफ बयान के तौर पर देखना सही नहीं होगा। BRICS भारत के लिए वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने, व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को विस्तार देने और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।
लेकिन आर्थिक नजरिए से सवाल यह है कि क्या BRICS की सामूहिक ग्रोथ का फायदा भारत को उतनी तेजी से मिल रहा है, जितनी उसकी क्षमता है।
भल्ला के आंकड़े इसी अंतर को सामने रखते हैं। भारत ने पिछले 15 वर्षों में वास्तविक आर्थिक प्रगति की है और शुरुआती BRICS सदस्यों में उसका प्रदर्शन दूसरा सबसे अच्छा रहा है। लेकिन चीन की तुलना में उसकी गति काफी कम रही और वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी भी बहुत तेजी से नहीं बढ़ी।
इसलिए उनके विश्लेषण का मुख्य संदेश यह है कि भारत की आर्थिक तरक्की को कम करके नहीं आंकना चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रदर्शन को पर्याप्त मानकर संतुष्ट भी नहीं होना चाहिए।
भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती तेज आर्थिक विकास को ज्यादा रोजगार, ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग, मजबूत निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन में बड़ी हिस्सेदारी में बदलने की है। अगर ऐसा होता है, तभी भारत अपनी बढ़ती आर्थिक क्षमता को वैश्विक प्रभाव में बदल पाएगा।
Source: सुरजीत भल्ला के आर्थिक विश्लेषण और उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एवं व्यापारिक आंकड़ों पर आधारित।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल आर्थिक और व्यापारिक आंकड़ों के विश्लेषण के उद्देश्य से है। इसे किसी शेयर, निवेश या वित्तीय उत्पाद में निवेश की सलाह न माना जाए।


