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    # UP के सरकारी इंजीनियर ने खड़ा किया था खरबों का JP साम्राज्य, फिर कर्ज ने किया बर्बाद; अब अदाणी के हाथों में कंपनी की कमान **JP Associates Story:** उत्तर प्रदेश के एक सरकारी इंजीनियर ने अपनी नौकरी छोड़कर कारोबार की दुनिया में कदम रखा और देखते ही देखते हजारों करोड़ रुपये का कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर दिया। यह कहानी है जयप्रकाश गौड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स (JP Associates) की। यमुना एक्सप्रेसवे, बड़े बांध, सीमेंट प्लांट, बिजली परियोजनाएं और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाने वाला यह समूह कभी देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर कारोबारियों में गिना जाता था। लेकिन जरूरत से ज्यादा कर्ज, आर्थिक मंदी और कारोबार में आई मुश्किलों ने इस साम्राज्य की नींव हिला दी। आखिरकार कंपनी दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच गई और अब इसका अधिग्रहण अदाणी समूह ने कर लिया है। **बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली।** कारोबार की दुनिया में कई ऐसी कहानियां हैं, जहां एक छोटे से सफर की शुरुआत करने वाला व्यक्ति बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर देता है। लेकिन कभी-कभी यही साम्राज्य समय के साथ कर्ज और आर्थिक चुनौतियों के कारण ढह भी जाता है। जयप्रकाश एसोसिएट्स की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। एक समय उत्तर भारत में जेपी समूह का नाम बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जाना जाता था। कंपनी ने सड़क निर्माण से लेकर बिजली उत्पादन, सीमेंट, होटल और रियल एस्टेट तक कई क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बनाई। ग्रेटर नोएडा से आगरा को जोड़ने वाला यमुना एक्सप्रेसवे भी इसी समूह की बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा। जेपी समूह की पहचान केवल बड़े प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं थी। लाखों निवेशकों और कर्मचारियों का भी इस कंपनी से जुड़ाव था। लेकिन लगातार बढ़ते कर्ज और कारोबार में आई गिरावट ने कंपनी को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया, जहां से वापसी मुश्किल हो गई। अब अदाणी समूह ने दिवालिया समाधान प्रक्रिया के जरिए जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ कर लिया है। आइए जानते हैं कि आखिर कैसे एक सरकारी इंजीनियर ने यह कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया और फिर यह आर्थिक संकट में कैसे फंस गया। ## सरकारी इंजीनियर से कारोबारी बनने तक का सफर जयप्रकाश गौड़ का जन्म वर्ष 1931 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया और इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नौकरी शुरू की। सरकारी सेवा के दौरान उन्हें निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ी परियोजनाओं को समझने का मौका मिला। हालांकि, उनके मन में खुद का कारोबार शुरू करने की इच्छा थी। करीब सात साल तक सरकारी नौकरी करने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और निर्माण कार्यों की ठेकेदारी शुरू कर दी। शुरुआत में उनके पास कारोबार के लिए बहुत ज्यादा पूंजी नहीं थी। उन्होंने अपनी करीब 10 हजार रुपये की बचत से छोटे-मोटे निर्माण और सड़क निर्माण के ठेके लेने शुरू किए। धीरे-धीरे अनुभव और काम के आधार पर उन्हें बड़ी परियोजनाएं मिलने लगीं। वर्ष 1979 में उन्होंने जयप्रकाश एसोसिएट्स की स्थापना की। शुरुआत में कंपनी का मुख्य कारोबार निर्माण और इंजीनियरिंग से जुड़ा था। समय के साथ कंपनी ने बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनाई और जेपी समूह का विस्तार होता चला गया। ## बांध से लेकर बिजली और सीमेंट तक फैला कारोबार जेपी समूह ने निर्माण क्षेत्र में अपनी पहचान मजबूत करने के बाद जलविद्युत परियोजनाओं की तरफ कदम बढ़ाया। टिहरी बांध और विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से कंपनी की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत हुई। इसके बाद समूह ने सीमेंट, बिजली उत्पादन, होटल और रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में भी कारोबार शुरू किया। कंपनी का उद्देश्य केवल निर्माण ठेके लेने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के विकास और संचालन तक पहुंच गया। इस विस्तार ने जयप्रकाश एसोसिएट्स को देश के प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर समूहों में शामिल कर दिया। कंपनी के पास अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार था और निवेशकों के बीच भी इसकी अच्छी पहचान बन गई थी। ## यमुना एक्सप्रेसवे ने दिलाई देशभर में पहचान जेपी समूह के इतिहास में यमुना एक्सप्रेसवे परियोजना को एक बड़ा पड़ाव माना जाता है। वर्ष 2003 में ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच एक्सप्रेसवे बनाने की परियोजना जेपी समूह को मिली। करीब 165 किलोमीटर लंबे इस एक्सप्रेसवे का निर्माण समूह की कंपनी जेपी इंफ्राटेक ने किया। इस परियोजना के तहत सड़क निर्माण के साथ-साथ एक्सप्रेसवे के आसपास रियल एस्टेट विकास के अधिकार भी मिले। इससे कंपनी को इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रॉपर्टी कारोबार दोनों में विस्तार का अवसर मिला। वर्ष 2012 में यमुना एक्सप्रेसवे को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। इसके बाद दिल्ली-एनसीआर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बीच सड़क संपर्क बेहतर हुआ। इस परियोजना ने जेपी समूह को देशभर में पहचान दिलाई। इसी दौरान कंपनी ने ग्रेटर नोएडा में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट का निर्माण भी किया। इस रेसिंग सर्किट पर वर्ष 2011 से 2013 तक फॉर्मूला-1 इंडियन ग्रां प्री का आयोजन हुआ। यह परियोजना भारत में मोटरस्पोर्ट्स के लिहाज से काफी चर्चित रही। ## 2008 की मंदी के बाद बिगड़ने लगे हालात तेजी से विस्तार कर रहे जेपी समूह के लिए वर्ष 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी बड़ा झटका साबित हुई। मंदी के बाद रियल एस्टेट बाजार में सुस्ती आने लगी। मकानों की बिक्री प्रभावित हुई और निर्माण परियोजनाओं से मिलने वाली रकम में देरी होने लगी। दूसरी तरफ बिजली और सीमेंट कारोबार में भी कंपनी को उम्मीद के मुताबिक कमाई नहीं हो रही थी। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की जरूरत थी, जबकि कारोबार से पर्याप्त नकदी नहीं आ रही थी। बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसी बड़ी परियोजनाओं पर हुआ निवेश भी कंपनी के वित्तीय दबाव को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल रहा। कंपनी ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए बड़ी रकम उधार ली थी, लेकिन आमदनी और नकदी का प्रवाह कर्ज चुकाने की रफ्तार के अनुरूप नहीं रहा। कर्ज का बोझ बढ़ने के साथ कंपनी को अपनी कई संपत्तियां और कारोबारी हिस्सेदारियां बेचनी पड़ीं। इसके बावजूद वित्तीय स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। धीरे-धीरे जेपी समूह का संकट गहराता चला गया। ## घर खरीदारों से लेकर बैंकों तक, हर कोई हुआ परेशान जेपी समूह का आर्थिक संकट केवल कंपनी और बैंकों तक सीमित नहीं रहा। इसका असर उन हजारों लोगों पर भी पड़ा, जिन्होंने कंपनी के रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में अपने घर बुक किए थे। नोएडा और ग्रेटर नोएडा में जेपी विशटाउन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में बड़ी संख्या में घर खरीदारों का पैसा फंस गया। कई लोगों ने अपनी जीवनभर की बचत लगाकर घर खरीदे थे, लेकिन उन्हें तय समय पर फ्लैट नहीं मिल पाए। इस स्थिति ने जेपी समूह की मुश्किलें और बढ़ा दीं। एक तरफ बैंक और वित्तीय संस्थान अपना कर्ज वापस मांग रहे थे, वहीं दूसरी तरफ घर खरीदार अपने घरों का इंतजार कर रहे थे। ## 2017 में शुरू हुई दिवालिया प्रक्रिया जेपी समूह की मुश्किलें सबसे पहले उसकी सहायक कंपनी जेपी इंफ्राटेक के मामले में सामने आईं। अगस्त 2017 में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू की गई। बाद में सुरक्षा समूह ने समाधान प्रक्रिया के तहत जेपी इंफ्राटेक के अधिग्रहण की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि, इससे पूरे जेपी समूह की वित्तीय परेशानियां खत्म नहीं हुईं। समूह की प्रमुख कंपनी जयप्रकाश एसोसिएट्स लिमिटेड भी भारी कर्ज के कारण संकट में फंस गई। 3 जून 2024 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने जयप्रकाश एसोसिएट्स के खिलाफ कॉरपोरेट दिवालिया समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया। इस मामले में वित्तीय लेनदारों ने करीब 57,185 करोड़ रुपये के बकाये का दावा किया था। इसके बाद कंपनी के कारोबार और संपत्तियों के समाधान के लिए बोली प्रक्रिया शुरू हुई। कई बड़े कारोबारी समूहों ने कंपनी को खरीदने में दिलचस्पी दिखाई। ## वेदांता ने लगाई बड़ी बोली, लेकिन अदाणी ने मारी बाजी जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण की प्रक्रिया में वेदांता समूह और अदाणी समूह समेत कई कंपनियों ने हिस्सा लिया। सितंबर 2025 में वेदांता समूह की 17,000 करोड़ रुपये से अधिक की बोली की खबर सामने आई थी। इससे माना जा रहा था कि कंपनी का नियंत्रण अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता समूह के पास जा सकता है। हालांकि, बाद में समाधान प्रक्रिया में स्थिति बदल गई। नवंबर 2025 में वित्तीय लेनदारों ने अदाणी एंटरप्राइजेज की 14,535 करोड़ रुपये की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस प्रस्ताव को कर्जदाताओं के करीब 89 फीसदी वोट मिले। इसके बाद 17 मार्च 2026 को NCLT की इलाहाबाद पीठ ने अदाणी एंटरप्राइजेज की समाधान योजना को मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ जयप्रकाश एसोसिएट्स के अधिग्रहण का रास्ता साफ हो गया। हालांकि, वेदांता समूह ने इस फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दी थी। मई 2026 में NCLAT ने वेदांता की अपील खारिज कर दी। इससे अदाणी समूह के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढ़ने का रास्ता मिला। ## अब अदाणी समूह के नियंत्रण में जेपी की संपत्तियां जयप्रकाश एसोसिएट्स के समाधान के बाद समूह की कई संपत्तियां और कारोबार अदाणी समूह की रणनीति का हिस्सा बन गए हैं। अदाणी समूह की अलग-अलग कंपनियां जेपी समूह की विभिन्न कारोबारी इकाइयों और परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल कर रही हैं। इसी क्रम में अदाणी पावर ने जेपी पावर से जुड़ी हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया। वहीं, जेपी समूह के कुछ सीमेंट प्लांटों को अदाणी समूह ने डालमिया भारत को बेचने का फैसला किया। इस तरह जिस जेपी समूह ने कभी उत्तर भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई थी, उसका कारोबारी स्वरूप अब पूरी तरह बदल चुका है। जयप्रकाश गौड़ की कहानी कारोबार की दुनिया में बड़े सपने, तेजी से विस्तार और वित्तीय अनुशासन के महत्व को समझाती है। महज 10 हजार रुपये की बचत से शुरू हुआ सफर देश के बड़े कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचा, लेकिन भारी कर्ज और नकदी की कमी ने अंततः इस साम्राज्य को दिवालिया प्रक्रिया तक पहुंचा दिया। **Source:** उपलब्ध कारोबारी रिपोर्टों और दिवालिया समाधान प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी पर आधारित। jp-associates-jayprakash-gaur-rise-fall-adani-takeover-story
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Reading: BRICS में भारत की ग्रोथ पर सुरजीत भल्ला का बड़ा सवाल, चीन के मुकाबले क्यों पीछे? वियतनाम का प्रदर्शन भी चौंकाने वाला
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BRICS में भारत की ग्रोथ पर सुरजीत भल्ला का बड़ा सवाल, चीन के मुकाबले क्यों पीछे? वियतनाम का प्रदर्शन भी चौंकाने वाला

Namam Sharma
Last updated: 2026/09/13 at 10:09 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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14 Min Read
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Surjit Bhalla Analysis: BRICS को अक्सर भारत समेत उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक बड़े वैश्विक मंच के तौर पर देखा जाता है। लेकिन अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला के ताजा विश्लेषण ने इस समूह के भीतर आर्थिक प्रदर्शन को लेकर एक अलग तस्वीर सामने रखी है। उनके मुताबिक, शुरुआती पांच BRICS सदस्यों में भारत का प्रदर्शन दूसरा सबसे अच्छा रहा है और पिछले 15 वर्षों में देश ने वास्तविक आर्थिक प्रगति की है। हालांकि, भल्ला का कहना है कि सिर्फ BRICS का सदस्य होना भारत की आर्थिक तरक्की की पूरी कहानी नहीं बताता।

Contents
BRICS में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा?‘भारत की तरक्की असली है, लेकिन काफी नहीं’BRICS की पूरी ग्रोथ में चीन का बड़ा योगदानBRICS के भीतर चीन का दबदबा बढ़ाव्यापार के आंकड़े भी चीन की कहानी बताते हैंतेल निर्यातक देशों की वजह से तुलना थोड़ी जटिलचीन और तेल निर्यातकों को हटाने पर क्या बचता है?भारत के सामने वियतनाम ने खड़ी की बड़ी चुनौतीभारत के लिए असली चुनौती क्या है?चीन के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भी चिंता का विषयBRICS भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला रास्ता नहीं

सुरजीत भल्ला ने 2011 से 2025 के बीच BRICS देशों के आर्थिक प्रदर्शन और व्यापार से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया। उनके मुताबिक, इस अवधि में समूह की वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी में बड़ी बढ़ोतरी हुई, लेकिन इस वृद्धि का सबसे बड़ा हिस्सा चीन से आया। यही वजह है कि चीन को अलग करके BRICS के बाकी देशों के प्रदर्शन को देखने पर तस्वीर काफी अलग नजर आती है।

BRICS में भारत का प्रदर्शन कैसा रहा?

1/ BRICS went from 21.9% of world income in 2011 to 28.9% in 2025.
Now take out China.
The other ten members went from 11.9% to 11.5%.
They did not rise. They fell. pic.twitter.com/rq18XYMIA1

— Surjit Bhalla (@surjitbhalla) September 13, 2026

भल्ला के मुताबिक, शुरुआती पांच BRICS सदस्यों में भारत का प्रदर्शन चीन के बाद दूसरा सबसे अच्छा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले डेढ़ दशक में वास्तविक आर्थिक प्रगति की है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

उनके विश्लेषण के अनुसार, भारत की सालाना आर्थिक वृद्धि दर इस अवधि में करीब 5.2 फीसदी रही और वैश्विक आय में भारत की हिस्सेदारी 2011 के करीब 2.5 फीसदी से बढ़कर 2025 में 3.5 फीसदी हो गई। इसी तरह, दुनिया की औसत प्रति व्यक्ति आय के मुकाबले भारत की प्रति व्यक्ति आय का स्तर भी 13.4 फीसदी से बढ़कर 18.7 फीसदी हुआ।

भल्ला ने इस प्रदर्शन को वास्तविक प्रगति बताया है। उनका कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने निश्चित तौर पर आगे बढ़त हासिल की है। लेकिन उनकी चिंता यह है कि इस प्रगति को भारत के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता।

यही वह बिंदु है जहां उनका विश्लेषण भारत के सामने मौजूद बड़ी चुनौती की ओर इशारा करता है।

‘भारत की तरक्की असली है, लेकिन काफी नहीं’

सुरजीत भल्ला का कहना है कि भारत की आर्थिक प्रगति को स्वीकार किया जाना चाहिए, खासकर ऐसे समय में जब देश की ग्रोथ को लेकर अलग-अलग तरह की नकारात्मक धारणाएं सामने आती रहती हैं। लेकिन उनके मुताबिक भारत को अपनी मौजूदा उपलब्धियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए।

उनके विश्लेषण में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कितना आगे बढ़ा, बल्कि यह भी है कि इसी अवधि में दूसरे उभरते देशों ने कितना तेज प्रदर्शन किया। इसी तुलना में भारत के सामने कुछ कमजोरियां दिखाई देती हैं, खासकर निर्यात के मोर्चे पर।

BRICS की पूरी ग्रोथ में चीन का बड़ा योगदान

भल्ला के मुताबिक, 2011 में दुनिया की कुल आय में BRICS की हिस्सेदारी करीब 21.9 फीसदी थी, जो 2025 में बढ़कर 28.9 फीसदी हो गई। पहली नजर में यह BRICS की मजबूत आर्थिक प्रगति दिखाई देती है।

लेकिन चीन को इस गणना से अलग कर दें तो तस्वीर बदल जाती है। उनके कैलकुलेशन के मुताबिक, चीन के बिना BRICS की वैश्विक आय में हिस्सेदारी 2011 के 11.9 फीसदी से घटकर 2025 में करीब 11.5 फीसदी रह गई।

इस दौरान अकेले चीन की वैश्विक आय में हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी से बढ़कर 17.4 फीसदी हो गई। यानी BRICS की कुल आय में हुई बढ़ोतरी का लगभग 72 फीसदी हिस्सा चीन से आया।

इसका मतलब यह है कि BRICS की सामूहिक आर्थिक ताकत बढ़ी जरूर, लेकिन इस बढ़ोतरी में चीन का योगदान बाकी सदस्यों की तुलना में कहीं ज्यादा रहा।

BRICS के भीतर चीन का दबदबा बढ़ा

चीन की बढ़ती आर्थिक हिस्सेदारी सिर्फ वैश्विक आंकड़ों तक सीमित नहीं है। BRICS के भीतर भी चीन का वजन काफी बढ़ा है।

2011 में BRICS की कुल आय में चीन की हिस्सेदारी करीब 45.6 फीसदी थी। 2025 तक यह बढ़कर 60.2 फीसदी हो गई। अगर केवल शुरुआती पांच सदस्यों की बात करें तो इस समूह की कुल आय में चीन की हिस्सेदारी 54.1 फीसदी से बढ़कर 68.9 फीसदी हो गई।

भल्ला ने इसी आधार पर BRICS के बदलते स्वरूप पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि आबादी को छोड़कर लगभग हर आर्थिक पैमाने पर यह समूह पहले की तुलना में ज्यादा चीन-केंद्रित हो गया है।

हालांकि, आबादी के लिहाज से BRICS की स्थिति जरूर अलग है। 2011 में दुनिया की आबादी में इस समूह की हिस्सेदारी करीब 50.9 फीसदी थी, जो 2025 में लगभग 50.5 फीसदी रही।

व्यापार के आंकड़े भी चीन की कहानी बताते हैं

सुरजीत भल्ला ने अपने विश्लेषण में केवल GDP या आय के आंकड़ों पर निर्भर नहीं किया। उन्होंने BRICS के व्यापार प्रदर्शन को भी देखा और यहां तस्वीर और ज्यादा स्पष्ट दिखाई देती है।

दुनिया के कुल गुड्स एक्सपोर्ट में BRICS की हिस्सेदारी 2011 में करीब 23 फीसदी थी, जो 2023 में बढ़कर 25 फीसदी हो गई। लेकिन चीन को हटा दें तो यही हिस्सेदारी 12.4 फीसदी से घटकर सिर्फ 10.1 फीसदी रह गई।

इस अवधि में BRICS के गुड्स एक्सपोर्ट में हुई कुल बढ़ोतरी का करीब 94 फीसदी हिस्सा चीन से आया।

यह आंकड़ा बताता है कि वैश्विक व्यापार में BRICS की बढ़ती मौजूदगी को सिर्फ पूरे समूह की सामूहिक सफलता के तौर पर देखना अधूरी तस्वीर हो सकती है। इसमें चीन का निर्यात प्रदर्शन सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।

तेल निर्यातक देशों की वजह से तुलना थोड़ी जटिल

भल्ला ने यह भी माना कि BRICS के व्यापार आंकड़ों की तुलना करते समय एक महत्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना चाहिए। रूस, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे सदस्य बड़े तेल निर्यातक देश हैं।

इसलिए इन देशों के निर्यात आंकड़ों पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का बड़ा असर पड़ सकता है। तेल की कीमत बढ़ने पर बिना निर्यात मात्रा में समान वृद्धि के भी डॉलर के हिसाब से एक्सपोर्ट बढ़ सकता है।

इसी वजह से भल्ला ने एक और तुलना की, जिसमें चीन और चार प्रमुख तेल निर्यातक देशों को अलग कर दिया गया।

चीन और तेल निर्यातकों को हटाने पर क्या बचता है?

चीन, रूस, सऊदी अरब, UAE और ईरान को छोड़कर BRICS के छह देशों में ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया शामिल हैं।

भल्ला के अनुसार, इन छह देशों की दुनिया के गुड्स एक्सपोर्ट में हिस्सेदारी 2011 में भी करीब 5.1 फीसदी थी और 2023 में भी लगभग 5.1 फीसदी रही।

यही आंकड़ा उनके विश्लेषण में सबसे महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि चीन और तेल की कीमतों के प्रभाव को हटाने पर BRICS के इन देशों की वैश्विक वस्तु व्यापार में हिस्सेदारी में लगभग कोई बदलाव नहीं आया।

यानी समूह की बढ़ती वैश्विक आर्थिक और व्यापारिक ताकत का फायदा सभी सदस्यों को समान रूप से नहीं मिला।

भारत के सामने वियतनाम ने खड़ी की बड़ी चुनौती

भारत के प्रदर्शन को समझने के लिए भल्ला ने वियतनाम का उदाहरण भी दिया। यह तुलना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही एशियाई अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक सप्लाई चेन और मैन्युफैक्चरिंग में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं।

2011 में दुनिया के गुड्स एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी करीब 1.71 फीसदी थी, जो 2023 में बढ़कर 1.88 फीसदी हुई। यानी भारत की हिस्सेदारी बढ़ी, लेकिन बढ़ोतरी बहुत सीमित रही।

इसके मुकाबले वियतनाम की हिस्सेदारी इसी अवधि में 0.52 फीसदी से बढ़कर 1.50 फीसदी हो गई।

वियतनाम का गुड्स एक्सपोर्ट करीब 93 अरब डॉलर से बढ़कर 345 अरब डॉलर पहुंच गया। दूसरी ओर भारत का गुड्स एक्सपोर्ट करीब 307 अरब डॉलर से बढ़कर 432 अरब डॉलर हुआ।

भल्ला ने इस तुलना के जरिए भारत के निर्यात प्रदर्शन पर सवाल उठाया। उनका तर्क है कि काफी छोटी आबादी वाला वियतनाम वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत के करीब पहुंच गया है।

भारत के लिए असली चुनौती क्या है?

भल्ला का विश्लेषण मूल रूप से BRICS की सफलता या असफलता का फैसला करने के बजाय भारत की आर्थिक रणनीति पर सवाल उठाता है।

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, घरेलू बाजार बड़ा है और वैश्विक स्तर पर भारत की आर्थिक भूमिका भी बढ़ी है। लेकिन अगर भारत को चीन के विकल्प के तौर पर वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन में जगह बनानी है, तो सिर्फ घरेलू आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी।

इसके लिए निर्यात, मैन्युफैक्चरिंग, वैश्विक सप्लाई चेन में भागीदारी और विदेशी निवेश जैसे क्षेत्रों में तेज प्रगति जरूरी होगी।

वियतनाम का उदाहरण बताता है कि छोटी अर्थव्यवस्था भी वैश्विक व्यापार में अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ा सकती है, अगर वह निर्यात आधारित मैन्युफैक्चरिंग और वैश्विक कंपनियों की सप्लाई चेन में मजबूत जगह बना ले।

चीन के साथ भारत के आर्थिक रिश्ते भी चिंता का विषय

भल्ला ने भारत-चीन आर्थिक संबंधों को भी अपने विश्लेषण में महत्वपूर्ण माना। उनके मुताबिक, पिछले 15 वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि BRICS के आर्थिक प्रभाव में चीन का दबदबा काफी बढ़ा है।

उनका कहना है कि BRICS की कुल आर्थिक ताकत में बड़ी हिस्सेदारी ऐसे सदस्य के पास है जिसके रणनीतिक और आर्थिक हित भारत से हमेशा मेल नहीं खाते।

भारत और चीन के बीच व्यापार में बड़ा असंतुलन भी लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में सामान और औद्योगिक उत्पाद आयात करता है, जबकि भारत का चीन को निर्यात उसके मुकाबले काफी कम है।

यही वजह है कि भल्ला का संकेत यह है कि भारत को अपनी आर्थिक रणनीति तय करते समय केवल BRICS जैसे बहुपक्षीय समूहों पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका और अन्य प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक रिश्तों को भी समान महत्व देना चाहिए।

BRICS भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेला रास्ता नहीं

सुरजीत भल्ला के विश्लेषण को BRICS के खिलाफ बयान के तौर पर देखना सही नहीं होगा। BRICS भारत के लिए वैश्विक दक्षिण की आवाज मजबूत करने, व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों को विस्तार देने और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच है।

लेकिन आर्थिक नजरिए से सवाल यह है कि क्या BRICS की सामूहिक ग्रोथ का फायदा भारत को उतनी तेजी से मिल रहा है, जितनी उसकी क्षमता है।

भल्ला के आंकड़े इसी अंतर को सामने रखते हैं। भारत ने पिछले 15 वर्षों में वास्तविक आर्थिक प्रगति की है और शुरुआती BRICS सदस्यों में उसका प्रदर्शन दूसरा सबसे अच्छा रहा है। लेकिन चीन की तुलना में उसकी गति काफी कम रही और वैश्विक वस्तु निर्यात में भारत की हिस्सेदारी भी बहुत तेजी से नहीं बढ़ी।

इसलिए उनके विश्लेषण का मुख्य संदेश यह है कि भारत की आर्थिक तरक्की को कम करके नहीं आंकना चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रदर्शन को पर्याप्त मानकर संतुष्ट भी नहीं होना चाहिए।

भारत के सामने अगली बड़ी चुनौती तेज आर्थिक विकास को ज्यादा रोजगार, ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग, मजबूत निर्यात और वैश्विक सप्लाई चेन में बड़ी हिस्सेदारी में बदलने की है। अगर ऐसा होता है, तभी भारत अपनी बढ़ती आर्थिक क्षमता को वैश्विक प्रभाव में बदल पाएगा।

Source: सुरजीत भल्ला के आर्थिक विश्लेषण और उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आर्थिक एवं व्यापारिक आंकड़ों पर आधारित।

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल आर्थिक और व्यापारिक आंकड़ों के विश्लेषण के उद्देश्य से है। इसे किसी शेयर, निवेश या वित्तीय उत्पाद में निवेश की सलाह न माना जाए।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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