चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के सामने नई चुनौती
दुनिया में एक समय जनसंख्या विस्फोट को सबसे बड़ी समस्या माना जाता था। सरकारें बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए परिवार नियोजन अभियान चलाती थीं और विशेषज्ञ चेतावनी देते थे कि तेजी से बढ़ती जनसंख्या संसाधनों पर भारी दबाव डाल सकती है। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक तक आते-आते तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। अब दुनिया के कई विकसित और विकासशील देश एक नई समस्या का सामना कर रहे हैं—घटती जनसंख्या और तेजी से बूढ़ी होती आबादी।
जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों में जन्म दर लगातार गिर रही है। इसका असर उनकी अर्थव्यवस्था, श्रम बाजार और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। कम बच्चे पैदा होने का मतलब है कि भविष्य में काम करने वाले लोगों की संख्या घटेगी, जबकि बुजुर्गों की संख्या बढ़ती जाएगी। इससे सरकारों पर पेंशन, स्वास्थ्य सेवाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं का बोझ बढ़ता है। भारत भी इस वैश्विक प्रवृत्ति से पूरी तरह अछूता नहीं है। देश के कई समृद्ध राज्यों में प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे पहुंच चुकी है। हालांकि इसी बीच बिहार एक ऐसा राज्य बनकर उभर रहा है जो भविष्य में भारत के लिए डेमोग्राफिक सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।
बिहार की प्रजनन दर सबसे ज्यादा
सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) 2024 के आंकड़ों के अनुसार बिहार की कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) 2.9 है, जो देश में सबसे अधिक है। इसके बाद उत्तर प्रदेश 2.6 और मध्य प्रदेश 2.4 के साथ सूची में शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी देश या समाज की आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए प्रजनन दर 2.1 के आसपास होना जरूरी माना जाता है। इसे रिप्लेसमेंट लेवल कहा जाता है। भारत का औसत प्रजनन दर स्तर अब 1.9 तक पहुंच चुका है, जो रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे है। ऐसे में बिहार का 2.9 का आंकड़ा कई लोगों को चिंता का विषय लग सकता है। अक्सर राज्य की आलोचना यह कहकर की जाती है कि यहां परिवार नियोजन का कम उपयोग होता है, महिलाओं पर अधिक सामाजिक दबाव है और शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कमजोर है। इन आलोचनाओं में कुछ सच्चाई हो सकती है, लेकिन इसी स्थिति का एक दूसरा पहलू भी है जो भविष्य में भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
दुनिया क्यों बूढ़ी हो रही है?
आज दुनिया के सामने सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय संकट एजिंग पॉपुलेशन यानी बूढ़ी होती आबादी का है। जैसे-जैसे लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ती है और जन्म दर घटती है, वैसे-वैसे बुजुर्गों का अनुपात बढ़ने लगता है।इसका सबसे बड़ा उदाहरण जापान है। जापान की बड़ी आबादी 65 वर्ष से अधिक आयु की है। वहां कई गांव लगभग खाली हो चुके हैं और कई उद्योगों को श्रमिकों की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण कोरिया की स्थिति और भी चिंताजनक मानी जाती है। वहां दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर दर्ज की गई है। शादी और बच्चे पैदा करने की बढ़ती लागत के कारण युवा पीढ़ी परिवार बनाने से बच रही है। चीन भी अब इसी रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। कभी एक बच्चे की नीति लागू करने वाला चीन आज लोगों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं।
चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा असर
चीन की प्रजनन दर 1990 में प्रति महिला 2.5 थी, जो 2025 तक घटकर लगभग 0.93 रह गई है। यह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक के लिए गंभीर चुनौती मानी जा रही है। RAND Corporation के अनुमानों के अनुसार चीन की वर्कफोर्स 2015 के आसपास अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी थी। अब आने वाले दशकों में इसमें लगातार गिरावट आने की संभावना है। अनुमान है कि 2050 तक चीन की कार्यशील आबादी में लगभग एक-चौथाई की कमी आ सकती है। कम वर्कफोर्स का मतलब है कम उत्पादन, कम इनोवेशन और आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार। दूसरी ओर बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं और पेंशन पर खर्च तेजी से बढ़ता है। इससे सरकारी वित्तीय दबाव बढ़ जाता है।
दक्षिण कोरिया और जापान से क्या सीख मिलती है?
जापान और दक्षिण कोरिया दोनों देशों ने जन्म दर बढ़ाने के लिए कई तरह के प्रोत्साहन दिए हैं। सरकारें नकद सहायता, टैक्स छूट, सस्ती चाइल्डकेयर और आवास सुविधाएं प्रदान कर रही हैं। इसके बावजूद जन्म दर में उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि जब कोई समाज अधिक शहरी, शिक्षित और समृद्ध हो जाता है तो परिवार का आकार स्वाभाविक रूप से छोटा होने लगता है। यही कारण है कि केवल आर्थिक प्रोत्साहन से समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा। यूरोप के कई देशों को अपनी अर्थव्यवस्था चलाने के लिए प्रवासियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। अमेरिका भी लंबे समय से प्रवासी श्रमिकों की मदद से अपनी श्रम शक्ति को मजबूत बनाए हुए है।
भारत की स्थिति चीन से क्यों अलग है?
भारत के सामने भी भविष्य में एजिंग पॉपुलेशन की चुनौती आएगी, लेकिन इसकी रफ्तार चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की तुलना में काफी धीमी रहने की संभावना है। इसका सबसे बड़ा कारण भारत की विशाल युवा आबादी है। देश में अभी भी करोड़ों युवा कार्यशील आयु वर्ग में प्रवेश कर रहे हैं। इसके अलावा बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अपेक्षाकृत अधिक जन्म दर बनी हुई है। यही वजह है कि कई वैश्विक अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि 2100 तक भारत की आबादी भले घटे, लेकिन यह दुनिया की सबसे बड़ी आबादियों में शामिल रहेगा।
बिहार की युवा आबादी सबसे बड़ी ताकत
SRS रिपोर्ट के अनुसार बिहार की लगभग 31.5 प्रतिशत आबादी 15 वर्ष से कम आयु की है। यह पूरे देश में सबसे अधिक है। इसके मुकाबले तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में युवाओं का अनुपात काफी कम है। युवा आबादी किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संसाधन होती है। यदि उन्हें अच्छी शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर मिल जाएं तो वे आर्थिक विकास की गति को कई गुना बढ़ा सकते हैं। बिहार की यही युवा आबादी आने वाले दशकों में भारत की श्रम शक्ति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। जब अन्य राज्यों में काम करने योग्य लोगों की संख्या घटने लगेगी, तब बिहार से आने वाले लाखों युवा उस कमी को पूरा कर सकते हैं।
अमीर राज्यों को पड़ेगी वर्कर्स की जरूरत
केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में प्रजनन दर लंबे समय से कम बनी हुई है। इन राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आय का स्तर बेहतर है, लेकिन इसके साथ ही जन्म दर भी कम हो गई है। भविष्य में इन राज्यों को उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्माण और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए बड़ी संख्या में श्रमिकों की जरूरत होगी। ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आने वाले युवा इन अर्थव्यवस्थाओं को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आज जिन लोगों का मजाक उड़ाया जाता है कि वे रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाते हैं, वही लोग आने वाले समय में भारत की आर्थिक मशीनरी को चलाने वाले सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन बन सकते हैं।
लेकिन केवल जनसंख्या काफी नहीं
हालांकि केवल अधिक आबादी होना अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है। अगर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर नहीं होंगे तो बड़ी आबादी बोझ भी बन सकती है। बिहार की प्रति व्यक्ति आय अभी भी देश के सबसे निचले स्तरों में है। राज्य को शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट, औद्योगिक निवेश और बुनियादी ढांचे पर तेजी से काम करने की जरूरत है। यदि बिहार अपनी युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार से जोड़ने में सफल हो जाता है तो यह भारत के लिए एक विशाल डेमोग्राफिक डिविडेंड बन सकता है। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो यही अवसर चुनौती में भी बदल सकता है।
भविष्य का भारत और बिहार की भूमिका
आने वाले दशकों में दुनिया के कई देश घटती आबादी और वर्कफोर्स संकट से जूझेंगे। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। भारत के सामने भी यह चुनौती आएगी, लेकिन बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की युवा आबादी इस संकट को काफी हद तक कम कर सकती है। संभव है कि जिस बिहार को कभी पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाता था, वही भविष्य में भारत की सबसे बड़ी ताकत बन जाए। उसके युवा देश के उद्योगों, सेवा क्षेत्र, स्वास्थ्य सेवाओं और तकनीकी क्षेत्रों को नई ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं।
निष्कर्ष
दुनिया तेजी से बूढ़ी हो रही है और कई देशों में जन्म दर खतरनाक स्तर तक गिर चुकी है। ऐसे समय में बिहार की ऊंची प्रजनन दर और विशाल युवा आबादी भारत के लिए एक रणनीतिक लाभ साबित हो सकती है। हालांकि इस लाभ को वास्तविक आर्थिक शक्ति में बदलने के लिए शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार सृजन पर बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होगी। यदि ऐसा हुआ तो बिहार केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की आर्थिक सुरक्षा का आधार बन सकता है।
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