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Bajaj vs Firodia: बजाज ऑटो और टेंपो की वो लड़ाई, जिसने दो परिवारों की दोस्ती को बदल दिया कॉरपोरेट वॉर में

Namam Sharma
Last updated: 2026/08/14 at 11:21 पूर्वाह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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राहुल बजाज और नवल फिरोदिया की कहानी: कैसे 20 साल पुरानी पार्टनरशिप बनी भारत की सबसे चर्चित बिजनेस जंग

भारत के कॉरपोरेट इतिहास में कई बड़ी बिजनेस लड़ाइयां हुई हैं, लेकिन बजाज परिवार और फिरोदिया परिवार के बीच की जंग सबसे अलग रही। एक समय दोनों परिवारों के रिश्ते इतने मजबूत थे कि वे एक-दूसरे के सलाहकार और सहयोगी हुआ करते थे। लेकिन समय बदला और यही दोस्ती दशकों तक चलने वाली कॉरपोरेट कोल्ड वॉर में बदल गई।

Contents
राहुल बजाज और नवल फिरोदिया की कहानी: कैसे 20 साल पुरानी पार्टनरशिप बनी भारत की सबसे चर्चित बिजनेस जंग500 रुपये की नौकरी से शुरू हुई थी नवल फिरोदिया की कहानीराहुल बजाज की एंट्री और शुरू हुआ विवादसितंबर 1968: जब अलग हो गए बजाज और फिरोदियाशेयर बाजार से बोर्डरूम तक चली कब्जे की लड़ाई“कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता”: जब सार्वजनिक हुई लड़ाई1990 का दशक: फिर शुरू हुई नई कारोबारी चालेंक्या राहुल बजाज खरीदना चाहते थे बजाज टेंपो?बजाज-फिरोदिया विवाद क्यों है खास?

पुणे के आकुर्डी में स्थित एक मैदान आज भी इस कहानी की गवाही देता है। कभी जहां दोनों परिवारों के लोग आसानी से एक-दूसरे से मिलने जाते थे, वहां बाद में एक दीवार खड़ी हो गई। यह दीवार सिर्फ ईंट-पत्थर की नहीं थी, बल्कि दो बड़े कारोबारी घरानों के बीच बढ़ती दूरी का प्रतीक बन गई।

500 रुपये की नौकरी से शुरू हुई थी नवल फिरोदिया की कहानी

यह कहानी शुरू होती है नवल के. फिरोदिया से, जिनका जन्म 1910 में अहमदनगर में हुआ था। वे गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे।

1920 के दशक में उनकी मुलाकात जमनालाल बजाज से हुई। आजादी के बाद फिरोदिया बजाज समूह से जुड़ गए और एक समय ऐसा भी था जब वे बजाज समूह की कंपनी बछराज ट्रेडिंग में सिर्फ 500 रुपये महीने की नौकरी करते थे।

जब भारत में ऑटोमोबाइल कारोबार की शुरुआत हो रही थी, तब फिरोदिया ने बजाज समूह के साथ मिलकर अहम भूमिका निभाई। अगस्त 1957 में बजाज टेंपो की शुरुआत हुई, जहां जर्मन तकनीक के सहारे थ्री-व्हीलर और कमर्शियल वाहन बनाए जाने लगे।

वहीं दूसरी तरफ बजाज ऑटो ने स्कूटर कारोबार में अपनी पहचान बनानी शुरू की। आगे चलकर दोनों कंपनियों के प्लांट पुणे के आकुर्डी में स्थापित हुए और दोनों के बीच वही मैदान था, जहां बाद में विवाद की दीवार खड़ी हुई।

राहुल बजाज की एंट्री और शुरू हुआ विवाद

असल विवाद तब शुरू हुआ जब राहुल बजाज कंपनी में शामिल हुए। उनकी पहली जिम्मेदारी डिप्टी जनरल मैनेजर की थी। वे खरीद, मार्केटिंग, बिक्री, वित्त और ऑडिट जैसे कई विभाग संभालते थे।

दिलचस्प बात यह थी कि उस समय उनके बॉस खुद नवल फिरोदिया थे, जो बजाज ऑटो के चीफ एग्जीक्यूटिव और बजाज टेंपो के मैनेजिंग डायरेक्टर थे।

माना जाता है कि 1967 के आसपास फिरोदिया परिवार ने बजाज ऑटो में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए शेयर खरीदने शुरू किए। जब राहुल बजाज को इसकी जानकारी मिली तो उन्हें यह पसंद नहीं आया।

जब शेयर ट्रांसफर के कागजात उनके पास आए तो उन्होंने मंजूरी देने से इनकार कर दिया। यहीं से दोनों परिवारों के रिश्तों में पहली बड़ी दरार आई।

सितंबर 1968: जब अलग हो गए बजाज और फिरोदिया

1968 तक विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों परिवारों ने अलग होने का फैसला कर लिया।

राहुल बजाज ने बजाज टेंपो से इस्तीफा दे दिया, जबकि नवल फिरोदिया ने बजाज ऑटो छोड़ दिया।

इसके बाद:

  • बजाज ऑटो बजाज परिवार के पास रही।
  • बजाज टेंपो फिरोदिया परिवार के पास चली गई।

बाद में बजाज टेंपो का नाम बदलकर फोर्स मोटर्स हो गया।

उस समय दोनों कंपनियों का कारोबार लगभग बराबर था और दोनों की सालाना बिक्री करीब 7 करोड़ रुपये के आसपास थी।

शेयर बाजार से बोर्डरूम तक चली कब्जे की लड़ाई

बंटवारे के बाद असली लड़ाई शुरू हुई शेयर बाजार में।

शुरुआत में फिरोदिया परिवार के पास बजाज ऑटो की करीब 13% हिस्सेदारी थी, जिसे उन्होंने बढ़ाकर लगभग 23% कर लिया।

वहीं बजाज परिवार ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाते हुए नियंत्रण अपने हाथ में मजबूत कर लिया।

इस दौरान सबसे चर्चित घटना 4% शेयरों की नीलामी की रही।

इन शेयरों पर LIC और UTI जैसी संस्थाओं का अधिकार था। उस समय शेयर का बाजार भाव करीब 260 रुपये था।

फिरोदिया ने 262.50 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाई, लेकिन राहुल बजाज ने सीधे 411 रुपये प्रति शेयर की बोली लगाकर बाजी पलट दी।

इसके बाद फिरोदिया परिवार नीलामी से पीछे हट गया।

मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन अदालत ने राहुल बजाज के पक्ष में फैसला दिया।

“कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता”: जब सार्वजनिक हुई लड़ाई

1980 के दशक तक दोनों परिवारों की लड़ाई मीडिया की सुर्खियों में आने लगी।

1988 में राहुल बजाज ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें विश्वास है कि एक दिन बजाज टेंपो फिर से बजाज ग्रुप का हिस्सा बनेगी।

इसके जवाब में नवल फिरोदिया ने मराठी कहावत का इस्तेमाल करते हुए कहा:

“कौवे के कोसने से बैल नहीं मरता।”

यह बयान दोनों परिवारों के बीच चल रही कड़वाहट का प्रतीक बन गया।

1990 का दशक: फिर शुरू हुई नई कारोबारी चालें

1990 के दशक में दोनों कंपनियों के बीच हिस्सेदारी की लड़ाई जारी रही।

फिरोदिया परिवार को विस्तार योजनाओं के लिए बजाज ऑटो के कुछ शेयर बेचने पड़े, जिससे उनकी हिस्सेदारी कम हुई।

वहीं बजाज परिवार ने बजाज टेंपो में भी अपनी पकड़ बनाए रखी।

1991-92 के दौरान बजाज टेंपो पर नियंत्रण की संभावनाएं बढ़ीं। राहुल बजाज ने बाजार से अतिरिक्त शेयर खरीद लिए।

एक समय ऐसा आया जब:

  • डैमलर बेंज के पास हिस्सेदारी थी।
  • फिरोदिया परिवार के पास हिस्सेदारी थी।
  • बजाज परिवार के पास भी बड़ी हिस्सेदारी थी।

यानी कंपनी पर नियंत्रण की लड़ाई तीन बड़े पक्षों के बीच चल रही थी।

क्या राहुल बजाज खरीदना चाहते थे बजाज टेंपो?

1995 तक बजाज टेंपो का कारोबार काफी बढ़ चुका था। उस समय राहुल बजाज के पास कंपनी में करीब 26% हिस्सेदारी थी।

जब उनसे पूछा गया कि वे इतने लंबे समय तक शेयर क्यों रखे हुए हैं, तो उन्होंने कहा था:

“यह एक अच्छा निवेश है। फिरोदिया कंपनी बहुत अच्छी चलाते हैं। जब भी मैं अपने शेयर बेचूंगा, अच्छा मुनाफा कमाऊंगा।”

हालांकि यही हिस्सेदारी फिरोदिया परिवार के लिए चिंता का कारण बनी रही, क्योंकि इससे राहुल बजाज के पास कई महत्वपूर्ण फैसलों को प्रभावित करने की ताकत थी।

बजाज-फिरोदिया विवाद क्यों है खास?

बजाज और फिरोदिया परिवार की यह कहानी सिर्फ दो कंपनियों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह दिखाती है कि बिजनेस में रिश्ते, भरोसा और नियंत्रण कितना महत्वपूर्ण होता है।

एक समय की गहरी दोस्ती धीरे-धीरे हिस्सेदारी, नियंत्रण और रणनीति की लड़ाई में बदल गई।

आज भी यह विवाद भारतीय कॉरपोरेट इतिहास की सबसे लंबी और चर्चित बिजनेस वॉर में गिना जाता है।

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TAGGED: Bajaj Auto History, Bajaj vs Firodia, Corporate War India, Force Motors History, Naval Firodia, Rahul Bajaj
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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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