बिल्ली को शेर की ‘मौसी’ कहा जाता है, यह बात तो आपने कई बार सुनी होगी। लेकिन क्या आपने कभी सांप की ‘मौसी’ के बारे में सुना है? प्रकृति में एक ऐसा सरीसृप पाया जाता है, जिसे आम बोलचाल में सांप की ‘मौसी’ कहा जाता है। इसका लंबा और चमकदार शरीर दूर से सांप जैसा नजर आता है, जबकि छोटे-छोटे पैर इसे सांप से अलग पहचान देते हैं।
इस जीव को आमतौर पर बभनी या स्किंक (Skink) के नाम से जाना जाता है। खास बात यह है कि यह जहरीला नहीं होता और आमतौर पर इंसानों से दूरी बनाए रखता है। भारत में इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं।
लेकिन इसकी सबसे हैरान करने वाली बात इसकी शक्ल नहीं, बल्कि प्रजनन से जुड़ी क्षमता है। कुछ स्किंक प्रजातियों में मादा द्वारा स्पर्म को लंबे समय तक शरीर में सुरक्षित रखने की क्षमता देखी गई है। यही वजह है कि वह नर से संपर्क के काफी समय बाद भी अंडे या बच्चे पैदा कर सकती है।
कौन है सांप की ‘मौसी’?
सांप की ‘मौसी’ के नाम से मशहूर बभनी वास्तव में स्किंक परिवार का एक सरीसृप है। यह छिपकली से संबंधित होती है और इसके शरीर की बनावट काफी लंबी होती है।
इसका शरीर चिकना और चमकदार होने के कारण कई बार दूर से देखने पर यह सांप जैसा भ्रम पैदा करता है। हालांकि, इसके छोटे पैर इसकी असली पहचान सामने ला देते हैं।
यहां यह समझना जरूरी है कि ‘सांप की मौसी’ इसका वैज्ञानिक नाम नहीं है। यह केवल लोगों के बीच प्रचलित एक बोलचाल का नाम है, जिसका इस्तेमाल इसके सांप जैसी शारीरिक बनावट के कारण किया जाता है।
सांप से क्यों होती है तुलना?
बभनी और सांप में सबसे प्रमुख समानता इनका लंबा शरीर है। दोनों का शरीर जमीन के करीब रहने और तेजी से आगे बढ़ने के लिए अनुकूल दिखाई देता है।
लेकिन दोनों के बीच एक बड़ा अंतर भी है। स्किंक के शरीर पर छोटे पैर होते हैं, जबकि सांप के पैर नहीं होते। यही छोटे पैर बभनी को सांप से अलग पहचानने में मदद करते हैं।
कुछ स्किंक प्रजातियों में पैर इतने छोटे होते हैं कि पहली नजर में उन्हें देख पाना भी मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से जमीन पर चलते समय यह जीव कई लोगों को सांप जैसा दिखाई देता है।
क्या बभनी जहरीली होती है?
नहीं। स्किंक जहरीले सांपों की तरह विषैला जीव नहीं है। आमतौर पर यह इंसानों से बचने की कोशिश करता है और खतरा महसूस होने पर छिप जाता है।
इसकी त्वचा चिकनी और चमकदार होती है। हालांकि, किसी भी जंगली या अनजान जीव को पकड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अगर घर या आसपास ऐसा कोई जीव दिखाई दे तो उसे परेशान करने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाए रखना बेहतर है।
भारत में मिलती हैं कई प्रजातियां
भारत की जैव विविधता में स्किंक की कई प्रजातियां शामिल हैं। उपलब्ध प्रजाति रिकॉर्ड के मुताबिक, देश में इसकी 62 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इनमें कुछ ऐसी प्रजातियां भी हैं, जो भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
स्किंक आमतौर पर अलग-अलग तरह के आवासों में पाए जा सकते हैं। प्रजाति के अनुसार इनके रहने का स्थान और व्यवहार अलग हो सकता है।
इसलिए हर स्किंक को एक जैसा समझना सही नहीं होगा। अलग-अलग प्रजातियों में शरीर की बनावट, रंग, आकार और प्रजनन व्यवहार में अंतर देखा जा सकता है।
सबसे बड़ा राज—लंबे समय तक संभालकर रख सकती है स्पर्म
अब आते हैं इस जीव की उस खासियत पर, जो इसे बेहद दिलचस्प बनाती है।
कुछ स्किंक प्रजातियों में मादा संभोग के बाद स्पर्म को अपने शरीर में सुरक्षित रखने की क्षमता रखती है। इसका मतलब यह है कि स्पर्म को तुरंत इस्तेमाल करना जरूरी नहीं होता।
बाद में उपयुक्त परिस्थितियां होने पर यही सुरक्षित स्पर्म अंडों के निषेचन में इस्तेमाल हो सकता है। इस तरह मादा को हर बार प्रजनन के लिए तुरंत नर के संपर्क में आने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक साल या उससे ज्यादा समय बाद भी हो सकता है प्रजनन
अध्ययनों में कुछ स्किंक में यह देखा गया है कि मादा द्वारा सुरक्षित रखा गया स्पर्म काफी लंबे समय तक व्यवहार्य रह सकता है। कुछ परिस्थितियों में यह अवधि एक साल या उससे अधिक भी बताई गई है।
यानी मादा ने पहले नर के साथ संभोग किया हो, तो उसके बाद काफी समय बीतने पर भी सुरक्षित स्पर्म प्रजनन में इस्तेमाल हो सकता है।
हालांकि, इसे सीधे यह कहना कि “स्किंक बिना नर के बच्चे पैदा करती है” थोड़ा भ्रामक हो सकता है। वास्तव में कई मामलों में नर के साथ पहले संभोग हो चुका होता है और मादा उसके स्पर्म को बाद के उपयोग के लिए सुरक्षित रखती है।
यही वैज्ञानिक अंतर इस पूरी कहानी को और भी दिलचस्प बनाता है।
क्या स्किंक सच में बिना नर के बच्चे पैदा करती है?
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। स्पर्म स्टोरेज और बिना निषेचन के प्रजनन (पार्थेनोजेनेसिस) दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
स्पर्म स्टोरेज में मादा पहले नर के साथ संभोग करती है और उसके स्पर्म को शरीर में सुरक्षित रखती है। बाद में उसी स्पर्म का इस्तेमाल अंडों के निषेचन के लिए किया जा सकता है।
वहीं पार्थेनोजेनेसिस में मादा बिना नर के आनुवंशिक योगदान के संतान पैदा कर सकती है। कुछ सरीसृपों में पार्थेनोजेनेसिस का दस्तावेजीकरण हुआ है, लेकिन हर स्किंक प्रजाति में ऐसा होता है, यह कहना सही नहीं होगा।
इसलिए बभनी की असली खासियत यह है कि कुछ प्रजातियों में उसका प्रजनन तंत्र बेहद अनुकूलनशील है और वह पहले से सुरक्षित स्पर्म का काफी समय बाद भी इस्तेमाल कर सकती है।
प्रकृति का छोटा जीव, लेकिन कमाल की क्षमता
सांप जैसी शक्ल, छोटे पैर, चमकदार शरीर और लंबे समय तक स्पर्म सुरक्षित रखने की क्षमता—स्किंक को प्रकृति का एक बेहद रोचक जीव बनाती है।
इसी वजह से अगर आपको कभी जमीन पर सांप जैसा दिखने वाला लेकिन छोटे पैरों वाला जीव नजर आए, तो संभव है कि वह सांप नहीं बल्कि बभनी यानी स्किंक हो।
और सबसे दिलचस्प बात यही है कि जिसे आम लोग सिर्फ सांप से मिलती-जुलती शक्ल के कारण पहचानते हैं, उसके भीतर प्रकृति ने प्रजनन की ऐसी क्षमता विकसित की है, जो वैज्ञानिकों के लिए भी अध्ययन का विषय रही है।


