India GDP Growth: भारत को लंबे समय तक 8 फीसदी की आर्थिक विकास दर बनाए रखने के लिए निवेश की रफ्तार बढ़ानी होगी। जाने-माने अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य सुरजीत भल्ला के मुताबिक, देश को अपना निवेश-जीडीपी अनुपात बढ़ाकर करीब 34-35 फीसदी तक ले जाने की जरूरत है। इसके साथ ही उत्पादकता में सुधार और निजी निवेश को बढ़ावा देना भी जरूरी होगा।
नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था को 8 फीसदी की सालाना विकास दर तक पहुंचाने के लिए सिर्फ सरकारी खर्च बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। देश को निजी क्षेत्र के निवेश में भी बड़ी तेजी लानी होगी। अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने सोमवार को मुंबई में आयोजित ‘एलारा इंडिया डायलॉग 2026: अश्वमेध-इंडिया रेनेसां’ कार्यक्रम में भारत की विकास संभावनाओं और निवेश से जुड़ी चुनौतियों पर अपनी राय रखी।
भल्ला के अनुसार, भारत का मौजूदा निवेश-जीडीपी अनुपात करीब 28-30 फीसदी है। यह स्तर लगभग 6.5 फीसदी की दीर्घकालिक आर्थिक विकास दर के अनुरूप माना जा सकता है। अगर भारत को अपनी विकास दर 8 फीसदी तक पहुंचानी है तो निवेश दर को मौजूदा स्तर से काफी ऊपर ले जाना होगा।
8% ग्रोथ के लिए 34-35% निवेश जरूरी
सुरजीत भल्ला के मुताबिक, 8 फीसदी की विकास दर हासिल करने के लिए भारत को अपने कुल निवेश को बढ़ाकर जीडीपी के करीब 34-35 फीसदी तक पहुंचाना होगा। हालांकि, केवल निवेश की मात्रा बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। निवेश की गुणवत्ता और उससे पैदा होने वाली उत्पादकता भी महत्वपूर्ण है।
उनका मानना है कि ज्यादा उत्पादक निवेश से अर्थव्यवस्था की क्षमता बढ़ेगी और लंबे समय तक तेज आर्थिक विकास बनाए रखने में मदद मिलेगी। इसके लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना खास तौर पर जरूरी है।
सरकारी निवेश के साथ निजी निवेश भी जरूरी
भल्ला ने कहा कि इंफ्रास्ट्रक्चर समेत कई क्षेत्रों में सरकारी निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे आर्थिक गतिविधियों को तत्काल गति मिल सकती है। लेकिन लंबी अवधि में उत्पादकता बढ़ाने के लिए निजी क्षेत्र का निवेश ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
उनके मुताबिक, सरकार को पूंजीगत खर्च जारी रखना चाहिए, लेकिन इसके साथ-साथ ऐसा माहौल भी तैयार करना होगा जिसमें कंपनियां बड़े पैमाने पर नए निवेश के लिए आगे आएं।
भल्ला के अनुसार, 2011-12 के बाद भारत में निजी निवेश में करीब 5-7 फीसदी की कमी आई है। इससे अर्थव्यवस्था में निवेश का एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा हुआ है। 8 फीसदी की विकास दर हासिल करने के लिए इस अंतर को भरना जरूरी होगा।
घरेलू निवेश पर बढ़ानी होगी निर्भरता
अर्थशास्त्री ने भारत की विकास रणनीति में घरेलू निवेश के महत्व पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि वैश्विक व्यापार से आने वाले समय में भारत को पहले जैसी तेज विकास गति मिलने की संभावना सीमित हो सकती है।
ऐसे में देश को अपनी आर्थिक वृद्धि को मजबूती देने के लिए घरेलू निवेश और घरेलू मांग पर ज्यादा भरोसा करना होगा। निजी कंपनियों द्वारा नए प्लांट, मशीनरी, तकनीक और कारोबारी क्षमता में किया गया निवेश इसमें अहम भूमिका निभा सकता है।
2015 की BIT को बताया बड़ी बाधा
भल्ला ने भारत की विदेशी निवेश नीति और द्विपक्षीय निवेश व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने खास तौर पर 2015 की द्विपक्षीय निवेश संधि (BIT) की आलोचना की।
उन्होंने इसे ‘सबसे ज्यादा निवेश-विरोधी संधि’ बताते हुए कहा कि इस तरह की व्यवस्था निवेशकों के भरोसे और देश में निवेश के माहौल को प्रभावित कर सकती है। उनके मुताबिक, निवेश दर में आई गिरावट के पीछे यह एक प्रमुख कारण हो सकता है।
भल्ला ने निवेश का चक्र दोबारा तेज करने के लिए नियामकीय सुधारों और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को और मजबूत करने की जरूरत बताई। उनका मानना है कि निवेशकों के लिए नियमों को सरल और अधिक स्पष्ट बनाना निजी पूंजी को आकर्षित करने में मदद कर सकता है।
सरकार की नीतियां तय करेंगी निवेश का माहौल
भल्ला ने कहा कि निवेश को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। कॉमर्स डिपार्टमेंट पारंपरिक अर्थों में रेगुलेटर नहीं है, लेकिन उसकी नीतियां निवेश से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि सेबी जैसे औपचारिक नियामकों के अलावा सरकार की नीतियां भी कारोबार और निवेश के माहौल पर गहरा असर डालती हैं। इसलिए 8 फीसदी की विकास दर के लक्ष्य के लिए सरकार को ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत होगी जो निजी निवेश को प्रोत्साहित करें।
क्या है 8% ग्रोथ की चुनौती?
भारत की अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक 8 फीसदी की दर से बढ़ाने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। इनमें निवेश दर को 34-35 फीसदी तक बढ़ाना, निजी निवेश को गति देना, उत्पादकता में सुधार, नियामकीय बाधाओं को कम करना और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को मजबूत करना प्रमुख हैं।
सुरजीत भल्ला की टिप्पणी का मूल संदेश यही है कि केवल सरकारी खर्च के सहारे भारत लंबे समय तक 8 फीसदी की विकास दर हासिल नहीं कर सकता। इसके लिए निजी क्षेत्र को बड़े पैमाने पर निवेश के लिए तैयार करना और निवेशकों का भरोसा मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।


