Oil and Gas Discovery: मिडिल ईस्ट में तनाव और युद्ध के बीच भारत सरकार ने देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के लिए समुद्र में तेल और गैस की खोज को तेज करने की तैयारी कर ली है। सरकार ने 2030-31 तक डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन को बढ़ावा देने के लिए करीब ₹84,000 करोड़ की योजना को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत गहरे समुद्र में तेल और गैस के संभावित भंडार तलाशने वाली कंपनियों को बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता दी जाएगी।
योजना का सबसे अहम हिस्सा करीब ₹43,000 करोड़ का ड्रिलिंग प्रोग्राम है। इसके तहत लगभग 60 डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर कुओं की खुदाई की जाएगी। सरकार प्रत्येक कुएं की ड्रिलिंग लागत का 50 फीसदी तक या अधिकतम ₹675 करोड़, जो भी कम हो, वित्तीय सहायता के रूप में देगी।
क्यों जरूरी है समुद्र में तेल-गैस की खोज?
भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा होता है। देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 85-90 फीसदी हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध, भू-राजनीतिक तनाव या समुद्री व्यापार मार्गों में रुकावट का सीधा असर भारत की ऊर्जा सप्लाई और कीमतों पर पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में तनाव के दौरान होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर सप्लाई बाधित होने का जोखिम बढ़ जाता है। सरकार चाहती है कि ऐसे बाहरी जोखिमों को कम करने के लिए भारत अपने समुद्री क्षेत्रों में मौजूद तेल और गैस संसाधनों की जल्द से जल्द पहचान करे और जहां संभव हो, वहां उत्पादन शुरू किया जाए।
60 कुओं की ड्रिलिंग पर खर्च होंगे ₹43,000 करोड़
सरकार की मंजूर योजना में कुल ₹84,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसमें से लगभग ₹43,000 करोड़ 60 डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर कुओं की ड्रिलिंग के लिए निर्धारित किए गए हैं।
डीपवॉटर में ड्रिलिंग बेहद महंगी और जोखिम वाली प्रक्रिया होती है। समुद्र की अधिक गहराई में काम करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक और महंगे उपकरणों की जरूरत पड़ती है। इसी वजह से कई कंपनियां संभावित भंडार होने के बावजूद ऐसे क्षेत्रों में निवेश करने से बचती हैं।
सरकार की वित्तीय सहायता का उद्देश्य इसी शुरुआती जोखिम को कम करना है।
एक कुएं पर ₹675 करोड़ तक की मदद
इस योजना के तहत सरकार ड्रिलिंग लागत का 50 फीसदी तक वहन करेगी। हालांकि, एक कुएं के लिए वित्तीय सहायता की अधिकतम सीमा ₹675 करोड़ तय की गई है।
यानी किसी कुएं की ड्रिलिंग पर होने वाली लागत के आधार पर सरकार सहायता देगी, लेकिन यह रकम लागत के 50 फीसदी या ₹675 करोड़ में से जो भी कम होगा, उतनी ही होगी।
इससे गहरे समुद्र में एक्सप्लोरेशन करने वाली कंपनियों के शुरुआती पूंजीगत जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
सरकार तुरंत नहीं वसूलेगी अपनी रकम
योजना का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार अपनी दी गई वित्तीय सहायता की वसूली तुरंत शुरू नहीं करना चाहती।
प्रस्ताव के मुताबिक, यदि ड्रिलिंग से व्यावसायिक रूप से उपयोगी तेल या गैस का भंडार मिलता है, तो सरकार अपनी सहायता की वसूली बाद के चरण में शुरू करेगी। तेल मंत्रालय की ओर से उद्योग के सामने रखे गए प्रस्ताव के अनुसार, सरकार का निवेश फील्ड में उत्पादन शुरू होने के सात साल बाद या एक्सप्लोरर द्वारा डेवलपमेंट कॉस्ट का आधा हिस्सा वसूल करने के बाद, इनमें से जो पहले हो, तब वापस लिया जा सकता है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य कंपनियों को खोज के बाद उत्पादन तक पहुंचने और शुरुआती निवेश की भरपाई करने के लिए पर्याप्त समय देना है।
इंडस्ट्री ने 5 साल बाद वसूली का सुझाव दिया
सरकार ने इस योजना को लागू करने के तरीके को लेकर तेल और गैस उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा भी की है।
सूत्रों के मुताबिक, उद्योग के कुछ सदस्यों ने सुझाव दिया है कि सरकार को अपनी सहायता की वसूली उत्पादन शुरू होने के पांच साल बाद करनी चाहिए। वहीं कुछ कंपनियां इस वसूली को डेवलपमेंट कॉस्ट का 50 फीसदी वसूल होने की शर्त से जोड़ने के पक्ष में नहीं हैं।
इंडस्ट्री की चिंता है कि डेवलपमेंट कॉस्ट की वसूली का आकलन आगे चलकर विवाद का कारण बन सकता है। इसलिए कंपनियां वसूली के लिए स्पष्ट और निश्चित समयसीमा चाहती हैं।
छोटी तेल-गैस खोजों को भी मिल सकता है फायदा
योजना का फायदा सिर्फ बड़े तेल और गैस भंडार तक सीमित नहीं रहने वाला है। इंडस्ट्री के कुछ अधिकारियों के अनुसार, साझा उत्पादन और इवैक्यूएशन सुविधाओं के लिए करीब ₹10,000 करोड़ का आवंटन छोटी खोजों को भी उत्पादन में लाने में मदद कर सकता है।
अक्सर छोटी खोजों में उत्पादन शुरू करने के लिए अलग से जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करना आर्थिक रूप से मुश्किल होता है। यदि साझा सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, तो इन खोजों को कम लागत में कमर्शियल प्रोडक्शन तक पहुंचाया जा सकता है।
ऑफशोर डेटा जुटाने पर ₹28,500 करोड़
सरकार ने समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की संभावनाओं का पता लगाने के लिए डेटा जुटाने पर भी बड़ा खर्च तय किया है। योजना के तहत ऑफशोर डेटा जुटाने के लिए करीब ₹28,500 करोड़ निर्धारित किए गए हैं।
इसमें 3D सिस्मिक डेटा जुटाने के लिए ₹12,500 करोड़ का प्रावधान शामिल है। 3D सिस्मिक सर्वे से समुद्र के नीचे मौजूद भूगर्भीय संरचनाओं की ज्यादा विस्तृत तस्वीर हासिल करने में मदद मिलती है। इससे संभावित तेल और गैस भंडार वाले क्षेत्रों की पहचान बेहतर तरीके से की जा सकती है।
नेशनल डेटा रिपॉजिटरी में रखा जाएगा डेटा
सरकार इस डेटा को जुटाने के लिए अपनी एजेंसियों को नियुक्त कर सकती है। सर्वे और एक्सप्लोरेशन से हासिल डेटा को नेशनल डेटा रिपॉजिटरी (NDR) में शामिल किया जाएगा।
बाद में एक्सप्लोरेशन कंपनियां इस डेटा तक पहुंच हासिल कर सकेंगी। इससे कंपनियों को किसी क्षेत्र में खुद महंगे शुरुआती सर्वे कराने की जरूरत कम हो सकती है और नए क्षेत्रों में निवेश का फैसला लेना आसान होगा।
सरकार का बड़ा लक्ष्य क्या है?
समुद्र मंथन मिशन के तहत तैयार की गई इस योजना का मकसद सिर्फ कुछ नए तेल और गैस भंडार तलाशना नहीं है। सरकार अपस्ट्रीम ऑयल एंड गैस सेक्टर की पूरी वैल्यू चेन में जोखिम कम करना चाहती है।
इसमें डेटा जुटाने, ड्रिलिंग में मदद, साझा इंफ्रास्ट्रक्चर और छोटी खोजों को उत्पादन तक पहुंचाने जैसे कई स्तर शामिल हैं।
भारत में लंबे समय से घरेलू तेल और गैस उत्पादन में गिरावट चिंता का विषय रहा है। सरकार की कोशिश है कि बेहतर डेटा, वित्तीय सहायता और साझा इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए निजी तथा वैश्विक ऊर्जा कंपनियों को भारत के अपस्ट्रीम सेक्टर में निवेश के लिए आकर्षित किया जाए।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम कदम
मिडिल ईस्ट में किसी भी बड़े भू-राजनीतिक संकट का असर वैश्विक तेल बाजार पर तेजी से पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।
हालांकि, समुद्र में गहरे पानी के भीतर तेल और गैस की खोज महंगी और तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण है। सरकार की ₹84,000 करोड़ की योजना और प्रति कुआं ₹675 करोड़ तक की सहायता का उद्देश्य इसी जोखिम को कम करके एक्सप्लोरेशन गतिविधियों को गति देना है।
अगर इन प्रयासों से व्यावसायिक रूप से उपयोगी बड़े भंडार मिलते हैं और उनका उत्पादन शुरू होता है, तो लंबे समय में भारत की आयात पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है।


