Trump Policy: पूर्व राजनयिक और इटली में भारत के राजदूत रह चुके राजीव डोगरा ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को लेकर अपनी नई किताब में कई तीखी टिप्पणियां की हैं। उनका कहना है कि भारत आर्थिक सहायता या रणनीतिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है, लेकिन इसके बावजूद ट्रंप की नीतियों के नकारात्मक प्रभावों से भारत पूरी तरह बच नहीं पाया है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका कभी भारत का सबसे अच्छा दोस्त नहीं रहा।
राजीव डोगरा ने किताब में क्या लिखा?
राजीव डोगरा की नई किताब ‘हाउ नेशंस फेल एंड द अनमेकिंग ऑफ अमेरिकाज वर्ल्ड’ में सभ्यताओं, साम्राज्यों और देशों के पतन का विश्लेषण किया गया है। किताब में अमेरिका की विदेश नीति और उसके वैश्विक प्रभाव पर भी विस्तार से चर्चा की गई है।
रूपा द्वारा प्रकाशित इस किताब में डोगरा ने अमेरिकी नीतियों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि अमेरिका लंबे समय से अपनी ताकत, दबाव और प्रभाव के जरिए दुनिया के कई देशों को प्रभावित करता रहा है। उनके अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप के फैसलों ने इस रवैये को और अधिक स्पष्ट कर दिया है।
अमेरिका पर निर्भर नहीं है भारत
डोगरा के मुताबिक भारत की स्थिति उन देशों से अलग है, जो आर्थिक मदद या रणनीतिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर काफी हद तक निर्भर हैं। भारत न तो अमेरिका का औपचारिक सहयोगी है और न ही उसका दुश्मन।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारत अमेरिकी नीतियों के असर से पूरी तरह अछूता रह सकता है। डोगरा का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के फैसलों का भारत पर असर पड़ा है और आने वाले समय में भी इससे पूरी तरह राहत मिलना आसान नहीं होगा।
भारत के सामने क्यों बढ़ सकती हैं चुनौतियां?
पूर्व राजनयिक ने भारत की रणनीतिक स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि यूरोप खुद कई गंभीर सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और रूस के खिलाफ प्रभावी तरीके से खड़े होने के लिए उसके पास पर्याप्त सैन्य संसाधन और आधुनिक हथियार हैं या नहीं, इसे लेकर सवाल बने हुए हैं।
दूसरी तरफ रूस के चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। ऐसे में किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय टकराव की स्थिति में इन देशों से भारत को मदद मिलने की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं होगा।
डोगरा के अनुसार, अमेरिका से समय-समय पर मिलने वाली रणनीतिक रियायतें भारत के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन उनसे होने वाले संभावित दीर्घकालिक रणनीतिक नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो सकती।
क्या दुनिया दो बड़े ध्रुवों में बंट जाएगी?
डोगरा ने बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को लेकर भी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनका मानना है कि कई मध्यम शक्तियां यह उम्मीद कर रही हैं कि बहुध्रुवीय दुनिया उनके हित में होगी और इससे उन्हें बड़े देशों के बीच संतुलन बनाने का अधिक अवसर मिलेगा।
लेकिन डोगरा इसे एक तरह का भ्रम मानते हैं। उनके अनुसार, उदारवादी वैश्विक व्यवस्था के कमजोर होने का नतीजा जरूरी नहीं कि ज्यादा विविध और बहुध्रुवीय दुनिया के रूप में सामने आए।
इसके बजाय आने वाले वर्षों में अमेरिका और चीन दो प्रमुख वैश्विक ध्रुव बन सकते हैं और दुनिया की दिशा पर उनका प्रभाव सबसे अधिक हो सकता है।
पश्चिमी देशों के नेतृत्व पर भी सवाल
राजीव डोगरा ने पश्चिमी देशों के नेतृत्व की गुणवत्ता पर भी सवाल उठाया है। उनका कहना है कि इस सदी में अमेरिका का नेतृत्व ऐसे नेताओं के हाथों में रहा है, जिनमें विदेश नीति को लेकर या तो पर्याप्त रुचि नहीं थी या वे उसे प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाए।
उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश और डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व की तुलना करते हुए अपनी आलोचना रखी है। डोगरा का तर्क है कि पश्चिमी देशों में भी हाल के वर्षों में औसत दर्जे के राजनीतिक नेतृत्व का दौर देखने को मिला है।
उन्होंने फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन का उदाहरण देते हुए कहा कि इन देशों में भी ऐसे नेता सामने आए हैं, जिनके नेतृत्व को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।
पुतिन और शी जिनपिंग से अलग है तस्वीर
डोगरा ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का उदाहरण देते हुए कहा कि दोनों नेता रणनीतिक सोच रखने वाले और अनुशासित हैं। उनके मुताबिक, रूस और चीन अपनी ताकत का इस्तेमाल करने और उसे प्रदर्शित करने में भी संकोच नहीं करते।
उनका कहना है कि अमेरिका इस समय एक साथ दो तरह की चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक तरफ उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका और प्रभाव से जुड़ी समस्याओं से निपटना पड़ रहा है, जबकि दूसरी तरफ देश के भीतर पहचान और सामाजिक विभाजन से जुड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।
अमेरिका के पिछले सैन्य अभियानों पर तीखी टिप्पणी
डोगरा ने पिछले करीब 80 वर्षों में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की है। उनका कहना है कि पीछे मुड़कर देखने पर अमेरिका के कई सैन्य हस्तक्षेप ऐसे दिखाई देते हैं, जिन्हें बचकाना, जल्दबाजी में लिया गया, मनमाना या टाला जा सकने वाला माना जा सकता है।
उन्होंने वियतनाम, इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों का वहां के लोगों पर लंबे समय तक असर पड़ा।
उनके अनुसार, वियतनाम जैसे देश को भी उस तबाही से उबरने में कई दशक लगे, जबकि इराक, लीबिया, सीरिया और अफगानिस्तान में रहने वाले लोग आज भी यह सवाल उठाते हैं कि उनके देशों को इतनी बड़ी तबाही का सामना क्यों करना पड़ा।
भारत-अमेरिका रिश्तों के लिए क्या संकेत?
राजीव डोगरा की टिप्पणी ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब भारत और अमेरिका के रिश्ते रणनीतिक, व्यापारिक और रक्षा क्षेत्रों में लगातार महत्वपूर्ण बने हुए हैं। हालांकि, उनका विश्लेषण यह संकेत देता है कि भारत को अपनी विदेश नीति में किसी एक बड़ी शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए अपने रणनीतिक विकल्प खुले रखने होंगे।
कुल मिलाकर, डोगरा की किताब का तर्क यह है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत के लिए अमेरिका के साथ संबंध जरूरी हो सकते हैं, लेकिन उन्हें भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता का विकल्प नहीं माना जा सकता। आने वाले वर्षों में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत को अपने हितों के आधार पर संतुलन साधना होगा।


