Indian Soap Brand History: आज बाजार में साबुन के अनगिनत ब्रांड मौजूद हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में साबुन का इस्तेमाल आज की तरह आम नहीं था। लोग नहाने और त्वचा की सफाई के लिए मुल्तानी मिट्टी, बेसन, दही और दूसरे घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करते थे। इसी दौर में एक ऐसा देसी साबुन सामने आया, जिसकी कहानी राजा, दीवान, चंदन की लकड़ियों और प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी है।
हम बात कर रहे हैं मैसूर सैंडल सोप की। इसकी शुरुआत करीब एक सदी से भी पहले हुई थी। खास बात यह है कि इस साबुन के जन्म के पीछे किसी बड़ी कंपनी की बिजनेस प्लानिंग नहीं, बल्कि मैसूर के राजा की एक समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश थी।
प्रथम विश्व युद्ध ने पैदा की बड़ी समस्या
इस कहानी की शुरुआत साल 1914 के आसपास होती है। उस समय मैसूर में वोडेयार राजवंश का शासन था और मैसूर अपने उच्च गुणवत्ता वाले चंदन के लिए दुनियाभर में जाना जाता था।
मैसूर की चंदन की लकड़ियों की विदेशों में काफी मांग थी। यूरोप के कई देशों को चंदन भेजा जाता था। लेकिन प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ और चंदन का निर्यात भी रुक गया।
इसका सीधा असर मैसूर पर पड़ा। बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ियां स्टॉक में जमा होने लगीं। लंबे समय तक पड़े रहने से इनके खराब होने का खतरा बढ़ गया। अब सवाल था कि इस कीमती प्राकृतिक संसाधन को बर्बाद होने से कैसे बचाया जाए?
राजा ने दीवान से मांगा समाधान
मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने इस समस्या का समाधान खोजने की जिम्मेदारी अपने दीवान मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया को दी।
विश्वेश्वरैया ने चंदन की लकड़ियों को सीधे बेचने के बजाय उनसे चंदन का तेल निकालने का रास्ता सुझाया। इसके लिए विदेश से विशेष मशीनरी मंगाई गई और मैसूर में चंदन के तेल के उत्पादन की प्रक्रिया शुरू हुई।
लेकिन यहां एक और सवाल सामने आया—चंदन का तेल तैयार होने के बाद इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कैसे किया जाए?
एक साबुन ने बदल दी पूरी कहानी
कहा जाता है कि इसी दौरान फ्रांस से कुछ लोग मैसूर के महाराजा से मिलने पहुंचे। वे अपने साथ चंदन से तैयार किया गया एक साबुन लेकर आए थे।
महाराजा की नजर जब इस साबुन पर पड़ी तो एक नया विचार सामने आया—जब चंदन से सुगंधित तेल निकाला जा सकता है, तो इसी तेल का इस्तेमाल साबुन बनाने में क्यों न किया जाए?
यहीं से मैसूर के देसी चंदन साबुन की कहानी ने नया मोड़ लिया।
साबुन बनाने की तकनीक विकसित करने के लिए विशेषज्ञों की मदद ली गई। औद्योगिक रसायन विशेषज्ञ एस.जी. शास्त्री को तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करने के लिए लंदन भेजे जाने की बात सामने आती है। भारत लौटने के बाद उन्होंने यहां साबुन निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।
1918 में तैयार हुआ मैसूर सैंडल सोप
कई प्रयासों के बाद साल 1918 में चंदन के तेल से तैयार साबुन सामने आया। शुरुआत में इसका इस्तेमाल शाही परिवार के लिए किया गया और बाद में इसे आम लोगों के लिए बाजार में उतारा गया।
इस साबुन की सबसे बड़ी खासियत थी इसकी चंदन की प्राकृतिक खुशबू। हालांकि शुरुआती दौर में इसकी कीमत आम साबुनों की तुलना में ज्यादा थी, इसलिए हर वर्ग के लिए इसे खरीदना आसान नहीं था।
फिर भी इसकी खुशबू और पहचान ने धीरे-धीरे इसे लोकप्रिय बना दिया।
ट्राम टिकट से लेकर ऊंटों के जुलूस तक हुआ प्रचार
मैसूर सैंडल सोप की मार्केटिंग की कहानी भी काफी दिलचस्प रही है। ब्रांड को लोगों तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग तरीकों से प्रचार किया गया।
बताया जाता है कि इसके विज्ञापन ट्राम टिकट और माचिस की डिब्बियों जैसी रोजमर्रा की चीजों पर भी छापे जाते थे। उस दौर में यह लोगों की नजरों तक पहुंचने का एक प्रभावी तरीका था।
सबसे दिलचस्प किस्सा कराची से जुड़ा है। भारत-पाकिस्तान विभाजन से पहले कराची में इस साबुन के प्रचार के लिए ऊंटों का एक बड़ा जुलूस निकाले जाने का उल्लेख मिलता है। उस समय इस तरह का प्रचार लोगों का ध्यान आकर्षित करने का अनोखा तरीका था।
1982 में सरकारी कंपनी के हाथ में आया कारोबार
समय के साथ मैसूर सैंडल सोप का उत्पादन और कारोबार बढ़ता गया। बाद में इसके निर्माण और बिक्री की जिम्मेदारी Karnataka Soaps and Detergents Limited (KSDL) के पास आ गई।
कंपनी ने समय के साथ सिर्फ पारंपरिक चंदन साबुन तक खुद को सीमित नहीं रखा। ग्राहकों की पसंद के अनुसार गुलाब, जैस्मीन और हर्बल जैसे कई दूसरे वैरिएंट भी बाजार में उतारे गए।
इससे ब्रांड को बदलते बाजार और नई पीढ़ी के ग्राहकों के बीच अपनी जगह बनाए रखने में मदद मिली।
जब एमएस धोनी बने ब्रांड एंबेसडर
मैसूर सैंडल सोप की लोकप्रियता को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए कंपनी ने बड़े सेलिब्रिटी चेहरे का भी सहारा लिया।
साल 2006 में भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को कंपनी का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया। उस समय धोनी भारतीय क्रिकेट में तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे और उनके चेहरे के साथ ब्रांड का प्रचार काफी बड़े स्तर पर किया गया।
इससे मैसूर सैंडल सोप को युवा ग्राहकों के बीच भी अपनी पहचान मजबूत करने में मदद मिली।
100 साल बाद भी कायम है पहचान
मैसूर सैंडल सोप ने साल 2016 में अपनी 100 साल की यात्रा पूरी की। यह अपने आप में भारतीय FMCG इतिहास की एक खास उपलब्धि है।
एक ऐसी समस्या से शुरू हुई कहानी, जिसमें चंदन की लकड़ियों के खराब होने का खतरा था, आगे चलकर भारत के सबसे पुराने और पहचाने जाने वाले साबुन ब्रांड्स में बदल गई।
आज बाजार में बड़े भारतीय और विदेशी ब्रांड्स के बीच मुकाबला काफी बढ़ चुका है। इसके बावजूद मैसूर सैंडल सोप की सबसे बड़ी ताकत उसकी चंदन की खुशबू, पुरानी विरासत और देसी पहचान है।
यही वजह है कि एक सदी से ज्यादा पुराना यह ब्रांड आज भी भारतीय साबुन बाजार में अपनी अलग जगह बनाए हुए है।


