भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। भारतीय सेना ने अमेरिका की Foreign Military Sales (FMS) प्रक्रिया के तहत अमेरिकी निर्मित जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम खरीदने के लिए Letter of Offer and Acceptance (LOA) पर हस्ताक्षर किए हैं। अमेरिका ने इस फैसले को दोनों देशों के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग और भविष्य में संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया है।
अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने शुक्रवार को इस समझौते की जानकारी साझा की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि भारत युद्ध में परखे जा चुके जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम को खरीदने की योजना बना रहा है। उन्होंने इसे अमेरिका-भारत रक्षा संबंधों में एक बड़ा कदम बताते हुए कहा कि इससे दोनों देशों के बीच को-प्रोडक्शन यानी संयुक्त उत्पादन की संभावनाओं के लिए नए रास्ते खुल सकते हैं।
गोर ने दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को लेकर कहा कि अमेरिका और भारत के बीच सहयोग का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। उनके मुताबिक, जैवलिन सिस्टम को लेकर हुआ यह कदम केवल सैन्य उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य में साझेदारी के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
अमेरिकी दूतावास ने भी की LOA की पुष्टि
अमेरिकी दूतावास ने भारतीय सेना और अमेरिका के बीच LOA पर हस्ताक्षर होने की पुष्टि की है। दूतावास के अनुसार, यह समझौता अमेरिका और भारत के सशस्त्र बलों के बीच मजबूत साझेदारी को दर्शाता है। साथ ही इससे दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच भविष्य में सहयोग की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
अमेरिकी दूतावास ने कहा कि LOA पर हस्ताक्षर के बाद आपसी फायदे वाले को-प्रोडक्शन और भारत तथा अमेरिका के रक्षा औद्योगिक आधार को मजबूत करने से जुड़े दूसरे अवसरों पर बातचीत का रास्ता खुल सकता है। ऐसे में इस समझौते को भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी में सिर्फ खरीद के बजाय औद्योगिक सहयोग की दिशा में बढ़ते कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
नवंबर 2025 में मिली थी बिक्री की मंजूरी
जैवलिन सिस्टम से जुड़ा यह समझौता नवंबर 2025 में अमेरिका की ओर से भारत को हथियारों की प्रस्तावित बिक्री को मंजूरी दिए जाने के बाद हुआ है। उस समय अमेरिका ने भारत को जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम के साथ एक्सकैलिबर गाइडेड आर्टिलरी म्यूनिशन की संभावित बिक्री को मंजूरी दी थी।
अब LOA पर हस्ताक्षर होने से इस रक्षा सौदे को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। इसके साथ ही भारत और अमेरिका के रक्षा उद्योगों के बीच तकनीकी और उत्पादन संबंधी सहयोग की संभावनाओं पर भी आगे बातचीत हो सकती है।
क्या है जैवलिन एंटी-टैंक सिस्टम?
जैवलिन एक एडवांस्ड, मीडियम-रेंज फायर-एंड-फॉरगेट एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम है। इसे Javelin Joint Venture ने विकसित किया है, जो RTX और Lockheed Martin की साझेदारी है।
यह सिस्टम मुख्य रूप से बख्तरबंद वाहनों और मजबूत सैन्य ठिकानों जैसे लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण खूबियों में से एक फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता है। इसका मतलब है कि मिसाइल लॉन्च होने के बाद ऑपरेटर को उसे लगातार गाइड करने की जरूरत नहीं होती।
इस क्षमता के कारण मिसाइल दागने के बाद ऑपरेटर अपनी स्थिति बदल सकता है या सुरक्षित स्थान पर जा सकता है। युद्ध के मैदान में यह सुविधा सैनिकों की सुरक्षा और उनकी तेजी से स्थिति बदलने की क्षमता के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
टॉप-अटैक क्षमता बनाती है इसे खास
जैवलिन सिस्टम की एक प्रमुख विशेषता इसकी टॉप-अटैक क्षमता है। इस मोड में मिसाइल बख्तरबंद वाहन के ऊपरी हिस्से को निशाना बना सकती है, जहां कई मामलों में सुरक्षा कवच अपेक्षाकृत कमजोर होता है।
सिस्टम को जरूरत के मुताबिक कुछ लक्ष्यों के खिलाफ सीधे हमले के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यही वजह है कि इसे अलग-अलग तरह के युद्धक्षेत्रों में इस्तेमाल के लिए उपयोगी एंटी-टैंक हथियार माना जाता है।
जैवलिन सिस्टम का इस्तेमाल अमेरिकी सेना, अमेरिकी मरीन कॉर्प्स और कई अन्य देशों की सेनाओं द्वारा किया जाता है। भारत के साथ इसका संभावित जुड़ाव दोनों देशों के रक्षा सहयोग को एक नए स्तर तक ले जाने के साथ-साथ भविष्य में संयुक्त रक्षा उत्पादन की संभावनाओं को भी मजबूत कर सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
भारत लंबे समय से अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ घरेलू रक्षा उत्पादन और तकनीकी क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रहा है। ऐसे में जैवलिन जैसे आधुनिक रक्षा सिस्टम की खरीद के साथ को-प्रोडक्शन और औद्योगिक सहयोग की संभावना महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर आगे चलकर दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच संयुक्त उत्पादन से जुड़े समझौते होते हैं, तो इससे भारत में रक्षा निर्माण, तकनीकी सहयोग और घरेलू रक्षा औद्योगिक आधार को बढ़ावा मिल सकता है। इस लिहाज से जैवलिन को लेकर हुआ LOA भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।


