नदी या समुद्र के बीच बने पुल को देखकर अक्सर सवाल उठता है कि आखिर तेज बहाव और कई मीटर गहरे पानी के बीच इसके पिलर कैसे खड़े किए जाते हैं? पानी लगातार बहता रहता है, नीचे की मिट्टी भी नरम हो सकती है और कई जगह पानी का दबाव काफी ज्यादा होता है। इसके बावजूद बड़े पुलों के पिलर सालों तक मजबूती से खड़े रहते हैं। इसके पीछे आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग और मजबूत फाउंडेशन का बड़ा योगदान होता है।
पुल के पिलर सिर्फ पानी के तल पर रखकर नहीं बनाए जाते। उनकी नींव को जमीन के अंदर काफी गहराई तक पहुंचाया जाता है, ताकि पुल का वजन और पानी के बहाव से पैदा होने वाला दबाव सुरक्षित तरीके से जमीन तक पहुंच सके। इसके लिए प्रोजेक्ट की गहराई, मिट्टी, पानी के बहाव और संरचना के वजन के आधार पर अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें कॉफरडैम, कैसन और डीप फाउंडेशन प्रमुख हैं।
कॉफरडैम से पानी के बीच बनाई जाती है सुरक्षित जगह

कम या मध्यम गहराई वाले पानी में पिलर की नींव तैयार करने के लिए कॉफरडैम तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है। कॉफरडैम एक तरह की अस्थायी जलरोधी संरचना होती है, जिसे निर्माण वाली जगह के चारों ओर बनाया जाता है।
इसके लिए स्टील शीट पाइल्स या अन्य उपयुक्त सामग्री को पानी के तल की मिट्टी में मजबूती से धंसाया जाता है। इन शीट्स की मदद से निर्माण स्थल के चारों ओर एक घेरा तैयार हो जाता है। इसके बाद इस घेरे के अंदर मौजूद पानी को पंप के जरिए बाहर निकाला जाता है।
पानी निकलने के बाद इंजीनियरों को अपेक्षाकृत सूखी जगह मिल जाती है, जहां वे नींव की खुदाई, पाइलिंग और कंक्रीट का काम कर सकते हैं। पिलर की नींव पर्याप्त मजबूत होने के बाद कॉफरडैम को हटा दिया जाता है।
हालांकि, कॉफरडैम हर जगह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। बहुत ज्यादा गहराई, तेज बहाव या अत्यधिक जल दबाव वाली परिस्थितियों में दूसरी तकनीकों की जरूरत पड़ सकती है।
गहरे पानी में काम आती है कैसन तकनीक
जब पानी काफी गहरा हो या निर्माण स्थल की परिस्थितियां कठिन हों, तब कैसन तकनीक उपयोगी हो सकती है। कैसन एक बड़ा, मजबूत और आमतौर पर खोखला ढांचा होता है, जिसे विशेष डिजाइन के अनुसार तैयार किया जाता है।
इसे निर्माण स्थल तक पहुंचाकर पानी में उतारा जाता है और निर्धारित स्थान पर स्थापित किया जाता है। इसके बाद कैसन के अंदर से मिट्टी या अन्य सामग्री को हटाते हुए उसे धीरे-धीरे नीचे की ओर बैठाया जाता है। इस प्रक्रिया से कैसन मजबूत जमीन या उपयुक्त फाउंडेशन लेयर तक पहुंच सकता है।
कैसन की मदद से इंजीनियर पानी के नीचे भी नियंत्रित तरीके से नींव तैयार कर सकते हैं। इसका इस्तेमाल पुलों के अलावा बंदरगाह और समुद्री निर्माण परियोजनाओं में भी किया जाता है।
असली मजबूती जमीन के अंदर छिपी होती है
पुल का पिलर ऊपर से जितना दिखाई देता है, उसकी असली मजबूती उतनी ही महत्वपूर्ण उसके नीचे छिपी नींव पर निर्भर करती है। कई बड़े पुलों में पाइल फाउंडेशन का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें लंबे और मजबूत पाइल्स को जमीन के अंदर काफी गहराई तक पहुंचाया जाता है।
इन पाइल्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वे पुल का भार नीचे मौजूद मजबूत मिट्टी या चट्टानी परत तक पहुंचा सकें। कुछ परिस्थितियों में पाइल्स आसपास की मिट्टी के साथ घर्षण के जरिए भी भार संभालते हैं।
यही वजह है कि केवल पानी का तल देखकर यह अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि पुल कितना मजबूत है। नीचे की मिट्टी की जांच, भूगर्भीय सर्वे और फाउंडेशन डिजाइन पूरे निर्माण का अहम हिस्सा होते हैं।
पानी का तेज बहाव पिलर को क्यों नहीं बहा ले जाता?
पिलर पर पानी का बहाव लगातार दबाव डालता है। इसलिए इंजीनियर पिलर की आकृति, नींव की गहराई और आसपास की जमीन की स्थिति का विशेष ध्यान रखते हैं।
पिलर को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि वह पानी के प्रवाह का सामना कर सके। इसके अलावा नींव को पर्याप्त गहराई तक ले जाना जरूरी होता है, क्योंकि तेज बहाव के कारण नदी के तल की मिट्टी हटने यानी स्कॉर की समस्या हो सकती है।
इंजीनियर इस संभावित मिट्टी कटाव को डिजाइन में शामिल करते हैं। जरूरत के अनुसार पिलर के आसपास सुरक्षा उपाय किए जाते हैं, ताकि पानी के बहाव से नींव की स्थिरता प्रभावित न हो।
कॉफरडैम और कैसन में क्या अंतर है?
दोनों तकनीकों का उद्देश्य पानी के बीच निर्माण को सुरक्षित बनाना है, लेकिन उनका इस्तेमाल और निर्माण तरीका अलग होता है।
कॉफरडैम मुख्य रूप से निर्माण स्थल को अस्थायी रूप से पानी से अलग करने के लिए बनाया जाता है। इसके अंदर का पानी निकालकर इंजीनियर नींव का काम करते हैं और निर्माण पूरा होने के बाद इसे हटाया जा सकता है।
वहीं कैसन एक बड़े फाउंडेशन स्ट्रक्चर की तरह काम कर सकता है। इसे निर्धारित गहराई तक पहुंचाने के बाद इसके अंदर कंक्रीट भरकर स्थायी नींव का हिस्सा बनाया जा सकता है।
कैसन के भी होते हैं अलग-अलग प्रकार
परियोजना की जरूरत के अनुसार कैसन के अलग-अलग प्रकार इस्तेमाल किए जाते हैं। इनमें ओपन कैसन, बॉक्स कैसन और न्यूमैटिक कैसन प्रमुख हैं।
ओपन कैसन का इस्तेमाल ऐसी परिस्थितियों में किया जा सकता है जहां इसके अंदर से मिट्टी हटाकर संरचना को नीचे बैठाया जाता है। बॉक्स कैसन को पहले तैयार करके निर्धारित स्थान पर स्थापित किया जा सकता है। वहीं न्यूमैटिक कैसन में दबाव वाली हवा की मदद से पानी को कार्यक्षेत्र से दूर रखने की व्यवस्था की जाती है।
कौन-सी तकनीक इस्तेमाल होगी, यह पानी की गहराई, मिट्टी की प्रकृति, निर्माण का वजन, बहाव और प्रोजेक्ट की डिजाइन पर निर्भर करता है।
पिलर खड़ा होने के बाद भी होती है सुरक्षा की जांच
पुल का निर्माण पूरा होने के बाद भी इंजीनियरिंग का काम खत्म नहीं होता। बड़े पुलों में पिलर और फाउंडेशन की स्थिति की समय-समय पर जांच की जाती है। पानी के बहाव, मिट्टी के कटाव, संरचना पर पड़ने वाले भार और अन्य पर्यावरणीय प्रभावों को मॉनिटर किया जा सकता है।
यानी नदी या समुद्र के बीच पुल का पिलर सिर्फ कंक्रीट का एक खंभा नहीं होता। उसके पीछे मिट्टी की जांच से लेकर फाउंडेशन की गहराई, स्टील और कंक्रीट की मजबूती, पानी के बहाव और संभावित स्कॉर तक कई चीजों का हिसाब लगाया जाता है।
इसी पूरी इंजीनियरिंग की वजह से पानी की तेज लहरों के बीच खड़े पुल के पिलर अपनी जगह पर मजबूती से टिके रहते हैं। ऊपर दिखाई देने वाला पिलर दरअसल उस विशाल फाउंडेशन का सिर्फ एक हिस्सा होता है, जिसकी सबसे महत्वपूर्ण ताकत अक्सर पानी के नीचे और जमीन के अंदर छिपी रहती है।


