US vs Iran: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ाने के संकेत दे चुके हैं। वहीं अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भी ईरान के खिलाफ ऐसे प्रतिबंध लगाने की बात कही है, जिन्हें पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसे में सवाल है कि पहले से ही कड़े प्रतिबंधों से जूझ रहे ईरान को आर्थिक रूप से घेरने के लिए अमेरिका के पास अब कौन-कौन से विकल्प बचे हैं और इन्हें लागू करना वॉशिंगटन के लिए कितना आसान होगा?
अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय संघ दशकों से ईरान पर अलग-अलग कारणों से प्रतिबंध लगाते रहे हैं। इनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मानवाधिकारों और मिलिटेंट समूहों को कथित समर्थन जैसे मुद्दे शामिल हैं। ईरान के कई विदेशी एसेट्स भी फ्रीज किए गए हैं। फरवरी में ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद अमेरिका ने समुद्री, ऊर्जा और वित्तीय क्षेत्र में अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए और नौसैनिक नाकेबंदी भी शुरू की।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) के आंकड़ों के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से 1,000 से ज्यादा लोगों, जहाजों और विमानों को प्रतिबंधों के दायरे में लाया जा चुका है। इसके अलावा ईरान से जुड़े करीब 50 हजार करोड़ रुपये मूल्य के क्रिप्टो एसेट्स को भी फ्रीज किया गया है। अब अमेरिका के सामने ईरान पर दबाव बढ़ाने के कई और रास्ते मौजूद हैं।
चीन की ‘टीपॉट’ रिफाइनरियों पर कार्रवाई
ईरान के लिए चीन सबसे अहम तेल खरीदारों में से एक है। 2025 के आंकड़ों के मुताबिक, ईरान के समुद्री तेल निर्यात का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा चीन खरीदता था। इसका एक बड़ा हिस्सा चीन की छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियों यानी ‘टीपॉट’ रिफाइनरीज में जाता है।
इन रिफाइनरियों का चीन की कुल रिफाइनिंग क्षमता में करीब एक-चौथाई हिस्सा है। इनमें से कई कंपनियां कम मुनाफे या कभी-कभी घाटे में भी काम करती हैं। अमेरिका ने पहले बड़ी स्वतंत्र रिफाइनरियों पर प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन छोटी रिफाइनरियां अपेक्षाकृत कम प्रभावित हुई हैं क्योंकि उनका अमेरिकी वित्तीय सिस्टम से सीधा जुड़ाव सीमित है।
अब अमेरिका इन कंपनियों को सेकंडरी सैंक्शंस के दायरे में ला सकता है। इसका मतलब यह होगा कि ईरान के साथ कारोबार करने वाली विदेशी कंपनियों को भी अमेरिकी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
चीनी बैंकों पर बढ़ सकता है दबाव
अमेरिका के पास चीन के वित्तीय संस्थानों पर दबाव बढ़ाने का विकल्प भी मौजूद है। OFAC पहले ही चीन और हांगकांग की कुछ छोटी संस्थाओं पर सेकंडरी सैंक्शंस लगा चुका है। इन पर ईरानी तेल से जुड़े अरबों डॉलर के लेन-देन और हथियारों की खरीद के लिए वित्तीय मदद देने के आरोप लगे हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने दो बड़े चीनी बैंकों को भी चेतावनी दी है कि यदि उनके सिस्टम के जरिए ईरानी धन का लेन-देन पाया गया तो उन पर कार्रवाई की जा सकती है। हालांकि इन बैंकों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
अगर अमेरिका चीन के बड़े बैंकों को निशाना बनाता है तो ईरान से जुड़े कारोबार में वैश्विक वित्तीय संस्थानों की भागीदारी और कम हो सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। चीन अमेरिका की ऐसी कार्रवाई का जवाब दे सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ सकता है।
‘Whack-a-Mole’ रणनीति से लगातार कार्रवाई
अमेरिका ईरान की मदद करने वाली कंपनियों और लोगों के खिलाफ लगातार छोटे-छोटे प्रतिबंध लगाकर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी अपना सकता है। इसे ‘Whack-a-Mole’ रणनीति कहा जा रहा है।
इस रणनीति में ईरान के साथ-साथ चीन और खाड़ी देशों में मौजूद उन संस्थाओं को निशाना बनाया जाता है, जो अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने में तेहरान की मदद करती हैं। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग पहले ही ऐसी कंपनियों पर कार्रवाई कर चुका है, जिन पर ईरानी तेल से हासिल आय को आयात के भुगतान में इस्तेमाल करने में मदद का आरोप था।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस रणनीति की सीमाएं भी हैं। ईरान प्रतिबंधों से बचने के लिए नई कंपनियां और नए कारोबारी नेटवर्क तैयार कर सकता है। ऐसे में अमेरिका के लिए हर नई इकाई को ट्रैक करना लगातार चुनौतीपूर्ण रहेगा।
इसके अलावा अमेरिका ईरानी तेल के शिपर्स, खरीदारों और करेंसी एक्सचेंजर्स पर भी कार्रवाई तेज कर सकता है। ईरान की एविएशन इंडस्ट्री पर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाकर उसकी अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक गतिविधियों को कमजोर करना भी एक विकल्प हो सकता है।
जमीन से घेराबंदी सबसे मुश्किल विकल्प
ईरान की आर्थिक नाकेबंदी को और प्रभावी बनाने के लिए जमीनी रास्तों पर भी दबाव बढ़ाने की चर्चा हो रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही पहले ही बुरी तरह प्रभावित है और एविएशन पर अतिरिक्त प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं।
ईरान की जमीन से घेराबंदी करना हालांकि बेहद मुश्किल होगा। इसकी सीमा इराक, तुर्की, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अजरबैजान और आर्मेनिया से लगती है। ऐसे किसी कदम के लिए इन देशों के सहयोग की जरूरत होगी।
खास तौर पर पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका अहम हो सकती है। अमेरिका इन दोनों देशों पर आर्थिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है। हालांकि ईरान की भौगोलिक स्थिति और कई सीमावर्ती इलाकों का कठिन भूगोल किसी भी व्यापक जमीनी नाकेबंदी को बेहद जटिल बना सकता है।
सेकंडरी टैरिफ से बढ़ सकती है मुश्किल
ट्रंप कई बार उन देशों पर टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं, जो ईरान के साथ कारोबार करते हैं। अमेरिका के लिए यह ईरान पर दबाव बनाने का एक और प्रभावी हथियार हो सकता है।
हालांकि इस दिशा में कानूनी और राजनीतिक अड़चनें भी हैं। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कुछ टैरिफ लगाने के कानूनी आधार को खारिज किया था। दूसरी तरफ अमेरिकी सीनेट ने रूस पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े एक बिल को आगे बढ़ाया है, जिसमें ईरान से जुड़े नए प्रतिबंध भी शामिल हैं।
यदि यह कानून आगे बढ़ता है तो ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालने के लिए ट्रंप प्रशासन को नए अधिकार मिल सकते हैं। हालांकि इसे अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स से भी मंजूरी की जरूरत होगी। वहां कुछ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसद इन टैरिफ प्रावधानों को लेकर चिंता जता रहे हैं।
अमेरिका के लिए आसान नहीं होगी राह
ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए अमेरिका के पास कई विकल्प जरूर हैं, लेकिन हर कदम के साथ नई चुनौती भी जुड़ी है। चीन की रिफाइनरियों और बैंकों पर कार्रवाई से अमेरिका-चीन संबंध प्रभावित हो सकते हैं। सेकंडरी सैंक्शंस से ईरान के कारोबारी नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा, लेकिन तेहरान नए नेटवर्क बनाकर प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर सकता है।
वहीं जमीनी नाकेबंदी के लिए पड़ोसी देशों का सहयोग हासिल करना आसान नहीं होगा। टैरिफ का विकल्प भी अमेरिकी संसद और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
ऐसे में ट्रंप के सामने ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करने के कई ‘इक्के’ जरूर हैं, लेकिन उन्हें इस्तेमाल करना अमेरिका के लिए भी जोखिम से भरा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि ट्रंप प्रशासन इनमें से किन विकल्पों को वास्तव में लागू करता है और ईरान उसका क्या जवाब देता है।


