El Nino Impact on India: कमजोर मानसून से बढ़ सकता है खाद्य महंगाई का दबाव
El Nino Impact on India: प्रशांत महासागर में मजबूत होता अल नीनो भारत की फूड इकॉनमी के लिए चिंता बढ़ा रहा है। जलवायु की यह स्थिति मानसून के पैटर्न को प्रभावित कर सकती है, जिसका सीधा असर खेती और फसल उत्पादन पर पड़ने की आशंका है। अगर बारिश कमजोर या असमान रही और फसलों की पैदावार प्रभावित हुई, तो दाल, चावल, सब्जियों, तिलहन और दूसरी जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि, सरकार का मौजूदा आकलन यह है कि इस साल खरीफ फसलों पर अल नीनो का व्यापक असर दिखाई नहीं दे रहा है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 18 अगस्त को कहा था कि कुछ स्थानीय क्षेत्रों को छोड़कर स्थिति सामान्य बनी हुई है और अधिकांश हिस्सों में फसलों की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त बारिश हुई है। इसके बावजूद मानसून में क्षेत्रीय असमानता और आगे अल नीनो के संभावित प्रभाव ने खाद्य महंगाई को लेकर जोखिम बढ़ा दिया है।
FY27 में महंगाई बढ़ने का अनुमान
रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स एंड रिसर्च (Ind-Ra) ने वित्त वर्ष 2026-27 में फूड और फ्यूल इंफ्लेशन को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बताया है। एजेंसी ने FY27 के लिए भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान 6.8 प्रतिशत रखा है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.6 प्रतिशत से कम है।
Ind-Ra के मुताबिक FY27 में खुदरा महंगाई औसतन 4.9 प्रतिशत रह सकती है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह करीब 2 प्रतिशत रही थी। ऐसे में अगर अल नीनो के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, तो खाद्य महंगाई आर्थिक विकास के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।
खरीफ फसल की स्थिति अभी कितनी चिंताजनक?
अल नीनो की आशंकाओं के बावजूद इस समय देश की खरीफ खेती की तस्वीर पूरी तरह खराब नहीं है। 14 अगस्त तक करीब 1,016.57 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी थी। यह सामान्य अवधि में कवर होने वाले औसत क्षेत्र का करीब 92 प्रतिशत है।
पिछले साल की तुलना में बुआई का रकबा लगभग 2 प्रतिशत कम है, लेकिन कृषि मंत्रालय के अनुसार बुआई का अंतर लगातार कम हुआ है। संवेदनशील माने जाने वाले जिलों की संख्या भी 262 से घटकर करीब 100 रह गई है।
इससे संकेत मिलता है कि फिलहाल देशव्यापी स्तर पर खरीफ उत्पादन को लेकर बहुत बड़ा संकट नहीं दिख रहा है। हालांकि, क्षेत्रीय परिस्थितियां अलग-अलग हैं और कुछ राज्यों में बारिश की कमी तथा जल संकट चिंता का विषय बना हुआ है।
कई राज्यों में बारिश की कमी
भारत में मानसून का वितरण इस साल समान नहीं रहा है। कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में जल संकट की स्थिति बनी है, जबकि पूर्वी, उत्तर-पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में भी बारिश की कमी दर्ज की गई है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के अनुसार 12 अगस्त तक देश में कुल मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 12 प्रतिशत कम थी। पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत में बारिश की कमी करीब 26 प्रतिशत, दक्षिण प्रायद्वीप में 19 प्रतिशत और उत्तर-पश्चिम भारत में 11 प्रतिशत बताई गई।
यही क्षेत्रीय असमानता खाद्य महंगाई के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि किसी एक फसल का उत्पादन किसी खास राज्य या क्षेत्र में प्रभावित होने पर स्थानीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
अल नीनो क्या है और भारत के लिए क्यों है खतरा?
अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका असर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण, तापमान और बारिश के पैटर्न पर पड़ सकता है।
भारत के लिए इसका सबसे अहम पहलू मानसून है। कमजोर या असमान मानसून का असर उन फसलों पर ज्यादा पड़ सकता है जो बारिश पर निर्भर रहती हैं। अगर पर्याप्त पानी नहीं मिला तो फसल की पैदावार घट सकती है।
पैदावार कम होने का सीधा मतलब है कि बाजार में उपलब्धता घटेगी। वहीं अगर मांग पहले जैसी बनी रहती है, तो कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बढ़ सकता है।
दाल, चावल और सब्जियों के दाम क्यों बढ़ सकते हैं?
अगर बारिश की कमी के कारण फसल उत्पादन प्रभावित होता है, तो सबसे पहले सप्लाई पर असर पड़ता है। इसका प्रभाव कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।
दालें: दालों की उपलब्धता कम होने पर घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। सरकार को कीमतों को नियंत्रित करने के लिए बफर स्टॉक जारी करने या आयात बढ़ाने जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
चावल: धान की खेती मानसून पर काफी निर्भर रहती है। कुछ प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश की कमी होने पर उत्पादन और मंडी आवक प्रभावित हो सकती है।
सब्जियां: सब्जियों की कीमतें मौसम में बदलाव के प्रति काफी संवेदनशील होती हैं। बारिश की कमी, अत्यधिक बारिश या तापमान में बदलाव से उत्पादन और सप्लाई दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
तिलहन: तिलहन उत्पादन में गिरावट आने पर खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है।
इसलिए अल नीनो का असर केवल खेत में खड़ी फसल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका प्रभाव पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ सकता है।
फूड सप्लाई चेन पर भी पड़ेगा असर
कृषि उत्पादन में कमी आने पर उसका असर प्रोक्योरमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, प्रोसेसिंग और रिटेल तक पहुंच सकता है। किसी प्रमुख कृषि उत्पाद की उपलब्धता घटने पर कारोबारियों और प्रोसेसिंग कंपनियों की खरीद लागत बढ़ सकती है।
अगर घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं रहता, तो आयात की जरूरत बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में वैश्विक कीमतों और अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों का असर भारतीय उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
यानी किसान से लेकर थोक व्यापारी, प्रोसेसर, रिटेलर और आखिर में ग्राहक तक पूरी सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है।
सरकार के सामने क्या होंगे विकल्प?
अगर खाद्य कीमतों में तेज बढ़ोतरी होती है, तो सरकार के पास महंगाई नियंत्रित करने के लिए कई विकल्प होते हैं। इनमें बफर स्टॉक से खाद्य पदार्थ जारी करना, आयात बढ़ाना, निर्यात पर प्रतिबंध या शुल्क से जुड़े फैसले लेना और बाजार में सप्लाई बढ़ाने के कदम शामिल हो सकते हैं।
भारत पहले भी खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने के लिए दालों, चावल, गेहूं और प्याज जैसी जरूरी वस्तुओं के मामले में नीतिगत हस्तक्षेप करता रहा है।
हालांकि, लंबे समय तक खाद्य महंगाई बनी रहने पर इसका असर सिर्फ घरेलू बजट पर नहीं पड़ता। इससे मौद्रिक नीति पर भी दबाव बढ़ सकता है।
RBI के लिए भी बढ़ सकती है चुनौती
खाद्य महंगाई लगातार ऊंची रहने पर भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती की गुंजाइश सीमित हो सकती है। इसका कारण यह है कि केंद्रीय बैंक के लिए महंगाई को नियंत्रण में रखना मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
अगर एक तरफ आर्थिक विकास को गति देने के लिए दरों में कटौती की जरूरत हो और दूसरी तरफ खाद्य महंगाई बढ़ रही हो, तो RBI के सामने नीति संबंधी संतुलन की चुनौती पैदा हो सकती है।
यही वजह है कि मानसून और अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएं अब केवल कृषि से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गई हैं। इनका असर महंगाई, ब्याज दरों, उपभोक्ता खर्च और आर्थिक विकास तक पहुंच सकता है।
दुनिया में भी बढ़ रहा अल नीनो का खतरा
मौजूदा अल नीनो को लेकर वैश्विक स्तर पर भी चिंता जताई जा रही है। उपलब्ध जलवायु अनुमानों के अनुसार प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर जा सकता है।
अगर तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है, तो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम की चरम घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। कहीं अत्यधिक गर्मी और सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ जैसी परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं।
इसका असर कृषि उत्पादन, खाद्य आपूर्ति और वैश्विक कमोडिटी बाजारों पर भी पड़ सकता है।
ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ सकती है समस्या
जलवायु परिवर्तन अल नीनो जैसी प्राकृतिक जलवायु घटनाओं के प्रभाव को और गंभीर बना सकता है। ज्यादा गर्म वातावरण में वायुमंडल अधिक नमी धारण कर सकता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश की घटनाएं बढ़ सकती हैं। दूसरी तरफ ऊंचे तापमान से मिट्टी की नमी तेजी से कम होने पर सूखे का असर भी गंभीर हो सकता है।
भारत जैसे बड़े कृषि उत्पादक देश के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि बड़ी आबादी की खाद्य जरूरतें घरेलू कृषि उत्पादन से जुड़ी हैं।
क्या अभी से महंगी हो जाएंगी दाल, चावल और सब्जियां?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि अल नीनो के कारण देशभर में दाल, चावल और सब्जियों की कीमतों में निश्चित रूप से बड़ी तेजी आएगी। कृषि मंत्री के हालिया आकलन के अनुसार खरीफ फसलों पर अभी व्यापक असर नहीं दिख रहा है और अधिकांश क्षेत्रों में स्थिति सामान्य बनी हुई है।
लेकिन जोखिम पूरी तरह खत्म भी नहीं हुआ है। मानसून में क्षेत्रीय कमी, आने वाले महीनों में बारिश का पैटर्न और अल नीनो की तीव्रता आगे की तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
अगर फसल उत्पादन उम्मीद से कम रहता है और बाजार में सप्लाई घटती है, तो खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में दाल, चावल, सब्जियों, तिलहन और अन्य खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नजर रखना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
भारत के लिए अल नीनो का सबसे बड़ा खतरा फिलहाल संभावित खाद्य महंगाई का है। हालांकि मौजूदा खरीफ सीजन में देशव्यापी बड़े नुकसान के संकेत नहीं हैं, लेकिन मानसून की क्षेत्रीय कमी और मौसम की अनिश्चितता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अगर आगे बारिश कमजोर रहती है या फसल उत्पादन प्रभावित होता है, तो इसका असर खेत से निकलकर मंडी, सप्लाई चेन और आखिरकार आम उपभोक्ता की रसोई तक पहुंच सकता है। इसलिए आने वाले महीनों में मानसून, खरीफ उत्पादन और खाद्य कीमतों के आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहने वाले हैं।


