Mobile Manufacturing Scheme 2.0: भारत सरकार ने देश में मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग और घरेलू कंपोनेंट इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए Mobile Manufacturing Scheme 2.0 लॉन्च कर दी है। सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना का कुल बजट 62,500 करोड़ रुपये है और इसे 5 साल की अवधि के लिए लागू किया जाएगा। योजना का उद्देश्य भारत को मोबाइल फोन के उत्पादन के साथ-साथ कंपोनेंट और सब-असेंबली की घरेलू सप्लाई चेन का भी बड़ा केंद्र बनाना है।
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 के तहत कंपनियों से आवेदन लेने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। केंद्र सरकार ने इस योजना को 15 जुलाई को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद आगे बढ़ाया है। योजना 1 अप्रैल 2026 से लागू मानी जाएगी और वित्त वर्ष 2031 तक चलेगी। सरकार का अनुमान है कि इसके जरिए अगले पांच वर्षों में करीब 40 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन हो सकता है और लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
क्या है Mobile Manufacturing Scheme 2.0?
Mobile Manufacturing Scheme 2.0 को भारत में मोबाइल फोन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में घरेलू वैल्यू एडिशन को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया है। इस योजना में केवल मोबाइल फोन असेंबल करने पर ही जोर नहीं है, बल्कि देश में बनने वाले कंपोनेंट्स और सब-असेंबली की हिस्सेदारी बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया गया है।
सरकार चाहती है कि मोबाइल फोन निर्माण के लिए कंपनियों को जिन प्रमुख कंपोनेंट्स की जरूरत होती है, उनका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा भारत में ही तैयार हो। इससे घरेलू सप्लाई चेन मजबूत होगी, आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी और भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी।
62,500 करोड़ रुपये का है कुल बजट
Mobile Manufacturing Scheme 2.0 का कुल वित्तीय परिव्यय 62,500 करोड़ रुपये रखा गया है। योजना की अवधि पांच साल है और यह वित्त वर्ष 2027 से वित्त वर्ष 2031 तक चलेगी।
इस योजना के तहत कंपनियों को भारत में बने मोबाइल फोन की बिक्री के आधार पर इंसेंटिव दिया जाएगा। अलग-अलग शर्तों के आधार पर यह इंसेंटिव 2.25 प्रतिशत से लेकर 5 प्रतिशत तक हो सकता है।
इसके अलावा कंपनियों को कुछ खास कंपोनेंट्स और सब-असेंबली को भारत में ही सोर्स करने के लिए अतिरिक्त प्रोत्साहन भी दिया जाएगा। घरेलू स्तर पर सोर्सिंग बढ़ाने पर 1.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त इंसेंटिव मिलने का प्रावधान है।
भारतीय कंपनियों और ब्रांड्स पर खास फोकस
सरकार की इस योजना में भारतीय मोबाइल ब्रांड्स को भी विशेष प्रोत्साहन देने की कोशिश की गई है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस कृष्णन के मुताबिक, भारतीय हैंडसेट ब्रांड्स के लिए अधिकतम इंसेंटिव का प्रावधान किया गया है।
इसका उद्देश्य ऐसी घरेलू कंपनियों को बढ़ावा देना है, जो भारत में मोबाइल फोन विकसित करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपना विस्तार करना चाहती हैं।
योजना के तहत प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट को भी महत्व दिया गया है। भारतीय ब्रांड बनाने और डिजाइन क्षमता को मजबूत करने के उद्देश्य से इसके लिए 3 प्रतिशत तक अतिरिक्त इंसेंटिव का प्रावधान बताया गया है।
1 अप्रैल 2026 से लागू होगी योजना
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग स्कीम 2.0 को मौजूदा वित्त वर्ष से लागू किया जाएगा। इसका प्रभावी कार्यान्वयन 1 अप्रैल 2026 से माना गया है और योजना वित्त वर्ष 2031 तक जारी रहेगी।
सरकार का मानना है कि लंबे समय तक चलने वाली यह योजना कंपनियों को भारत में बड़े पैमाने पर निवेश करने और अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
पांच साल की अवधि में उत्पादन, घरेलू सोर्सिंग, डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट से जुड़े कई क्षेत्रों में निवेश बढ़ने की उम्मीद है।
40 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल उत्पादन का लक्ष्य
सरकार ने इस योजना के तहत बड़े स्तर पर उत्पादन का अनुमान लगाया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, Mobile Manufacturing Scheme 2.0 के पांच वर्षों में करीब 40 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल फोन का उत्पादन हो सकता है।
अगर यह लक्ष्य हासिल होता है तो भारत की मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बड़ा फायदा मिलेगा। इससे भारत न केवल घरेलू बाजार की मांग पूरी करने में सक्षम होगा, बल्कि मोबाइल फोन और उससे जुड़े उत्पादों के निर्यात को भी बढ़ावा मिल सकता है।
भारत पहले ही मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। नई योजना का फोकस इस विकास को अगले स्तर तक ले जाने और मैन्युफैक्चरिंग के साथ-साथ कंपोनेंट निर्माण को भी देश में बढ़ाने पर है।
करीब 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियों की उम्मीद
Mobile Manufacturing Scheme 2.0 से रोजगार के अवसर पैदा होने की भी उम्मीद है। सरकार के अनुमान के अनुसार, योजना की पांच साल की अवधि में करीब 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियां पैदा हो सकती हैं।
मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग का असर केवल फोन बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं रहता। कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, टेस्टिंग, डिजाइन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट और सप्लाई चेन से जुड़े कारोबारों को भी इससे फायदा मिल सकता है।
इस तरह योजना का अप्रत्यक्ष रोजगार पर भी सकारात्मक असर पड़ने की संभावना है।
PLI 1.0 के बाद आई Mobile Manufacturing Scheme 2.0
नई योजना को पहले लागू की गई Production Linked Incentive यानी PLI-LSEM Scheme के अगले चरण के तौर पर देखा जा सकता है। PLI 1.0 की अवधि 31 मार्च 2026 को समाप्त हुई थी।
पहली PLI योजना का प्रमुख उद्देश्य बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना और भारत में मोबाइल फोन के उत्पादन को बढ़ाना था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, PLI 1.0 के तहत मोबाइल फोन का उत्पादन करीब 11.61 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा, जबकि योजना का निर्धारित लक्ष्य 8.12 लाख करोड़ रुपये था।
इसी तरह योजना में निवेश का लक्ष्य करीब 7,000 करोड़ रुपये रखा गया था, जबकि इसके तहत वास्तविक निवेश 20,500 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा।
PLI योजना के जरिए कई बड़ी ग्लोबल कंपनियों और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरर्स ने भारत में अपनी मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां बढ़ाईं। इनमें Samsung और भारत में Apple के डिवाइस बनाने वाली कंपनियां भी शामिल हैं।
अब कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा जोर
PLI 1.0 में जहां मोबाइल फोन के बड़े पैमाने पर उत्पादन पर जोर था, वहीं Mobile Manufacturing Scheme 2.0 में लोकलाइजेशन को ज्यादा महत्व दिया गया है।
सरकार के मुताबिक, भारत में मोबाइल फोन बनाने के दौरान घरेलू स्तर पर होने वाला वैल्यू एडिशन पहले करीब 15 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर लगभग 23 प्रतिशत हो गया है।
नई योजना के जरिए सरकार इसे और बढ़ाना चाहती है। इसके लिए कंपनियों को भारत से कंपोनेंट्स और सब-असेंबली खरीदने पर अतिरिक्त इंसेंटिव दिया जाएगा।
इससे मोबाइल कंपनियों को स्थानीय सप्लायर्स के साथ काम करने और भारत में अपनी सप्लाई चेन विकसित करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर को मिल सकता है बड़ा फायदा
Mobile Manufacturing Scheme 2.0 का असर सिर्फ मोबाइल फोन उद्योग तक सीमित नहीं रहने वाला है। इससे भारत के पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
अगर ज्यादा कंपोनेंट्स भारत में बनने लगते हैं तो स्थानीय कंपनियों के लिए नए कारोबार के अवसर पैदा होंगे। साथ ही विदेशी कंपनियों के लिए भी भारत में उत्पादन बढ़ाना आसान हो सकता है।
घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ने से भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन मजबूत होगी और देश को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में अपनी स्थिति और बेहतर करने में मदद मिल सकती है।
क्यों महत्वपूर्ण है Mobile Manufacturing Scheme 2.0?
भारत में स्मार्टफोन का बाजार बड़ा है और मोबाइल फोन की मांग लगातार बनी हुई है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना सरकार की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नई योजना से तीन प्रमुख क्षेत्रों में फायदा मिलने की उम्मीद है:
- मोबाइल फोन का उत्पादन बढ़ेगा।
- कंपोनेंट और सब-असेंबली की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।
- रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।
इसके अलावा भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने और अपने ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने में भी मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
Mobile Manufacturing Scheme 2.0 भारत को मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में और मजबूत बनाने की दिशा में सरकार का बड़ा कदम है। 62,500 करोड़ रुपये के बजट वाली इस योजना में मोबाइल उत्पादन के साथ घरेलू वैल्यू एडिशन, कंपोनेंट सोर्सिंग, प्रोडक्ट डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर भी जोर दिया गया है।
सरकार का अनुमान है कि योजना की पांच साल की अवधि में करीब 40 लाख करोड़ रुपये का मोबाइल उत्पादन और लगभग 60,000 प्रत्यक्ष रोजगार पैदा हो सकते हैं। PLI 1.0 से मिले अनुभव के बाद अब सरकार का फोकस भारत में केवल मोबाइल फोन असेंबल करने के बजाय ज्यादा से ज्यादा कंपोनेंट्स और सब-असेंबली बनाने पर है।
अगर योजना के निर्धारित लक्ष्य प्रभावी तरीके से हासिल होते हैं, तो भारत की घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन मजबूत होने के साथ-साथ देश मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के वैश्विक केंद्र के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।


