Gold Silver Price Outlook: सोने और चांदी की कीमतों में तेजी के बीच निवेशकों के लिए एक दिलचस्प आउटलुक सामने आया है। कमोडिटी मार्केट के एक्सपर्ट और ETO Markets के CIO जोनाथन बैरट का मानना है कि आने वाले समय में चांदी का प्रदर्शन सोने से भी बेहतर रह सकता है। उनका अनुमान है कि मजबूत मांग और अनुकूल मैक्रो इकोनॉमिक परिस्थितियों के बीच चांदी की कीमत 100 डॉलर प्रति औंस के स्तर तक पहुंच सकती है।
बैरट सोने को लेकर भी सकारात्मक हैं। उनका मानना है कि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहती हैं और लिक्विडिटी से जुड़े उपाय जारी रहते हैं तो सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर सकता है। हालांकि, इन अनुमानों को निवेश की गारंटी नहीं माना जा सकता और वास्तविक कीमतें वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, डॉलर की चाल, ब्याज दरों और मांग-आपूर्ति जैसे कई कारकों पर निर्भर करेंगी।
चांदी पर एक्सपर्ट का सबसे ज्यादा भरोसा
हमारी सहयोगी वेबसाइट CNBC TV18 की रिपोर्ट के मुताबिक, जोनाथन बैरट ने कीमती धातुओं को लेकर अपने आउटलुक में चांदी को खास तौर पर मजबूत बताया है। उनका मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में चांदी निवेशकों के लिए सबसे आकर्षक कमोडिटी में से एक हो सकती है।
बैरट के मुताबिक चांदी के लिए शुरुआती महत्वपूर्ण लक्ष्य 75 डॉलर प्रति औंस का स्तर हो सकता है। अगर अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से लिक्विडिटी को सपोर्ट करने वाली नीतियां जारी रहती हैं, तो चांदी आगे चलकर 100 डॉलर प्रति औंस तक भी पहुंच सकती है।
चांदी को लेकर उनकी राय सिर्फ निवेश मांग पर आधारित नहीं है। इसके पीछे औद्योगिक मांग भी एक महत्वपूर्ण कारण है। चांदी का इस्तेमाल सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई आधुनिक तकनीकी उत्पादों में होता है। ऐसे में ग्रीन एनर्जी और इलेक्ट्रिफिकेशन का विस्तार चांदी की मांग के लिए लंबे समय में सकारात्मक साबित हो सकता है।
चीन की बढ़ती मांग से मिल सकता है सपोर्ट
चांदी के आउटलुक में चीन की भूमिका भी काफी अहम मानी जा रही है। बैरट के मुताबिक चीन के सिल्वर ओर इंपोर्ट में साल-दर-साल आधार पर 62 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
चीन दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन टेक्नोलॉजी बाजारों में शामिल है। सोलर पैनल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तक कई इंडस्ट्री में चांदी की जरूरत होती है। इसलिए चीन में औद्योगिक गतिविधियों और क्लीन एनर्जी से जुड़े निवेश में तेजी चांदी की फिजिकल डिमांड को सपोर्ट कर सकती है।
यही वजह है कि चांदी में सिर्फ सुरक्षित निवेश की मांग ही नहीं बल्कि इंडस्ट्रियल डिमांड का भी सपोर्ट मौजूद है। अगर दोनों तरह की मांग मजबूत बनी रहती है तो कीमतों को ऊपर जाने के लिए अतिरिक्त आधार मिल सकता है।
क्या सोना भी 5,000 डॉलर के पार जाएगा?
जोनाथन बैरट सोने को लेकर भी काफी बुलिश नजर आते हैं। उनका अनुमान है कि अगर मौजूदा आर्थिक और नीतिगत परिस्थितियां बनी रहती हैं तो सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस के स्तर को पार कर सकता है।
सोने की कीमतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण फैक्टर में अमेरिकी डॉलर की दिशा शामिल है। बैरट के मुताबिक डॉलर इंडेक्स में कमजोरी आने की संभावना है। अगर डॉलर इंडेक्स मौजूदा करीब 101 के स्तर से घटकर 90-95 के दायरे में आता है, तो इससे सोने और चांदी जैसी डॉलर में कीमत वाली कमोडिटीज को फायदा मिल सकता है।
आमतौर पर डॉलर कमजोर होने पर अन्य मुद्राओं में निवेशकों के लिए डॉलर आधारित कमोडिटीज अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकती हैं। यही कारण है कि बाजार में डॉलर की चाल पर सोने और चांदी के निवेशक लगातार नजर रखते हैं।
अमेरिकी ट्रेजरी की लिक्विडिटी नीति क्यों है अहम?
बैरट के आउटलुक में अमेरिकी ट्रेजरी की लिक्विडिटी नीति को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उनका मानना है कि फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति के अलावा ट्रेजरी की ओर से बॉन्ड बायबैक और लिक्विडिटी बनाए रखने के उपायों का भी बाजार पर असर पड़ सकता है।
अगर वित्तीय सिस्टम में पर्याप्त लिक्विडिटी बनी रहती है तो इसका असर अलग-अलग एसेट क्लास पर पड़ सकता है। डॉलर पर दबाव और बढ़ती लिक्विडिटी की स्थिति में निवेशकों का एक हिस्सा सुरक्षित माने जाने वाले एसेट्स की तरफ अपना रुख कर सकता है।
ऐसी स्थिति में सोना और चांदी दोनों को फायदा मिलने की संभावना बनती है। हालांकि, बाजार में लिक्विडिटी के अलावा महंगाई, ब्याज दर, आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक जोखिम भी कीमतों की दिशा तय करते हैं।
अमेरिका का बढ़ता कर्ज भी बना सकता है सोने के लिए सपोर्ट
अमेरिका पर बढ़ता कर्ज भी सोने के लॉन्ग टर्म आउटलुक में एक महत्वपूर्ण फैक्टर माना जा रहा है। जब निवेशकों को किसी अर्थव्यवस्था की वित्तीय स्थिरता या सरकारी कर्ज को लेकर चिंता बढ़ती है तो वे अपने पोर्टफोलियो में कुछ हिस्सा ऐसे एसेट्स में रखना पसंद कर सकते हैं जिन्हें वैल्यू के स्टोर के तौर पर देखा जाता है।
सोना लंबे समय से ऐसे ही एसेट्स में शामिल रहा है। केंद्रीय बैंकों की खरीदारी और निवेशकों की मांग ने भी पिछले वर्षों में गोल्ड के बाजार को सपोर्ट दिया है।
अगर केंद्रीय बैंकों की खरीदारी मजबूत रहती है और निवेशकों की ओर से भी ETF के जरिए मांग वापस आती है, तो सोने की कीमतों को आगे बढ़ने के लिए अतिरिक्त सपोर्ट मिल सकता है।
ETF की खरीदारी लौटने की उम्मीद
जोनाथन बैरट के मुताबिक आने वाले समय में एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड्स यानी ETFs की ओर से कीमती धातुओं में दोबारा खरीदारी देखने को मिल सकती है।
ETF निवेशकों के लिए सोने और चांदी में एक्सपोजर लेने का एक तरीका है। जब इन फंड्स में निवेश बढ़ता है तो संबंधित धातुओं की मांग और कीमतों पर भी इसका असर पड़ सकता है।
बैरट का मानना है कि जैसे-जैसे निवेशकों को अमेरिकी ट्रेजरी की लिक्विडिटी नीतियों के जारी रहने का भरोसा बढ़ेगा, इक्विटी मार्केट में लगी कुछ पूंजी वापस बुलियन मार्केट की ओर आ सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि शेयर बाजार से पूरी पूंजी निकलकर सोने-चांदी में आ जाएगी। बल्कि उनके अनुमान के अनुसार निवेशक अपने पोर्टफोलियो में एसेट एलोकेशन को बदलते हुए कीमती धातुओं का हिस्सा बढ़ा सकते हैं।
सोना या चांदी, किसमें ज्यादा रिटर्न की संभावना?
अगर बैरट के अनुमान को देखें तो चांदी में प्रतिशत रिटर्न की संभावना सोने से ज्यादा हो सकती है। इसका एक कारण यह है कि चांदी का इस्तेमाल निवेश के साथ-साथ इंडस्ट्रियल सेक्टर में भी बड़े पैमाने पर होता है।
ग्रीन एनर्जी, सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक्स और दूसरी तकनीकों में चांदी की जरूरत आने वाले वर्षों में बढ़ सकती है। अगर सप्लाई उतनी तेजी से नहीं बढ़ती है जितनी मांग बढ़ती है, तो बाजार में सप्लाई डेफिसिट की स्थिति कीमतों को सपोर्ट कर सकती है।
वहीं सोने को केंद्रीय बैंक खरीद, सुरक्षित निवेश की मांग, डॉलर की चाल और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे फैक्टर्स का फायदा मिल सकता है।
इसलिए दोनों धातुओं का आउटलुक सकारात्मक बताया जा रहा है, लेकिन चांदी में ज्यादा तेजी और ज्यादा जोखिम, जबकि सोने में अपेक्षाकृत अधिक डिफेंसिव निवेश की भूमिका देखी जा सकती है।
तांबे पर भी बुलिश हैं जोनाथन बैरट
जोनाथन बैरट सिर्फ सोने और चांदी पर ही सकारात्मक नहीं हैं। उनका रुख कॉपर यानी तांबे को लेकर भी काफी मजबूत है।
उनके मुताबिक कॉपर एक स्ट्रक्चरल बुल मार्केट में है। चीन की मांग और दुनिया के ग्रीन इकोनॉमी की तरफ बढ़ने से कॉपर को लंबे समय में फायदा मिल सकता है।
कॉपर का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, पावर ग्रिड, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंस्ट्रक्शन और रिन्यूएबल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर होता है। ऐसे में दुनिया में इलेक्ट्रिफिकेशन और क्लीन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार कॉपर की मांग को बढ़ा सकता है।
हालांकि, हालिया तेजी के बाद अगर कॉपर की कीमतों में कुछ समय के लिए ठहराव या कंसोलिडेशन आता है तो इसे जरूरी नहीं कि कमजोरी का संकेत माना जाए। बैरट इसे बाजार की एक हेल्दी पॉज के तौर पर देखते हैं।
सप्लाई की समस्या से कॉपर को मिल सकता है लॉन्ग टर्म सपोर्ट
कॉपर के बाजार में माइंस से जुड़ी सप्लाई समस्याएं भी महत्वपूर्ण हैं। नई माइन विकसित करने में काफी समय और पूंजी लगती है। ऐसे में अगर मांग तेजी से बढ़ती है और सप्लाई उसी अनुपात में नहीं बढ़ती तो बाजार में स्ट्रक्चरल डेफिसिट पैदा हो सकता है।
यही स्थिति लंबे समय में कॉपर की कीमतों को सपोर्ट कर सकती है। चीन की मांग और ग्रीन एनर्जी सेक्टर के विस्तार के साथ अगर सप्लाई पर दबाव बना रहता है तो कॉपर के लिए बुलिश ट्रेंड जारी रहने की संभावना बन सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है मतलब?
जोनाथन बैरट का आउटलुक सोना, चांदी और कॉपर तीनों के लिए सकारात्मक है। उनके अनुमान के मुताबिक चांदी 75 डॉलर से आगे बढ़कर 100 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है, जबकि सोना 5,000 डॉलर प्रति औंस का स्तर पार कर सकता है।
लेकिन निवेशकों को यह समझना जरूरी है कि ये एक्सपर्ट के अनुमान हैं, गारंटीड रिटर्न नहीं। कमोडिटी की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव होता है। डॉलर, अमेरिकी ब्याज दरें, महंगाई, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, ETF फ्लो, चीन की मांग, वैश्विक आर्थिक स्थिति और भू-राजनीतिक घटनाएं कीमतों को तेजी से प्रभावित कर सकती हैं।
खास तौर पर चांदी में तेजी की संभावना अधिक होने के साथ-साथ कीमतों में तेज गिरावट का जोखिम भी रहता है। इसलिए निवेश करने से पहले अपने जोखिम प्रोफाइल, निवेश अवधि और पोर्टफोलियो एलोकेशन को ध्यान में रखना जरूरी है।
डिस्क्लेमर: NewsJagran.in पर प्रकाशित कमोडिटी और निवेश संबंधी विचार और अनुमान संबंधित एक्सपर्ट के हैं। इन्हें निवेश सलाह या किसी एसेट में रिटर्न की गारंटी के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। सोना, चांदी, कॉपर और अन्य कमोडिटीज में निवेश बाजार जोखिम के अधीन है। निवेश का कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय लक्ष्यों और जोखिम क्षमता के अनुसार किसी SEBI-रजिस्टर्ड या सर्टिफाइड वित्तीय सलाहकार की सलाह जरूर लें।


